अस्पताल कैसे आपसे ज्यादा पैसे वसूलते हैं, जानिए 5 आम तरीके और बचने के उपाय
जब हम या हमारे अपने किसी अस्पताल में भर्ती होते हैं, तो हमारी पहली प्राथमिकता इलाज होती है, पैसे नहीं। लेकिन कई बार यही स्थिति कुछ अस्पतालों के लिए कमाई का मौका बन जाती है। इलाज के नाम पर कई तरह से बिल बढ़ाया जाता है, और मरीज या उनके परिजन अक्सर समझ ही नहीं पाते कि कहां ज्यादा पैसे वसूले गए।
यह समस्या नई नहीं है। रिपोर्ट्स और सर्वे बताते हैं कि कई मरीजों को सही और डिटेल बिल तक नहीं दिया जाता, जिससे पारदर्शिता की कमी बनी रहती है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि अस्पताल किन 5 तरीकों से आपको ओवरचार्ज कर सकते हैं और आप इससे कैसे बच सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ मामलों में अस्पताल अतिरिक्त टेस्ट और ट्रीटमेंट केवल आर्थिक लाभ के लिए जोड़ देते हैं।
मरीज के लिए यह पहचानना मुश्किल होता है कि कौन सा टेस्ट जरूरी है और कौन सा नहीं।
यानी जो दवा बाहर 100 रुपये की मिलती है, वह अस्पताल के बिल में कहीं ज्यादा कीमत पर दिख सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अस्पताल में रहने की अवधि बढ़ाकर कुल बिल को बढ़ाना एक आम तरीका बन चुका है।
जैसे ग्लव्स, मेडिकल किट, नर्सिंग चार्ज या कंसल्टेशन फीस अलग से जोड़ दी जाती है। कई मामलों में एक ही प्रक्रिया की कीमत अलग-अलग मरीजों के लिए अलग हो सकती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ मामलों में एक ही इलाज की कीमत बीमा होने पर लगभग दोगुनी तक दिखा दी जाती है।
इसके अलावा, नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनका सही तरीके से पालन हर जगह नहीं होता। इसी वजह से ओवरचार्जिंग की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
यह समस्या नई नहीं है। रिपोर्ट्स और सर्वे बताते हैं कि कई मरीजों को सही और डिटेल बिल तक नहीं दिया जाता, जिससे पारदर्शिता की कमी बनी रहती है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि अस्पताल किन 5 तरीकों से आपको ओवरचार्ज कर सकते हैं और आप इससे कैसे बच सकते हैं।
1. अनावश्यक टेस्ट और ट्रीटमेंट
कई बार मरीज को ऐसे टेस्ट या प्रक्रियाएं सुझा दी जाती हैं, जिनकी वास्तव में जरूरत नहीं होती। यह जांचें सिर्फ बिल बढ़ाने के लिए भी करवाई जा सकती हैं।विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ मामलों में अस्पताल अतिरिक्त टेस्ट और ट्रीटमेंट केवल आर्थिक लाभ के लिए जोड़ देते हैं।
मरीज के लिए यह पहचानना मुश्किल होता है कि कौन सा टेस्ट जरूरी है और कौन सा नहीं।
2. दवाइयों और उपकरणों पर ज्यादा कीमत
अस्पतालों में मिलने वाली दवाइयां और मेडिकल उपकरण अक्सर बाजार से महंगे होते हैं। कई बार अस्पताल को इन पर डिस्काउंट मिलता है, लेकिन वह मरीज तक नहीं पहुंचता।यानी जो दवा बाहर 100 रुपये की मिलती है, वह अस्पताल के बिल में कहीं ज्यादा कीमत पर दिख सकती है।
3. लंबा अस्पताल में भर्ती रखना
कभी-कभी मरीज को जरूरत से ज्यादा दिनों तक अस्पताल में रखा जाता है। इससे रूम चार्ज, नर्सिंग फीस और अन्य खर्च अपने आप बढ़ जाते हैं।You may also like
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विशेषज्ञ मानते हैं कि अस्पताल में रहने की अवधि बढ़ाकर कुल बिल को बढ़ाना एक आम तरीका बन चुका है।
4. पैकेज के नाम पर छिपे हुए चार्ज
अस्पताल अक्सर इलाज के लिए पैकेज देते हैं, लेकिन इन पैकेज में कई बार ऐसे चार्ज शामिल होते हैं जिनकी जानकारी पहले नहीं दी जाती।जैसे ग्लव्स, मेडिकल किट, नर्सिंग चार्ज या कंसल्टेशन फीस अलग से जोड़ दी जाती है। कई मामलों में एक ही प्रक्रिया की कीमत अलग-अलग मरीजों के लिए अलग हो सकती है।
5. इंश्योरेंस होने पर बिल बढ़ाना
अगर मरीज के पास हेल्थ इंश्योरेंस है, तो कई बार अस्पताल बिल को ज्यादा दिखाने की कोशिश करते हैं। क्योंकि उन्हें पता होता है कि भुगतान सीधे बीमा कंपनी से होगा।रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ मामलों में एक ही इलाज की कीमत बीमा होने पर लगभग दोगुनी तक दिखा दी जाती है।
क्यों बढ़ रही है यह समस्या
भारत में अस्पतालों के लिए एक समान प्राइसिंग सिस्टम नहीं है। एक ही इलाज के लिए अलग-अलग अस्पतालों में अलग कीमत हो सकती है।इसके अलावा, नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनका सही तरीके से पालन हर जगह नहीं होता। इसी वजह से ओवरचार्जिंग की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
कैसे बचें अस्पताल की ओवरचार्जिंग से
अगर आप थोड़ी सावधानी रखें, तो इस तरह की स्थिति से काफी हद तक बच सकते हैं:- हमेशा डिटेल बिल मांगें और हर चार्ज को समझें
- दवाइयों की कीमत MRP से मिलाएं
- अनावश्यक टेस्ट के बारे में डॉक्टर से सवाल करें
- दूसरे अस्पताल से अनुमानित लागत की तुलना करें
- जरूरत पड़ने पर शिकायत दर्ज करें









