संस्कार और जीवन मूल्य… वह शिक्षक जो हमारे भीतर जीवित रहता है?
लगभग हर स्कूल में एक छोटासा दृश्य कभी न कभी दिखाई देता है. एक बच्चा हाथ में कॉपी लेकर शिक्षक के सामने खड़ा है. कॉपी में कुछ गलत है. शिक्षक थोड़ा झुकते हैं, गलती पर निशान लगाते हैं और फिर से समझाते हैं. बच्चा गलती सुधारकर अपनी जगह लौट जाता है. शिक्षक के लिए शायद यह पूरे दिन का केवल एक साधारणसा मिनट था. लेकिन उस बच्चे के लिए वह एक मिनट आगे चलकर क्या बनेगा, यह उस समय किसी को नहीं पता. हो सकता है 30 साल बाद जिंदगी का कोई बड़ा फैसला लेते समय उसे वह पाठ याद न आए, लेकिन वह धैर्य याद आ जाए जिसके साथ किसी ने कभी उससे कहा था, एक बार फिर कोशिश करो.
शिक्षक के प्रति कृतज्ञता पूरी जिंदगी को दिशा दे सकती है, क्योंकि सच्चा शिक्षक कई बार हमें कुछ ऐसा दे जाता है जिसकी कीमत समझने की उम्र उस समय हमारी होती ही नहीं.
शिक्षा केवल जानकारी का नाम नहींकृतज्ञता की पहली परत बहुत सीधी है. हमें वह शिक्षक याद रहता है, जिसने पढ़ना, लिखना, जोड़ना या बोलना सिखाया. लेकिन शिक्षा केवल जानकारी का नाम नहीं है. बच्चा ब्लैकबोर्ड पर लिखी तारीख भूल सकता है, लेकिन उस शिक्षक को नहीं भूलता जिसने गलत जवाब देने पर उसका मजाक नहीं उड़ाया. कोई विद्यार्थी वर्षों बाद गणित का सूत्र भूल सकता है, लेकिन वह आवाज याद रख सकता है, जिसने उससे कहा था, तुम इससे बेहतर कर सकते हो.
कभीकभी शिक्षक का बहुत साधारणसा वाक्य हमारे भीतर पूरी उम्र चलता रहता है. हम सोचते हैं कि हमारा आत्मविश्वास केवल हमारा अपना बनाया हुआ है, जबकि बचपन में कहीं किसी ने चुपचाप उसकी पहली ईंट रखी थी.
शिक्षक हमेशा क्लास में ही नहीं मिलताफिर इसकी दूसरी परत खुलती है. शिक्षक हमेशा कक्षा में ही नहीं मिलता. पत्रकारिता की अपनी यात्रा में मुझे ऐसे बहुत से शिक्षक मिले, जिन्हें शायद कभी पता भी नहीं चला कि वे मुझे कुछ सिखा रहे थे. कोई वरिष्ठ जिसने एक लापरवाही से लिखे वाक्य को ठीक किया. कोई रिपोर्टर जो किसी जगह को दूर बैठे लोगों से कहीं बेहतर समझता था. कोई तकनीकी साथी जो वह जानता था जो मुझे नहीं आता था.
यहां तक कि कोई युवा साथी जिसने ऐसा सवाल पूछ दिया जिसका जवाब मेरे पास नहीं था. उम्र के साथ समझ आता है कि जिस दिन हम तय कर लेते हैं कि हमें केवल कुछ खास लोग ही सिखा सकते हैं, उसी दिन हमारी शिक्षा छोटी होने लगती है. जिंदगी शिक्षक भेजती रहती है. हमारा अहंकार पहले उनका पद देखता है, फिर तय करता है कि उनसे सीखना है या नहीं.
मन का एक अजीब विरोधाभासयही मन का एक अजीब विरोधाभास है. जब हम छोटे होते हैं, हमें पता होता है कि हमें बहुत कुछ नहीं पता, इसलिए हम पूछते हैं. जैसेजैसे सफलता मिलती है, ज्ञान हमें भरोसा देता है. लेकिन कभीकभी वही भरोसा धीरेधीरे दीवार बन जाता है. मुझे पता है कहना तब अच्छा है जब सच में कुछ पता हो. लेकिन यही वाक्य उस समय खतरनाक हो जाता है जब वह सीखने का दरवाजा बंद कर दे. शायद इसीलिए दुनिया की पुरानी ज्ञान परंपराओं ने सीखने के साथ विनम्रता को इतना महत्व दिया. खाली प्याले में कुछ डाला जा सकता है. जो प्याला खुद को पहले से भरा मानता है, उसमें कुछ नया कैसे आएगा?
