PM-KISAN भुगतान अपडेट: eKYC फेल होने से किसानों की मुश्किलें बढ़ीं
हालिया आंकड़ों और मैदानी रिपोर्टों से पता चलता है कि ई-केवाईसी (eKYC) और आधार सीडिंग जैसी तकनीकी अनिवार्यताओं के कारण लाखों पात्र किसान इस लाभ से वंचित हो गए हैं। सरकार द्वारा पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से उठाए गए ये कदम अब ग्रामीण भारत में एक नई मुसीबत बन गए हैं, जहाँ अंगूठे के निशान और सर्वर की धीमी गति, किसान की पात्रता तय कर रहे हैं।
डिजिटल इंडिया बनाम ग्रामीण वास्तविकता
सरकार ने फर्जीवाड़े को रोकने और केवल असली किसानों को लाभ पहुँचाने के लिए ई-केवाईसी को अनिवार्य कर दिया था। सुनने में यह एक बेहतरीन कदम लगता है, लेकिन ज़मीन पर इसकी हकीकत काफी अलग है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की खराब कनेक्टिविटी और तकनीकी साक्षरता की कमी ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया है।
कई बुजुर्ग किसानों के हाथों की लकीरें खेती-किसानी की मेहनत से घिस चुकी हैं। जब वे बायोमेट्रिक मशीनों पर अपना अंगूठा लगाते हैं, तो मशीन उन्हें पहचानने से इनकार कर देती है। नतीजा यह होता है कि सिस्टम उन्हें 'अपात्र' या 'सत्यापन अधूरा' मान लेता है। चेहरे से पहचान (फेशियल रिकग्निशन) वाला ऐप भी कम रोशनी या साधारण फोन कैमरों के कारण ठीक से काम नहीं कर पा रहा है, जिससे किसान सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
समस्या केवल बायोमेट्रिक तक सीमित नहीं है। पीएम-किसान पोर्टल पर दर्ज नाम और आधार कार्ड पर लिखे नाम में अगर एक अक्षर का भी अंतर है, तो भुगतान रोक दिया जाता है। इसे 'स्पेलिंग मिसमैच' कहा जा रहा है, लेकिन एक किसान के लिए इसका मतलब है महीनों तक किस्तों का न आना।
इसके अलावा, 'लैंड सीडिंग' (Land Seeding) यानी जमीन के दस्तावेजों का डिजिटल सत्यापन एक और बड़ी बाधा बनकर उभरा है। कई जगहों पर जमीन के रिकॉर्ड अपडेट नहीं हैं या उनमें तकनीकी त्रुटियां हैं, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर किसानों को भुगतना पड़ रहा है। वे अपनी ही जमीन के मालिक होने का सबूत देने के लिए पटवारी और कृषि विभाग के बीच झूल रहे हैं।
लाखों किसान हुए सिस्टम से बाहर
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, पिछली कुछ किस्तों के दौरान बड़ी संख्या में किसानों के नाम लाभार्थियों की सूची से हटे हैं। एक तरफ सरकार इसे डेटा की 'सफाई' कह रही है, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में वे किसान भी बाहर हो गए हैं जो वास्तव में जरूरतमंद और पात्र थे।
आंकड़े बताते हैं कि लाखों किसानों ने अपना ई-केवाईसी पूरा करने की कोशिश की, लेकिन तकनीकी खामियों के कारण पोर्टल पर उनका स्टेटस अपडेट नहीं हुआ। कई मामलों में, किसानों ने सीएससी (जन सेवा केंद्र) जाकर पैसे खर्च किए और प्रक्रिया पूरी की, लेकिन हफ्तों बाद भी सिस्टम उन्हें 'ई-केवाईसी लंबित' ही दिखा रहा है। यह अनिश्चितता किसानों के लिए मानसिक तनाव का कारण बन रही है।
अधिकार या सुविधा?
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। जब कल्याणकारी योजनाओं को इतनी जटिल तकनीकी शर्तों में बांध दिया जाता है कि एक आम आदमी के लिए उन्हें पाना मुश्किल हो जाए, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह सहायता उनका अधिकार है या केवल एक सरकारी सुविधा?
