भारत में कमजोर मानसून का अलर्ट: खरीफ फसलों को बचाने के लिए सरकार ने बनाई रणनीति

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत में इस बार मानसून की सुस्त रफ्तार ने चिंता बढ़ा दी है। सामान्य से कम बारिश होने की आशंका को देखते हुए सरकार ने अभी से खास तैयारियां शुरू कर दी हैं, ताकि फसलों पर इसका बुरा असर न पड़े।
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केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को बताया कि मानसून के इस सीजन में अब तक औसत से करीब 43 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसके साथ ही मौसम विभाग ने अनुमान जताया है कि 2 जुलाई को समाप्त होने वाले सप्ताह तक बारिश की यह स्थिति ऐसी ही कमजोर बनी रह सकती है।

भारत में सालभर में होने वाली कुल बारिश का करीब 70 फीसदी हिस्सा मानसून से ही मिलता है। 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले इस देश में पानी के स्रोतों को दोबारा भरने के लिए यह बारिश बेहद जरूरी है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि के पास सिंचाई का कोई साधन नहीं है और भारत की करीब आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से खेती-किसानी पर ही निर्भर है।


अर्थव्यवस्था और खेती पर असर का डर

आमतौर पर मानसून 1 जून को दक्षिण-पश्चिम भारत के केरल तट पर दस्तक देता है और वहां से आगे बढ़ते हुए पूरे उत्तर भारत में फैलता है। देश की आर्थिक सेहत के लिए यह बारिश बहुत मायने रखती है, क्योंकि इसी के भरोसे किसान कपास, सोयाबीन, गन्ना, धान और मक्का जैसी जरूरी फसलों की बुवाई करते हैं। इस साल केरल में मानसून अपने तय समय से तीन दिन की देरी से पहुंचा, जिससे भारत की 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

मौसम में आ रहे बदलावों (क्लाइमेट चेंज) की वजह से बारिश का तरीका बदल रहा है और भारत में औसत तापमान भी बढ़ रहा है। इसके अलावा इस साल 'अल नीनो' के असर के कारण कम बारिश होने की चेतावनियां पहले ही जारी की जा चुकी हैं।