हवा में लटकता सोमनाथ ज्योतिर्लिंग ...भारत की ऐसी अद्भुत इंजीनियरिंग देख चक्कर खा गया था महमूद गजनवी
नई दिल्ली: ये कैसी मूर्ति है? तलवार चलाने पर भी नहीं गिरती है...आखिर क्या है इसका राज? कुछ ऐसे ही सवाल आज से हजार साल पहले तब अफगानिस्तान के गजनी से आए मुसलमान आक्रमणकारी महमूद गजनवी के सिपहसालारों ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण के दौरान अपने आका के सामने बयां की होगी। महमूद गजनवी ने उस आक्रमण के दौरान सब कुछ तहस-नहस कर दिया, मगर इस मूर्ति का कुछ भी बिगाड़ नहीं पाया। बाद में किसी भेदिए ने जब मूर्ति की लटकने की तकनीक खोली तब जाकर मूर्ति नीचे आ पाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर में थे, जहां आयोजित ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ में वह शामिल हुए। सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 साल पूरे होने पर यह भव्य धार्मिक आयोजन किया गया था।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हवा में लटकती रहती थी
सोमनाथ मंदिर की तैरती हुई मूर्ति (ज्योतिर्लिंग) का विदेशी इतिहास में पहला जिक्र 13वीं सदी के फारसी भूगोलवेत्ता जकारिया अल काजविनी ने अपनी किताब 'अल बिलाद वा अखबार अल इबाद' में किया था। उन्होंने बताया था कि मंदिर की दीवारों और छत पर चुंबक लगे थे, जिससे मूर्ति हवा में लटकती रहती थी। ऐतिहासिक सोर्स के अनुसार, महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर सबसे विध्वंसक आक्रमण जनवरी 1026 ईस्वी में किया था। यह उसका भारत पर 16वां या 17वां आक्रमण माना जाता है, जिसका मकसद मंदिर की अपार संपत्ति को लूटना था। इतिहासकारों के अनुसार, जब महमूद गजनवी सोमनाथ मंदिर पहुंचा तो वह ज्योतिर्लिंग देखकर दंग रह गया था। उसने अपने आदमियों से मूर्ति और खजाने को लेकर आने को कहा, मगर उसके सैनिक मूर्ति को हिला भी नहीं सके।
सोमनाथ के ज्योतिर्लिंग के पीछे क्या थी साइंस
मूर्ति भंजक था महमूद गजनवी, जमकर लूटी दौलत
इतिहास में महमूद गजनवी खुद को मूर्ति भंजक यानी मूर्ति तोड़ने वाला बताता था। बताया जाता है कि उसने इस्लाम के प्रसार के लिए भारत का रुख किया था, मगर असली सच्चाई यह थी कि वह भारत की बेशुमार दौलत से बेहद प्रभावित था, जो बड़ी मात्रा में मंदिरों में जमा थी। यही वजह थी कि उसने ज्यादातर मंदिरों पर हमले किए। महमूद गजनवी ने 17 बार भारत पर हमले किए थे और अपने साथ बड़ी मात्रा में सोने-चांदी और जवाहरात लूटकर गजनी ले गया था।
भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धि
पीएम मोदी बोले-जय सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया था। इस दौरान 11 पवित्र तीर्थस्थलों के जल से विशेष कुंभाभिषेकम भी किया गया। इसके लिए पांच फुट ऊंचे विशेष पात्र को क्रेन की मदद से मंदिर के शिखर तक पहुंचाया गया। पीएम मोदी ने जय सोमनाथ का उद्घोष करते हुए कहा कि 75 साल पहले हुआ सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कोई साधारण घटना नहीं थी।
उन्होंने कहा कि भारत 1947 में आजाद हुआ था और 1951 में सोमनाथ की प्राण-प्रतिष्ठा ने देश की आजादी की भावना को दुनिया के सामने मजबूती से पेश किया। पीएम मोदी ने सरदार वल्लभभाई पटेल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने 500 से अधिक रियासतों को जोड़कर आधुनिक भारत की नींव रखी। सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण केवल धार्मिक कार्य नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि भारत अपनी प्राचीन गरिमा और सांस्कृतिक पहचान को फिर से स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
सोर्स: रोमिला थापर की किताब 'Somanatha: The Many Voices of a History (2004), Indian Panorama, International Journal of History
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हवा में लटकती रहती थी
सोमनाथ मंदिर की तैरती हुई मूर्ति (ज्योतिर्लिंग) का विदेशी इतिहास में पहला जिक्र 13वीं सदी के फारसी भूगोलवेत्ता जकारिया अल काजविनी ने अपनी किताब 'अल बिलाद वा अखबार अल इबाद' में किया था। उन्होंने बताया था कि मंदिर की दीवारों और छत पर चुंबक लगे थे, जिससे मूर्ति हवा में लटकती रहती थी। ऐतिहासिक सोर्स के अनुसार, महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर सबसे विध्वंसक आक्रमण जनवरी 1026 ईस्वी में किया था। यह उसका भारत पर 16वां या 17वां आक्रमण माना जाता है, जिसका मकसद मंदिर की अपार संपत्ति को लूटना था। इतिहासकारों के अनुसार, जब महमूद गजनवी सोमनाथ मंदिर पहुंचा तो वह ज्योतिर्लिंग देखकर दंग रह गया था। उसने अपने आदमियों से मूर्ति और खजाने को लेकर आने को कहा, मगर उसके सैनिक मूर्ति को हिला भी नहीं सके।