लेकिन कृतज्ञता इससे भी गहरी है. किसी शिक्षक को सच में धन्यवाद देने का अर्थ क्या है? उनके पैर छूना, साल में एक दिन संदेश भेजना या पुराने स्कूल के मिलन में उन्हें याद करना? ये सब सुंदर हैं, लेकिन शायद असली धन्यवाद हमारे उस व्यवहार में छिपा है जो उनकी सीख से पैदा हुआ. कल्पना कीजिए, किसी शिक्षक ने एक बच्चे को सिखाया था कि अपने से कमजोर इंसान का कभी अपमान मत करना. 40 साल बाद वही बच्चा किसी बड़े पद पर है और उसके सामने एक कर्मचारी से गलती हो जाती है.
उस पल वह पुराना शिक्षक दिखाई दिए बिना भी कमरे में मौजूद है. अगर वह बड़ा हो चुका विद्यार्थी गलती सुधारता है लेकिन उस कर्मचारी को अपमानित नहीं करता, तो शिक्षक की सीख आगे बढ़ गई. वह विद्यार्थी खुद अपने शिक्षक के प्रति जीवित कृतज्ञता बन गया.
क्लास में बोले गए कुछ शब्द बने घावइसका एक दूसरा पहलू भी है, जिसे हम कम देखते हैं. हर शिक्षक दयालु नहीं था. कक्षा में बोले गए कुछ शब्द घाव बनकर भी हमारे साथ चले. जिस बच्चे से बारबार कहा गया कि वह किसी काम का नहीं है, वह अपनी आधी जिंदगी खुद को साबित करने में लगा सकता है. लेकिन यहां भी एक सीख छिपी है. कभी कृतज्ञता उस चीज के लिए होती है जो किसी ने हमें दी. और कभी समझ इस फैसले से आती है कि जो दर्द हमें मिला, उसे हम आगे किसी और को नहीं देंगे.
कोई कठोर शिक्षक अनजाने में हमें कोमलता सिखा सकता है, क्योंकि उसने हमें बता दिया कि लापरवाही से बोले गए शब्द कितनी गहरी चोट दे सकते हैं.
शिक्षक का छोटासा हिस्सा आज भी आपके भीतरएक छोटासा प्रयोग कीजिए. आंखें बंद करके अपनी सबसे पुरानी कक्षा में लौटिए. सबसे अच्छे शिक्षक को मत खोजिए. उस एक वाक्य को खोजिए जो आपके साथ रह गया. शायद किसी ने आपकी लिखावट की तारीफ की थी. कोई जिम्मेदारी देकर आप पर भरोसा किया था. किसी ने सख्ती से आपकी गलती सुधारी थी. या उस दिन आपको देख लिया था जब आपको लग रहा था कि कोई आपको देख ही नहीं रहा. अब उस इंसान को देखिए जो आप आज हैं. क्या उस शिक्षक का कोई छोटासा हिस्सा आज भी आपके भीतर चल रहा है?
और फिर इससे कठिन सवाल पूछिए. आज मुझसे कौन सीख रहा है? हम सभी बिना नियुक्ति के शिक्षक हैं. बच्चे देखते हैं कि हम कैसे बोलते हैं. साथ काम करने वाले देखते हैं कि हम अपने अधिकार का इस्तेमाल कैसे करते हैं. हमसे छोटे लोग देखते हैं कि गलती होने के बाद हम क्या करते हैं. कोई अनजान इंसान भी हमसे हुई एक मुलाकात से कुछ लेकर जा सकता है. शायद हमें कभी पता भी न चले कि हमारा कौनसा वाक्य किसी दूसरे की पूरी जिंदगी की याद बन गया.
शायद इसीलिए शिक्षक के प्रति कृतज्ञता केवल पीछे मुड़कर देखने का नाम नहीं है. वह मिली हुई चीज को आगे पहुंचाने का नाम है. किसी ने हमारे लिए एक छोटासा दीपक जलाया था. उस व्यक्ति का सबसे बड़ा सम्मान तब होता है जब हमारे कारण किसी और की जिंदगी में थोड़ी रोशनी पहुंचती है. अगर किसी ने कभी मुझे वह बनने में मदद की जो मैं आज हूं, तो मेरे होने से उस उपहार का थोड़ासा हिस्सा आगे किसकी जिंदगी तक पहुंचेगा?