Explainer: महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई, भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना असर?

दिल्ली में पेट्रोल की कीमत अब करीब 98 रुपए प्रति लीटर पहुंच चुकी है, जबकि डीजल के दाम भी 90 रुपए प्रति लीटर से ऊपर चले गए हैं। कुल मिलाकर ईंधन की कीमतों में लगभग चार रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का असर अब सीधे आम लोगों की जेब पर दिखने लगा है।
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दरअसल, अमेरिका और इसराइल द्वारा फरवरी के अंत में ईरान पर किए गए हमलों के बाद मध्य पूर्व में तनाव लगातार बढ़ा है। इस संकट की वजह से होर्मुज़ जलडमरुमध्य से तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।


भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा असर

आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। पिछले साल नवंबर में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 60-65 डॉलर प्रति बैरल के बीच था, तब भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए 7.6 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया था।


लेकिन वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव और तेल की लगातार बढ़ती कीमतों के बाद अब मई 2026 में आरबीआई का अनुमान है कि मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर करीब 6.9 प्रतिशत रह सकती है।

महंगाई के आंकड़ों में भी इसका असर दिख रहा है। नवंबर 2025 में खुदरा महंगाई दर 0.7 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 3.48 प्रतिशत हो चुकी है। इसका मतलब है कि खाने-पीने की चीजें, किराया, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा के खर्च लगातार महंगे हो रहे हैं।


हालांकि 3.48 प्रतिशत की महंगाई दर अभी गंभीर संकट की स्थिति नहीं मानी जा रही, लेकिन यह साफ संकेत है कि महंगाई तेजी से बढ़ रही है।


थोक महंगाई बढ़ने से बढ़ेगी उत्पादन लागत

थोक महंगाई दर में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। नवंबर में जहां यह काफी कम थी, वहीं अब यह 8.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसका सीधा असर कंपनियों और उद्योगों की लागत पर पड़ रहा है।

कच्चा माल, ईंधन, धातु और ट्रांसपोर्ट की बढ़ती कीमतों की वजह से उत्पादन खर्च बढ़ रहा है। आर्थिक जानकारों का कहना है कि थोक महंगाई दर में बढ़ोतरी आने वाले समय में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में और वृद्धि का संकेत होती है।

हाल ही में दूध की कीमतों में भी दो रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हुई है, जो बढ़ती लागत का ही असर माना जा रहा है।



चुनावों के बाद बढ़े तेल के दाम

विश्लेषकों का मानना है कि महंगाई और विकास दर से जुड़े सूचकांकों पर सबसे बड़ा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का है।

नवंबर में ब्रेंट क्रूड की कीमत 60-65 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़कर 100-110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। यानी कुछ महीनों में ही कच्चे तेल के दाम लगभग दोगुने हो गए हैं।

हालांकि मार्च से मध्य मई तक भारत सरकार ने तेल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं होने दी। जानकार मानते हैं कि कई राज्यों में विधानसभा चुनावों की वजह से सरकार यह कदम उठाने से बच रही थी।

पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव खत्म होने के दो सप्ताह के भीतर ही तेल कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए।


क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

अर्थशास्त्री और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, "चुनावों की वजह से सरकार तेल के दाम बढ़ाने में हिचक रही थी, जिस तरह से कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं, भारत में तेल के दाम आगे भी बढ़ेंगे."


भारत सरकार ने मार्च में एक्साइज़ ड्यूटी में दस रुपए तक की कटौती की थी ताकि बढ़ती तेल कीमतों का बोझ सीधे जनता पर न पड़े।

ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "तेल के बारे में कहा जाता है कि यह 90% राजनीति है. सरकार इसे केवल अर्थशास्त्र की नज़र से नहीं देख सकती और उसे आम उपभोक्ता को बचाने के लिए हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा."

वह आगे कहते हैं, "यदि होर्मुज़ नहीं खुला और तेल वहां फंसा रहा तो भारत में आगे भी तेल के दाम बढ़ना तय है. भारत सरकार के पास इस मामले में बहुत सीमित विकल्प हैं."


रणनीतिक तेल भंडार पर भी बढ़ रहा दबाव

बढ़ते तेल दामों और घटते आयात का असर भारत के रणनीतिक तेल भंडार पर भी पड़ रहा है।

नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "भारत के पास सिर्फ़ पचास दिन के ही स्ट्रेटेजिक रिज़र्व हैं. हम 57 लाख बैरल तेल प्रतिदिन खपत करते हैं, यदि यही चलता रहा तो इससे स्ट्रेटेजिक रिज़र्व पर दबाव बढ़ सकता है."


वहीं प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि सरकार ऊर्जा संकट को समय रहते समझ नहीं पाई।

वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि सरकार ने क़दम उठाने में लगभग 75 दिन की देरी कर दी. यदि सरकार ऊर्जा संकट का सही अंदाज़ा लगाकर रिफ़ाइंड उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा देती तो इससे हम क्रूड बचा सकते थे, अप्रैल महीने में हमने क्रूड से जो रिफ़ाइंड उत्पाद तैयार किए उसका पैंतीस प्रतिशत तक निर्यात कर दिया. यह उत्पाद घरेलू ज़रूरतों को पूरा करने में काम आ सकते थे."


150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है क्रूड

विश्लेषकों को आशंका है कि यदि मध्य पूर्व संकट लंबे समय तक जारी रहा तो कच्चे तेल की कीमतें और तेजी से बढ़ सकती हैं।

नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "यदि मध्य पूर्व संकट आगे छह महीने और खिंच गया तो क्रूड का 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचना हैरान नहीं करेगा, ये स्थिति भारत के लिए और भी जटिल हो सकती है."

