Explainer: कलिता माझी: घरेलू काम से विधानसभा तक पहुंचने का प्रेरक सफर

Newspoint
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में कई बड़े राजनीतिक संदेश सामने आए, लेकिन औसग्राम विधानसभा सीट से कलिता माझी की जीत ने सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान खींचा है। घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली कलिता माझी अब पश्चिम बंगाल की विधायक बन गई हैं। उनकी यह जीत सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत और राजनीतिक सफर की एक अलग कहानी बन गई है।
Hero Image


भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल चुनाव में बड़ी सफलता मिली है। पार्टी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों तक सिमट गई। इसी जीत के बीच औसग्राम विधानसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार कलिता माझी ने टीएमसी के श्यामा प्रसन्ना लोहार को 12,535 वोटों से हराया।

साधारण घर से शुरू हुई विधायक बनने की कहानी


कोलकाता से करीब तीन घंटे दूर बर्धवान के घुस्कुरा माछपुर पारा की एक संकरी गली में कलिता माझी का घर है। कुछ दिन पहले तक यही घर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का केंद्र था, जहां से वह घरेलू सहायिका के रूप में काम करने जाया करती थीं।


कलिता माझी के परिवार में उनके पति, दो देवर और उनकी मां साथ रहते हैं। छोटे से घर में रहने वाली कलिता के लिए राजनीति तक पहुंचना आसान नहीं था। खासकर तब, जब चुनाव लड़ना आज के समय में काफी खर्चीला माना जाता है।

2014 से शुरू हुआ राजनीतिक सफर


कलिता माझी का राजनीतिक सफर अचानक शुरू नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि वह साल 2014 में बीजेपी की बूथ एजेंट थीं। इसके बाद 2019 में उन्हें घुस्कुरा नगर की जिम्मेदारी दी गई और वह नगर की पार्टी सचिव बनीं।


वह बताती हैं, "मैं साल 2014 में पार्टी की बूथ एजेंट थी. फिर साल 2019 में मुझे घुस्कुरा नगर की ज़िम्मेदारी दी गई. मैं नगर की पार्टी सचिव थी. फिर साल 2021 में पार्टी ने मुझे विधानसभा चुनावों के लिए टिकट दिया."

2021 के विधानसभा चुनाव में कलिता माझी को टीएमसी के अभेदानंद थंडर ने 11,815 वोटों से हराया था। लेकिन हार के बाद भी उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी।

हार के बाद भी नहीं रुकीं कलिता माझी


2021 में हार के बाद भी कलिता माझी पार्टी संगठन में सक्रिय रहीं। साल 2022 में उन्हें बर्धवान जिले की पार्टी सचिव बनाया गया। 2024 में उन्होंने एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह काम किया और 2025 में बोलपुर जिले की पार्टी महासचिव बनीं।

वह बताती हैं, "साल 2022 में मुझे बर्धवान ज़िले के लिए पार्टी सचिव नियुक्त किया गया. 2024 में मैंने पार्टी के लिए एक आम कार्यकर्ता के तौर पर काम किया. साल 2025 में मुझे बोलपुर ज़िले के लिए पार्टी का महासचिव बनाया गया और 2026 में पार्टी ने मुझे फिर से विधानसभा चुनाव के लिए टिकट दिया."


यही लगातार मेहनत 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उनकी जीत की बड़ी वजह बनी।

विधायक बनने का सपना भी नहीं देखा था


कलिता माझी कहती हैं कि उन्होंने कभी विधायक बनने की कल्पना भी नहीं की थी। आर्थिक रूप से साधारण परिवार से आने वाली कलिता के लिए यह सफर खुद उनके लिए भी अप्रत्याशित था।

वह कहती हैं, "नहीं, नहीं. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं विधायक बन सकती हूँ, क्योंकि मैं एक साधारण परिवार से हूँ. मेरे माता-पिता पैसे वाले नहीं हैं और मेरे ससुराल वाले भी आर्थिक रूप से उतने मज़बूत नहीं हैं."

वह आगे कहती हैं, "घर चलाने के लिए मैं एक घरेलू सहायिका के तौर पर काम करती थी. मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी और न ही कभी सपना देखा था कि मैं इस मुकाम तक पहुंच पाऊंगी. सिर्फ़ बीजेपी जैसी पार्टी ही ऐसी चीज़ें मुमकिन कर सकती है और हम जैसे लोगों को मौक़ा दे सकती है."

