Iran-Israel War Impact: खाद कंपनियों ने घटाया यूरिया का प्रोडक्शन, जानें किसानों पर क्या होगा इसका असर
पश्चिम एशिया में जारी ईरान और इजरायल के बीच तनाव ने अब भारतीय खेतों की चिंता बढ़ा दी है। सुनने में यह एक भू-राजनीतिक मुद्दा लग सकता है, लेकिन इसका सीधा असर भारत के यूरिया उत्पादन और खाद की कीमतों पर पड़ने लगा है। भारतीय किसानों के लिए यह खबर इसलिए बड़ी है क्योंकि यूरिया खेती के लिए सबसे जरूरी पोषक तत्व है और इसकी कमी या बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर खेती की लागत को प्रभावित करती हैं।
आइए जानते हैं कि सात समंदर पार छिड़ी इस जंग ने भारत की खाद फैक्ट्रियों और आपकी जेब पर कैसे दस्तक दी है।
यूरिया उत्पादन में क्यों आई गिरावट?
भारत में यूरिया का उत्पादन मुख्य रूप से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) पर निर्भर करता है। यूरिया बनाने के लिए एलएनजी का इस्तेमाल कच्चे माल और ईंधन, दोनों के तौर पर होता है। भारत अपनी जरूरत की लगभग 40-45 प्रतिशत एलएनजी कतर जैसे खाड़ी देशों से आयात करता है।
युद्ध के चलते सप्लाई चैन बुरी तरह प्रभावित हुई है। कतर के प्रमुख संयंत्रों ने 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) की घोषणा कर दी है, जिसका मतलब है कि युद्ध जैसे हालातों के कारण वे अब गैस की सप्लाई का अपना कॉन्ट्रैक्ट पूरा नहीं कर पा रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि भारत की प्रमुख खाद कंपनियों, जैसे इफ्को (IFFCO), ने अपने कुछ प्लांट में उत्पादन घटाना शुरू कर दिया है।
शिपिंग रूट और बढ़ता खर्च
जंग की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते लगभग बंद या बाधित हो गए हैं। दुनिया का लगभग एक-तिहाई यूरिया व्यापार इसी रास्ते से होता है।
माल ढुलाई में उछाल: समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ने से जहाजों का बीमा और माल ढुलाई (Freight) का खर्च दोगुना हो गया है।
कच्चे माल की कमी: यूरिया के अलावा डीएपी (DAP) बनाने में इस्तेमाल होने वाले सल्फर और अमोनिया की सप्लाई भी इसी क्षेत्र से होती है, जिस पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
क्या देश में खाद की किल्लत होगी?
राहत की बात यह है कि फिलहाल देश में खाद का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। फरवरी के अंत तक यूरिया का स्टॉक पिछले साल के मुकाबले बेहतर था। हालांकि, चिंता का विषय खरीफ सीजन (जून से शुरू) है। अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है और गैस की सप्लाई बहाल नहीं होती, तो जून के महीने में जब किसान बुवाई की तैयारी करेंगे, तब यूरिया की कमी महसूस हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति एक-दो हफ्ते में नहीं सुधरी, तो सरकार को महंगे दामों पर खाद का आयात करना पड़ सकता है, जिससे सरकारी खजाने पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा।
किसानों के लिए क्या है सलाह?
हालाँकि सरकार स्थिति पर करीब से नजर रख रही है और वैकल्पिक रास्तों (जैसे रूस से आयात) पर विचार कर रही है, फिर भी किसानों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:
ईरान-इजरायल युद्ध केवल मिसाइलों और टैंकों की लड़ाई नहीं है, यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह कैसे अपने किसानों को इस अंतरराष्ट्रीय संकट के असर से बचाकर रखता है। समय पर की गई तैयारी ही खरीफ की फसल को सुरक्षित रख सकती है।
आइए जानते हैं कि सात समंदर पार छिड़ी इस जंग ने भारत की खाद फैक्ट्रियों और आपकी जेब पर कैसे दस्तक दी है।
यूरिया उत्पादन में क्यों आई गिरावट?
भारत में यूरिया का उत्पादन मुख्य रूप से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) पर निर्भर करता है। यूरिया बनाने के लिए एलएनजी का इस्तेमाल कच्चे माल और ईंधन, दोनों के तौर पर होता है। भारत अपनी जरूरत की लगभग 40-45 प्रतिशत एलएनजी कतर जैसे खाड़ी देशों से आयात करता है।युद्ध के चलते सप्लाई चैन बुरी तरह प्रभावित हुई है। कतर के प्रमुख संयंत्रों ने 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) की घोषणा कर दी है, जिसका मतलब है कि युद्ध जैसे हालातों के कारण वे अब गैस की सप्लाई का अपना कॉन्ट्रैक्ट पूरा नहीं कर पा रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि भारत की प्रमुख खाद कंपनियों, जैसे इफ्को (IFFCO), ने अपने कुछ प्लांट में उत्पादन घटाना शुरू कर दिया है।
शिपिंग रूट और बढ़ता खर्च
जंग की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते लगभग बंद या बाधित हो गए हैं। दुनिया का लगभग एक-तिहाई यूरिया व्यापार इसी रास्ते से होता है।माल ढुलाई में उछाल: समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ने से जहाजों का बीमा और माल ढुलाई (Freight) का खर्च दोगुना हो गया है।
कच्चे माल की कमी: यूरिया के अलावा डीएपी (DAP) बनाने में इस्तेमाल होने वाले सल्फर और अमोनिया की सप्लाई भी इसी क्षेत्र से होती है, जिस पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
क्या देश में खाद की किल्लत होगी?
राहत की बात यह है कि फिलहाल देश में खाद का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। फरवरी के अंत तक यूरिया का स्टॉक पिछले साल के मुकाबले बेहतर था। हालांकि, चिंता का विषय खरीफ सीजन (जून से शुरू) है। अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है और गैस की सप्लाई बहाल नहीं होती, तो जून के महीने में जब किसान बुवाई की तैयारी करेंगे, तब यूरिया की कमी महसूस हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति एक-दो हफ्ते में नहीं सुधरी, तो सरकार को महंगे दामों पर खाद का आयात करना पड़ सकता है, जिससे सरकारी खजाने पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा।
किसानों के लिए क्या है सलाह?
हालाँकि सरकार स्थिति पर करीब से नजर रख रही है और वैकल्पिक रास्तों (जैसे रूस से आयात) पर विचार कर रही है, फिर भी किसानों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए: - जरूरत से ज्यादा भंडारण न करें: स्टॉक फिलहाल ठीक है, इसलिए घबराहट में खाद जमा न करें।
- वैकल्पिक खाद का उपयोग: यूरिया के अत्यधिक उपयोग के बजाय नैनो यूरिया या अन्य जैविक विकल्पों के बारे में जानकारी लें।
- सरकारी अपडेट पर नजर रखें: अपनी नजदीकी सहकारी समितियों के संपर्क में रहें।
ईरान-इजरायल युद्ध केवल मिसाइलों और टैंकों की लड़ाई नहीं है, यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह कैसे अपने किसानों को इस अंतरराष्ट्रीय संकट के असर से बचाकर रखता है। समय पर की गई तैयारी ही खरीफ की फसल को सुरक्षित रख सकती है।
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