प्रोफेसर अरुण कुमार भी इसी राय से सहमत हैं। उनका कहना है, "जब तक होर्मुज़ नहीं खुलेगा, ऊर्जा बाज़ार में संकट बरक़रार रहेगा और यदि यह लंबा चला तो यह भारत की अर्थव्यवस्था को सुस्ती में बदल सकता है."



कमजोर रुपया और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय रुपये और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ रहा है।

पिछले साल नवंबर में डॉलर के मुकाबले रुपया 83-84 के स्तर पर था, जो अब गिरकर 96 रुपए प्रति डॉलर के नीचे पहुंच गया है।

भारत अपनी करीब 90 प्रतिशत तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है और अधिकतर भुगतान डॉलर में किया जाता है। ऐसे में कमजोर होते रुपए की वजह से भारत के लिए तेल खरीदना और महंगा हो गया है।

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी घटकर करीब 700 अरब डॉलर रह गया है। हालांकि यह अभी भी मजबूत माना जाता है, लेकिन यदि लंबे समय तक तेल महंगा रहा तो इस पर और दबाव बढ़ सकता है।

नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय बाजार के अंदर से लगभग 15% तेल इस समय ग़ायब है और आने वाले दिनों में तेल, पेट्रोल, डीज़ल, एलपीजी और सीएनजी की क़ीमतें बढ़ना तय है. भारत को महंगा कच्चा तेल डॉलर में ख़रीदना होगा, इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ेगा."



आम आदमी पर सबसे ज्यादा असर

हाल ही में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था, "यदि पश्चिम एशिया संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारत में पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें और बढ़ सकती हैं."

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है और बैंकिंग व्यवस्था स्थिर बनी हुई है।

इसके बावजूद आर्थिक विश्लेषक मानते हैं कि महंगे कच्चे तेल का सबसे बड़ा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ रहा है।

प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, "एनर्जी की शॉर्टेज का मतलब है कि उत्पादन क्षेत्र प्रभावित होगा क्योंकि कोई भी उत्पादन बिना ऊर्जा के नहीं हो सकता. यह एक सप्लाई शॉक है, जिससे उत्पादन कम होगा और क़ीमतें बढ़ेंगी, इन बढ़ती क़ीमतों का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा."

उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए वास्तविक महंगाई सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा महसूस हो रही है। दस रुपए में मिलने वाली चाय अब करीब पंद्रह रुपए की हो गई है। दूध महंगा हो चुका है और घरेलू गैस सिलेंडर भी लोगों के बजट पर भारी पड़ रहा है।


प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं, "आम आदमी और ग़रीब के लिए महंगाई की दर 3.5% नहीं बल्कि 20-30-40% हो गई है, क्योंकि गैस और आवश्यक वस्तुओं (दूध, रोटी) के दाम बहुत बढ़ गए हैं."


क्या भारत स्टैगफ्लेशन की ओर बढ़ रहा है?

विश्लेषकों के मुताबिक, एक तरफ उत्पादन में ठहराव है तो दूसरी तरफ महंगाई लगातार बढ़ रही है।

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "हम स्टैगफ्लेशन की स्थिति में आ गए हैं, जहाँ एक तरफ उत्पादन में ठहराव है और दूसरी तरफ़ महंगाई बढ़ रही है. यदि यही चलता रहा, तो मंदी आ जाएगी."

विशेषज्ञों को सबसे ज्यादा चिंता असंगठित क्षेत्र को लेकर है। यदि उत्पादन घटता है तो रोजगार पर असर पड़ेगा और इसका सबसे बड़ा नुकसान दिहाड़ी मजदूरों और कम आय वाले लोगों को हो सकता है।

प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं, "हाल के दिनों में महंगाई और कम वेतन से परेशान मज़दूरों ने नोएडा और देश के कई शहरों में प्रदर्शन किए. असंगठित क्षेत्र पहले से ही दबाव में है, यदि मौजूदा स्थिति आगे और गंभीर हुई भारत की एक बड़ी आबादी के लिए हालात मुश्किल हो सकते हैं."



सरकार क्या कदम उठा रही है?

भारत सरकार और आर्थिक अधिकारियों ने हाल के दिनों में कई बयान जारी कर कहा है कि सरकार कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से पैदा हो रहे संकट से निपटने के लिए लगातार कदम उठा रही है।

सरकार ने दावा किया है कि ग्लोबल ऑयल शॉक से जनता को राहत देने के लिए एक्साइज़ ड्यूटी में दस रुपए प्रति लीटर की कटौती की गई है।

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था कि सरकार डीजल निर्यात पर लेवी लगा रही है ताकि घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। सरकार का कहना है कि देश में ईंधन की तत्काल कोई कमी नहीं है।

वहीं आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि केंद्रीय बैंक महंगाई के दबाव पर लगातार नजर बनाए हुए है।

हालांकि प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का मानना है कि सरकार को और बड़े कदम उठाने की जरूरत है।


वे कहते हैं, "इस बड़े संकट से निपटने के लिए सरकार को विपक्ष को भरोसे में लेना चाहिए और फ़िज़ूलख़र्ची पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय आम सहमति बनानी चाहिए."

नरेंद्र तनेजा का कहना है, "दैनिक ज़रूरतों में कटौती और फ़िज़ूलख़र्ची कम करना इस संकट को कम करने का एक तरीक़ा हो सकता है. लेकिन बहुत कुछ फिलहाल अंतरराष्ट्रीय हालात पर निर्भर करेगा."