लगातार दूसरी बार क्यों लड़खड़ाया इसरो का 'वर्कहॉर्स'? जानें PSLV-C62 की पूरी कहानी
आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र पर माहौल तनावपूर्ण लेकिन उत्साह से भरा था। सुबह के ठीक 10 बजकर 18 मिनट पर रॉकेट ने उड़ान भरी। शुरुआती चरण बिल्कुल सटीक थे। रॉकेट के पहले और दूसरे चरण ने अपना काम बखूबी किया और ऐसा लग रहा था कि इसरो एक और कामयाबी की ओर बड़ रहा है। लेकिन तभी राॅकेट में कुछ तकनीकी खराबी आ गई और राॅकेट अपने रास्ते से भटक गया।
तीसरे चरण की सॉलिड मोटर के प्रदर्शन के दौरान रॉकेट अपने निर्धारित रास्ते (फ्लाइट पाथ) से भटक गया। इस भटकाव के कारण रॉकेट वह जरूरी गति हासिल नहीं कर पाया जो सैटेलाइट्स को उनकी कक्षा में स्थापित करने के लिए अनिवार्य थी। इसरो प्रमुख ने बाद में पुष्टि की कि तीसरे चरण के अंत तक सब ठीक था, लेकिन उसके तुरंत बाद आई गड़बड़ी ने पूरे मिशन पर पानी फेर दिया।
इसके साथ ही रॉकेट में 15 अन्य छोटे सैटेलाइट भी मौजूद थे, जिनमें कुछ भारतीय स्टार्टअप्स और विदेशी सहयोगियों के पेलोड शामिल थे। गति और दिशा में आई कमी के कारण ये सभी 16 सैटेलाइट अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच पाए। वैज्ञानिकों के अनुसार, या तो ये अंतरिक्ष के अंधेरे में कहीं खो गए हैं या फिर पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय जलकर नष्ट हो गए हैं।
तीसरा चरण के बाद क्या हुआ था?
जैसे ही मिशन अपने तीसरे चरण (PS3 स्टेज) के अंत की ओर बढ़ा, वैज्ञानिकों ने पाया कि रॉकेट के व्यवहार में अस्थिरता आ रही है। तकनीकी भाषा में इसे 'रोल रेट डिस्टर्बेंस' कहा गया। सरल शब्दों में कहें तो रॉकेट अपनी धुरी पर जिस गति और स्थिरता से घूमना चाहिए था, वह संतुलन खो बैठा।तीसरे चरण की सॉलिड मोटर के प्रदर्शन के दौरान रॉकेट अपने निर्धारित रास्ते (फ्लाइट पाथ) से भटक गया। इस भटकाव के कारण रॉकेट वह जरूरी गति हासिल नहीं कर पाया जो सैटेलाइट्स को उनकी कक्षा में स्थापित करने के लिए अनिवार्य थी। इसरो प्रमुख ने बाद में पुष्टि की कि तीसरे चरण के अंत तक सब ठीक था, लेकिन उसके तुरंत बाद आई गड़बड़ी ने पूरे मिशन पर पानी फेर दिया।
'अन्वेषा' और अन्य सैटेलाइट का क्या हुआ?
इस मिशन का मुख्य हीरो 'अन्वेषा' (EOS-N1) सैटेलाइट था। यह कोई साधारण उपग्रह नहीं था बल्कि रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) का एक हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट था। इसे भारत की 'दिव्य दृष्टि' माना जा रहा था, जो सीमा पर होने वाली गतिविधियों पर पैनी नजर रखने में सक्षम था। घने जंगलों या बादलों के बीच छिपे दुश्मनों को पहचानने के लिए यह सेना के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार साबित होने वाला था।इसके साथ ही रॉकेट में 15 अन्य छोटे सैटेलाइट भी मौजूद थे, जिनमें कुछ भारतीय स्टार्टअप्स और विदेशी सहयोगियों के पेलोड शामिल थे। गति और दिशा में आई कमी के कारण ये सभी 16 सैटेलाइट अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच पाए। वैज्ञानिकों के अनुसार, या तो ये अंतरिक्ष के अंधेरे में कहीं खो गए हैं या फिर पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय जलकर नष्ट हो गए हैं।
लगातार दूसरी बार लगा झटका
पीएसएलवी के साथ यह घटना पहली बार नहीं हुई है। इसे 'नर्वस नाइंटीज' का शिकार माना जा रहा है। मई 2025 में पीएसएलवी-सी61 मिशन के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ था। उस समय भी तीसरे चरण में तकनीकी दिक्कत आई थी और अब सी62 में भी लगभग वैसी ही समस्या का सामना करना पड़ा है। लगातार दो विफलताओं ने इस रॉकेट की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं, जो अब तक अपने 95% से अधिक सफलता दर के लिए जाना जाता था।Next Story