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक को साधन होना चाहिए, साध्य नहीं। यदि डिजिटल सिस्टम की विफलता के कारण किसी गरीब किसान को उसकी हक की राशि नहीं मिल रही है, तो यह प्रशासनिक विफलता है। एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जहाँ तकनीकी खामियों का बोझ किसान के कंधों पर न डाला जाए, बल्कि उसे सुधारने के लिए विभाग खुद जिम्मेदार हो।
डिजिटल इंडिया बनाम ग्रामीण वास्तविकता
सरकार ने फर्जीवाड़े को रोकने और केवल असली किसानों को लाभ पहुँचाने के लिए ई-केवाईसी को अनिवार्य कर दिया था। सुनने में यह एक बेहतरीन कदम लगता है, लेकिन ज़मीन पर इसकी हकीकत काफी अलग है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की खराब कनेक्टिविटी और तकनीकी साक्षरता की कमी ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया है।कई बुजुर्ग किसानों के हाथों की लकीरें खेती-किसानी की मेहनत से घिस चुकी हैं। जब वे बायोमेट्रिक मशीनों पर अपना अंगूठा लगाते हैं, तो मशीन उन्हें पहचानने से इनकार कर देती है। नतीजा यह होता है कि सिस्टम उन्हें 'अपात्र' या 'सत्यापन अधूरा' मान लेता है। चेहरे से पहचान (फेशियल रिकग्निशन) वाला ऐप भी कम रोशनी या साधारण फोन कैमरों के कारण ठीक से काम नहीं कर पा रहा है, जिससे किसान सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
आधार और बैंक खातों का मेल न होना
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समस्या केवल बायोमेट्रिक तक सीमित नहीं है। पीएम-किसान पोर्टल पर दर्ज नाम और आधार कार्ड पर लिखे नाम में अगर एक अक्षर का भी अंतर है, तो भुगतान रोक दिया जाता है। इसे 'स्पेलिंग मिसमैच' कहा जा रहा है, लेकिन एक किसान के लिए इसका मतलब है महीनों तक किस्तों का न आना।
इसके अलावा, 'लैंड सीडिंग' (Land Seeding) यानी जमीन के दस्तावेजों का डिजिटल सत्यापन एक और बड़ी बाधा बनकर उभरा है। कई जगहों पर जमीन के रिकॉर्ड अपडेट नहीं हैं या उनमें तकनीकी त्रुटियां हैं, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर किसानों को भुगतना पड़ रहा है। वे अपनी ही जमीन के मालिक होने का सबूत देने के लिए पटवारी और कृषि विभाग के बीच झूल रहे हैं।
लाखों किसान हुए सिस्टम से बाहर
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, पिछली कुछ किस्तों के दौरान बड़ी संख्या में किसानों के नाम लाभार्थियों की सूची से हटे हैं। एक तरफ सरकार इसे डेटा की 'सफाई' कह रही है, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में वे किसान भी बाहर हो गए हैं जो वास्तव में जरूरतमंद और पात्र थे।आंकड़े बताते हैं कि लाखों किसानों ने अपना ई-केवाईसी पूरा करने की कोशिश की, लेकिन तकनीकी खामियों के कारण पोर्टल पर उनका स्टेटस अपडेट नहीं हुआ। कई मामलों में, किसानों ने सीएससी (जन सेवा केंद्र) जाकर पैसे खर्च किए और प्रक्रिया पूरी की, लेकिन हफ्तों बाद भी सिस्टम उन्हें 'ई-केवाईसी लंबित' ही दिखा रहा है। यह अनिश्चितता किसानों के लिए मानसिक तनाव का कारण बन रही है।
अधिकार या सुविधा?
संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। जब कल्याणकारी योजनाओं को इतनी जटिल तकनीकी शर्तों में बांध दिया जाता है कि एक आम आदमी के लिए उन्हें पाना मुश्किल हो जाए, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह सहायता उनका अधिकार है या केवल एक सरकारी सुविधा? विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक को साधन होना चाहिए, साध्य नहीं। यदि डिजिटल सिस्टम की विफलता के कारण किसी गरीब किसान को उसकी हक की राशि नहीं मिल रही है, तो यह प्रशासनिक विफलता है। एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जहाँ तकनीकी खामियों का बोझ किसान के कंधों पर न डाला जाए, बल्कि उसे सुधारने के लिए विभाग खुद जिम्मेदार हो।









