मुगालते न पालें, अमेरिका पूरी तरह बदल चुका है, चीन वाली गलती नहीं दोहरगा ; एक्सपर्ट बोले-गलतफहमी में न रहें भारतीय

Newspoint
नई दिल्लीः कुछ भारतीयों को लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद से हटते ही भारत-अमेरिका के रिश्ते पटरी पर लौट आएंगे। लेकिन यह सोच, भारत के प्रति अमेरिकी नीति में आए संस्थागत बदलाव की अनदेखी है। जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट ब्रह्म चेलानी का कहना है कि भारत को लेकर अमेरिकी नीति में यह बदलाव राष्ट्रपति जो बिडेन के शासन के अंतिम दिनों में आया है। ट्रंप के कार्यकाल में यह और बदलाव तेज हुआ है।
Hero Image


चीन वाली गलती भारत के साथ नहीं दोहराएगा अमेरिकाअसल में, अमेरिका अब यह नहीं मानता कि भारत उसे नुकसान नहीं पहुंचाएगा। अमेरिका भारत के साथ चीन वाली गलती दोहराना नहीं चाहता। अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडी भारत की धरती से यह बात पहले ही कह चुके हैं।



संवेदनशील मुद्दों पर भारत की नाराजगीजब इस हफ्ते की शुरुआत में विदेश मंत्री जयशंकर ने आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं के प्रति वॉशिंगटन के संवेदना न दिखाने की बात कही और अमेरिकी टैरिफ में बदलावों को मुश्किलों की वजह बताया, तो मोदी ने ट्रंप को फोन किया। भारतीय नेतृत्व रणनीतिक वजहों से ट्रंप प्रशासन के साथ अच्छे कामकाजी संबंध बनाए रखना चाहता है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि संवेदनशील मुद्दों पर भारत की नाराजगी साफ तौर पर जाहिर हो।


भारत सरकार का यह रवैया उन आलोचकों को भी जवाब है जो नई दिल्ली पर वॉशिंगटन के सामने बहुत ज्याद झुकने का आरोप लगाते हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के दखल के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंट मैथ्यू एरॉन वैनडाइक और उसके छह यूक्रेनी साथियों की रिहाई पर जनता के विरोध ने इस कोशिश को और मजबूत किया है। इन सातों लोगों को भारत की नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने अरेस्ट किया था और उन पर आतंकवादी साजिश रचने और भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया था।


मुश्किल सच्चाई का सामना करना होगाब्रह्म चेलानी का कहना है कि सिर्फ ट्रंप के जाने का इंतजार करने से पुराने अमेरिका-भारत रिश्ते बहाल नहीं होंगे। भारत के बारे में वॉशिंगटन के नजरिए में आया बुनियादी बदलाव ट्रंप के आने से पहले का है और उनके जाने के बाद भी इसके बने रहने की संभावना है। नई दिल्ली को अमेरिकी नीति के हिसाब से खुद को ढालना होगा, जो भारत के उभार को सिर्फ एक रणनीतिक मौके के तौर पर नहीं, बल्कि आर्थिक और भू-राजनीतिक टकराव की वजह के तौर पर भी देखती है।