2021 में टिकट मिला तो रो पड़ी थीं


कलिता माझी के मुताबिक, पहली बार टिकट मिलने पर वह भावुक हो गई थीं। उन्हें खुद भरोसा नहीं था कि वह इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल पाएंगी।


उन्होंने कहा, "मैंने कभी टिकट मिलने के बारे में सोचा भी नहीं था. साल 2021 में जब पार्टी ने मुझे टिकट दिया, तो मैं सचमुच रो रही थी और सोच रही थी कि 'पार्टी ने मेरे साथ यह क्या किया?' मुझे पता नहीं था कि क्या मैं यह सब संभाल पाऊँगी?"

उन्होंने यह भी बताया कि 2021 के चुनाव में चंद्रचूड़ पात्रा और प्रदीप तिवारी ने उनकी काफी मदद की थी।

परिवार का साथ बना सबसे बड़ी ताकत


कलिता माझी के राजनीतिक सफर में उनके परिवार का अहम योगदान रहा। खासकर उनके ससुर ने उन्हें राजनीति में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

कलिता याद करती हैं, "साल 2021 में, जब मेरे ससुर को पता चला कि पार्टी मुझे टिकट देने पर विचार कर रही है तो वो मेरे पास आए और पूछा कि बौमा (बहू), क्या तुम अपनी पूरी ज़िंदगी एक घरेलू सहायिका के तौर पर ही काम करती रहोगी? तुम हमारे लिए तो इतना कुछ कर ही रही हो, पर क्या तुम समाज के लिए कुछ नहीं करोगी?"

हालांकि उनके ससुर अब इस दुनिया में नहीं हैं। करीब दो साल पहले उनका निधन हो गया। लेकिन कलिता मानती हैं कि विधायक बनने की राह में उनके ससुर की भूमिका सबसे अहम रही।

You may also like



शादी के बाद शुरू किया घरेलू सहायिका का काम


कलिता माझी की शादी 2006 में हुई थी। शादी के बाद दो साल तक उन्होंने घर और बच्चों की देखभाल की। लेकिन परिवार की आर्थिक हालत कमजोर थी, इसलिए उन्हें काम पर निकलना पड़ा।

वह बताती हैं, "जब मेरा बेटा तीन या चार साल का था, तब मैंने एक मेड के तौर पर काम करना शुरू कर दिया. हमारी आर्थिक हालत कमज़ोर थी. एक-दूसरे की मदद से हमने किसी तरह परिवार में चीज़ों को संभाला."

साल 2008 से उन्होंने घरेलू सहायिका के रूप में काम शुरू किया। यह सिलसिला उनके विधायक बनने से कुछ दिन पहले तक जारी रहा।

टिकट मिलने के बाद भी करती रहीं काम


विधानसभा चुनाव का टिकट मिलने के बाद भी कलिता माझी ने तुरंत अपना काम नहीं छोड़ा। वह सात दिन तक घरेलू सहायिका के तौर पर काम करती रहीं।

वह बताती हैं, "विधानसभा का टिकट मिलने के बाद भी, मैंने अगले सात दिनों तक एक मेड के तौर पर काम किया. अपना नॉमिनेशन फ़ाइल करने और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के दायरे में आने के बाद, मैंने यह काम बंद कर दिया, क्योंकि चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, उम्मीदवार सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक प्रचार कर सकते हैं."


उन्होंने आगे कहा, "अगर मैं एक घरेलू सहायिका के तौर पर काम करती, तो मैं प्रचार नहीं कर पाती. उस समय जिन लोगों के घरों में मैं काम करती थी, उन्होंने मुझसे कहा कि बहू पार्टी ने तुम्हें एक बड़ी ज़िम्मेदारी दी है. घर के काम की चिंता मत करो, हम यह संभाल लेंगे. पार्टी ने तुम्हें बहुत बड़ा सम्मान दिया है."

कलिता माझी की जीत क्यों है खास?


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कलिता माझी की जीत सिर्फ बीजेपी की चुनावी सफलता नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी भी है, जिसमें एक घरेलू सहायिका मेहनत, संगठन और लगातार संघर्ष के दम पर विधायक बनती है।

औसग्राम विधानसभा सीट से उनकी जीत उन लोगों के लिए भी प्रेरणा बन गई है, जो मानते हैं कि राजनीति सिर्फ बड़े परिवारों या आर्थिक रूप से मजबूत लोगों तक सीमित है।












Loving Newspoint? Download the app now
Newspoint