सोमनाथ के ज्योतिर्लिंग के पीछे क्या थी साइंस
- बताया जा रहा है कि यह संभव है कि सोमनाथ मंदिर के प्राचीन वास्तुकारों ने ज्योतिर्लिंग को हवा में तैरता हुआ दिखाने के लिए चुंबकीय सिद्धांत का इस्तेमाल किया गया हो। वास्तुकारों ने छत के चुंबक के रूप में एक बड़े पत्थर, निचले चुंबक के रूप में एक लौह ज्योतिर्लिंग और उनके बीच प्रतिचुंबकीय धातु बिस्मथ की एक पतली परत का इस्तेमाल किया होगा, जिसने जबरदस्त मैग्नीटिक फील्ड बना दिया, जिससे ज्योतिर्लिंग हवा में लटकता रहा।
- बिस्मथ को ज्योतिर्लिंग के स्यमंतक मणि के भीतर छिपाया गया होगा, जो एक सजावटी और प्रतीकात्मक तत्व के रूप में भी कार्य करता होगा। बिस्मथ ने ज्योतिर्लिंग को पत्थर को छूने या जमीन पर गिरने से रोका होगा और एक स्थिर उत्तोलन प्रणाली का निर्माण किया होगा यानी हवा में इसे लटकने के लिए बरकरार रखने में मदद मिली होगी। पत्थर पर सोने की परत या तो एक प्राकृतिक घटना हो सकती है या कृत्रिम अलंकरण। लोहे का ज्योतिर्लिंग उल्कापिंड का एक टुकड़ा भी हो सकता है, जिससे इसकी पवित्रता और दुर्लभता में और वृद्धि हुई होगी।
- वहीं, International Journal of History के अनुसार, यह मूर्ति आयरन-निकल के मेल से बनाई गई होगी। अरब इतिहासकार अबुलफिदा के अनुसार, फरिंगटन के एक लेख के अनुसार, आयरन और निकल के मेल ने मूर्ति को ऐसा चुंबकीय बना दिया, जिसकी ग्रैविटी 7.6 से 7.9 के बीच रही होगी। जिससे यह स्टील से भी सख्त हो गई।
मूर्ति भंजक था महमूद गजनवी, जमकर लूटी दौलत
इतिहास में महमूद गजनवी खुद को मूर्ति भंजक यानी मूर्ति तोड़ने वाला बताता था। बताया जाता है कि उसने इस्लाम के प्रसार के लिए भारत का रुख किया था, मगर असली सच्चाई यह थी कि वह भारत की बेशुमार दौलत से बेहद प्रभावित था, जो बड़ी मात्रा में मंदिरों में जमा थी। यही वजह थी कि उसने ज्यादातर मंदिरों पर हमले किए। महमूद गजनवी ने 17 बार भारत पर हमले किए थे और अपने साथ बड़ी मात्रा में सोने-चांदी और जवाहरात लूटकर गजनी ले गया था।
भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धि
- सोमनाथ मंदिर का भव्य ज्योतिर्लिंग न केवल एक धार्मिक और कलात्मक चमत्कार था, बल्कि यह एक वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धि भी थी। इसने प्राचीन भारतीय वास्तुकारों और धातुविदों के उन्नत ज्ञान और कौशल को दिखाया, जिन्होंने प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल करके और किसी बाहरी शक्ति स्रोत के बिना एक चुंबकीय उत्तोलन प्रणाली का निर्माण किया।
- यह प्राचीन भारतीयों के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को भी दर्शाता है, जो प्रकृति और उसकी शक्तियों को दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में पूजते थे। ज्योतिर्लिंग सृजन और विनाश के देवता और समस्त ऊर्जा एवं पदार्थ के स्रोत भगवान शिव की शक्ति और महिमा का प्रतीक था।
पीएम मोदी बोले-जय सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया था। इस दौरान 11 पवित्र तीर्थस्थलों के जल से विशेष कुंभाभिषेकम भी किया गया। इसके लिए पांच फुट ऊंचे विशेष पात्र को क्रेन की मदद से मंदिर के शिखर तक पहुंचाया गया। पीएम मोदी ने जय सोमनाथ का उद्घोष करते हुए कहा कि 75 साल पहले हुआ सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कोई साधारण घटना नहीं थी।
उन्होंने कहा कि भारत 1947 में आजाद हुआ था और 1951 में सोमनाथ की प्राण-प्रतिष्ठा ने देश की आजादी की भावना को दुनिया के सामने मजबूती से पेश किया। पीएम मोदी ने सरदार वल्लभभाई पटेल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने 500 से अधिक रियासतों को जोड़कर आधुनिक भारत की नींव रखी। सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण केवल धार्मिक कार्य नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि भारत अपनी प्राचीन गरिमा और सांस्कृतिक पहचान को फिर से स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
सोर्स: रोमिला थापर की किताब 'Somanatha: The Many Voices of a History (2004), Indian Panorama, International Journal of History
Next Story