हिमाचल के 52 गांवों का फैसला- शादी में 100 से ज्यादा बाराती नहीं, कई रस्मों और सोना-चांदी पर रोक
सिरमौर। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के गिरिपार क्षेत्र में शादी-विवाह के दौरान बढ़ते खर्चों को कम करने के लिए शिलाई खत के 52 गांवों ने सामूहिक रूप से अहम पहल की है। क्षेत्र में विवाह समारोहों को सादगीपूर्ण बनाने, परिवारों पर आर्थिक बोझ घटाने और पारंपरिक रीति-रिवाजों को व्यवस्थित रखने के उद्देश्य से 17 फैसले लिए गए हैं। इन नियमों को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया।
यह निर्णय शिलाई गांव में माता ठारी के सांझा प्रांगण में आयोजित बैठक के दौरान लिया गया। बैठक की अध्यक्षता जेलदार दिनेश तोमर ने की। चर्चा में विवाह की विभिन्न रस्मों, बारात में शामिल होने वाले लोगों की संख्या, गहनों, उपहारों, शराब और दहेज जैसी परंपराओं से जुड़े मुद्दों पर विचार किया गया। शिलाई खत के फैसलों के अनुसार, शादी में बारातियों की संख्या अधिकतम 100 तक सीमित रहेगी।
इसके साथ ही बारात में इस्तेमाल होने वाले वाहनों की संख्या भी निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप रखी जाएगी।
शादी समारोह में टेंट और डीजे की व्यवस्था को भी सीमित रखने का फैसला किया गया है। डीजे अधिकतम दो दिन ही चलाया जा सकेगा।
उस दिन गांव के अन्य लोगों और मेहमानों को आमंत्रित नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, इस रस्म में मांस खाने की प्रथा बंद करने पर सहमति बनी है। मामा के स्वागत की रस्म को लेकर भी नियम तय किए गए हैं। इसमें केवल सगे मामा और मामी शामिल होंगे। अन्य मामा के स्वागत की व्यवस्था अगले दिन शाम 5 बजे की जाएगी।
शादी के दौरान गहनों और उपहारों को लेकर भी सहमति बनाई गई है। फैसले के अनुसार, दुल्हन के लिए पांच प्रकार के गहने निर्धारित किए गए हैं। इनमें कानों के गहने, नाक का गहना, मंगलसूत्र, पैरों की पायल और चुटकी शामिल हैं। शादी के दिन गांव की अन्य महिलाएं भी इतने ही गहने पहनेंगी।
भांजे-भांजी की शादी में कपड़े और जूते देने की परंपरा को भी सीमित किया गया है। अब ये वस्तुएं केवल दूल्हा, दुल्हन और उनकी माता यानी धींटी को दी जाएंगी।
शादी के अगले दिन निभाई जाने वाली नेवदा रस्म को पारंपरिक रूप में जारी रखने का निर्णय लिया गया है। इसके लिए 10 रुपये की राशि तय की गई है, जबकि मामा के ढंग के लिए 501 रुपये निर्धारित किए गए हैं। दशूठन और दशराता की रस्मों में गांव से केवल एक-एक सदस्य को बुलाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, विवाह समारोह में दूल्हा-दुल्हन या अन्य लोगों के नाचने पर पैसे देने की प्रथा को बंद करने पर सहमति बनी है।
शिलाई खत की बैठक में दहेज प्रथा को पूरी तरह बंद करने का फैसला भी लिया गया। तय पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत केवल सोबो-पाईतो ही दिया जाएगा। इसका उद्देश्य शादी के नाम पर परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव को कम करना है। खास बात यह है कि ये नियम केवल शिलाई खत के गांवों तक सीमित नहीं रहेंगे।
–निर्णय के अनुसार, खत के परिवारों की शादी क्षेत्र के भीतर हो या बाहर, निर्धारित नियम उन पर लागू होंगे। त्योहारों को लेकर भी सामूहिक व्यवस्था तय की गई है।
बैठक में तय किया गया कि निर्धारित सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित पक्ष पर 52,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। इसके साथ ही पूरे खत के लिए सामूहिक भोज करवाने का प्रावधान भी रखा गया है।
शिलाई खत के 52 गांवों की यह पहल विवाह समारोहों में बढ़ती फिजूलखर्ची को नियंत्रित करने, परिवारों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाने और पारंपरिक रीति-रिवाजों को बनाए रखने की दिशा में उठाया गया सामूहिक कदम है।