'कोई भी आप पर भरोसा नहीं करेगा...आप फेल रहे', सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता फैसले लागू करने में देरी पर केंद्र को फटकारा

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2004 और 2016 के मध्यस्थता फैसलों को लागू करने में देरी पर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। सरकार ने वेदांता लिमिटेड और रवा ऑयल (सिंगापुर) प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में आए दशकों पुराने विदेशी मध्यस्थता फैसलों को लागू होने से रोका था। कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस तरह की कानूनी कार्यवाही से भारत की मध्यस्थता व्यवस्था में भरोसा कम होगा।



जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने उठाए सवालबार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन सिंह की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के मध्यस्थता निर्णयों को लागू करने के नजरिये पर सवाल उठाए, जिसमें 2004 और 2016 में पारित निर्णयों को लागू करने की अनुमति दी गई थी।



भारत सरकार बनाम वेदांता के इस मामले में पीठ ने मध्यस्थता के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाया और सम्मेलनों और सेमिनारों में मध्यस्थता पर चर्चाओं का हवाला दिया, जबकि पक्षकार निर्णयों को लागू करने का विरोध करते रहे।



पीठ ने सरकार को दी चेतावनीपीठ ने सरकार को चेतावनी दी कि इस तरह के मुकदमे मध्यस्थता प्रक्रिया में विश्वास को कम कर सकते हैं। सुनवाई के दौरान, बेंच ने विवाद के इतने लंबे समय तक चलने पर सवाल उठाया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि पहला मध्यस्थता फैसला 2004 में आया था, जबकि अंतिम फैसला 2016 में दिया गया।



कृष्णा-गोदावरी बेसिन से जुड़ा है मामला
  • यह विवाद कृष्णा-गोदावरी बेसिन में 'रव्वा' तेल क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार और कंपनियों के एक समूह के बीच 1994 में हुए 'प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट' से शुरू हुआ। कॉन्ट्रैक्ट की व्याख्या को लेकर हुए विवाद के कारण कुआलालंपुर में मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) की प्रक्रिया शुरू हुई।
  • अक्टूबर 2004 में, मध्यस्थ न्यायाधिकरण (आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल) ने एक आंशिक फैसला सुनाया, लेकिन इसमें रकम तय करने (क्वांटिफिकेशन) का मुद्दा अनसुलझा रह गया। बाद में, 2011 में मलेशियाई संघीय न्यायालय ने इस फैसले को बरकरार रखा।

सरकार ने 2014 में जारी किया था कारण बताओ नोटिसजुलाई 2014 में, सरकार ने कंपनियों को 'कारण बताओ नोटिस' जारी किए, जिसमें उनसे लगभग 99 मिलियन डॉलर की वसूली की मांग की गई। इसके बाद, अक्टूबर 2016 में पुनर्गठित न्यायाधिकरण ने एक अंतिम फैसला सुनाया। सरकार ने इस फैसले को लागू करने का विरोध किया। इसके लिए उन्होंने समय-सीमा (लिमिटेशन), सार्वजनिक नीति और न्यायाधिकरण के अधिकार समाप्त हो जाने जैसे तर्क दिए।


सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में नहीं दिया दखल
  • 1 जुलाई 2026 को, दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस जसमीत सिंह ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि फैसले को लागू करने की याचिका समय-सीमा के भीतर है और रकम तय करने के मामले में न्यायाधिकरण के पास अधिकार क्षेत्र बना हुआ है। उच्च न्यायालय ने बैंक गारंटी को जारी करने का भी निर्देश दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की उन टिप्पणियों का भी जिक्र किया, जो कंपनियों से पैसे की वसूली के लिए सरकार द्वारा 'कारण बताओ नोटिस' (शो-कॉज नोटिस) जारी किए जाने के बाद मध्यस्थ ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन से जुड़ी थीं। आखिरकार बेंच को हाई कोर्ट के निष्कर्षों में दखल देने का कोई कारण नहीं दिखा।
  • अपील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हमारी राय में, हाई कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले और आदेश में कोई गलती नहीं है, कानून से जुड़ी गलती की तो बात ही छोड़ दें।' केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी पेश हुए। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अखिल सिब्बल दिल्ली हाई कोर्ट में वेदांता और रवा ऑयल की ओर से पेश हुए थे।