पुश्तैनी संपत्ति में 'घर दामाद' का हक? सुप्रीम कोर्ट ने चाचा की दौलत पर उरांव आदिवासी भतीजी के पति का दावा ठुकराया
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उरांव आदिवासियों में उत्तराधिकार की परंपरा पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। गुरुवार को सुनाए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उरांव परंपरा के अनुसार कोई व्यक्ति अपनी भतीजी के पति को 'घर दामाद' घोषित कर अपना उत्तराधिकारी नहीं बना सकता।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाई कोर्ट के आदेशों को नामंजूर कर दिया है, जिसमें चाचा-ससुर के लिए घर-दामाद की व्यवस्था को मंजूरी दी गई थी। लाइवलॉ के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने कहा,'प्रचलित रिवाजों के अनुसार यह कभी भी स्थापित नहीं है कि एक चाचा ससुर अपनी भतीजी के पति को घर दामाद के रूप स्वीकार कर सकता है।'

उरांव आदिवासी से संबंधित संपत्ति विवाद
किस आधार पर सुनाया घर-दामाद पर फैसला
संपत्ति पर पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, '...संपत्ति के मालिक से सीधे तौर पर जुड़े अन्य पुरुष वारिस की गैर-मौजूदगी में संपत्ति पर हक नजदीकी पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार का होगा। इस कारण से निचली अदालतों के फैसले रद्द किए जाते हैं। मुकदमा वादी के पक्ष में जाता है।'
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाई कोर्ट के आदेशों को नामंजूर कर दिया है, जिसमें चाचा-ससुर के लिए घर-दामाद की व्यवस्था को मंजूरी दी गई थी। लाइवलॉ के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने कहा,'प्रचलित रिवाजों के अनुसार यह कभी भी स्थापित नहीं है कि एक चाचा ससुर अपनी भतीजी के पति को घर दामाद के रूप स्वीकार कर सकता है।'
उरांव आदिवासी से संबंधित संपत्ति विवाद
- झारखंड का यह विवाद सुखु उरांव नाम के एक व्यक्ति की पुश्तैनी संपत्ति से जुड़ा है।
- सुखु ओरांव के तीन बेटे हुए- धुंगरु उरांव, लेदुरा उरांव और भोउला उरांव।
- लेदुरा उरांव की मौत हो गई, जिसके कोई बच्चे नहीं हैं।
- लेदुरा उरांव की भी मौत हो गई, जिसकी एक बेटी है बुधैन।
- धुंगरु उरांव का ही एकमात्र बेटा है बेजला उरांव, जिसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
- बेजला उरांव का दावा है कि लेदुरा और भोउला उरांव का एकमात्र पुरुष सगोत्री होने के नाते वही अपने दोनों चाचा की संपत्ति का पुरुष उत्तराधिकारी है।
किस आधार पर सुनाया घर-दामाद पर फैसला
- प्रतिवादी की दलील थी कि लेदुरा उरांव ने अपनी भतीजी बुधैन के पति पुनाई को घर दामाद बना लिया था, लिहाजा उसकी संपत्ति का वही उत्तराधिकारी है।
- मामला ट्रायल कोर्ट में गया तो उसने घर दामाद वाली थ्योरी को मंजूर कर लिया।
- पहले अपीलीय कोर्ट में भी इस फैसले पर मुहर लगा दी गई।
- यहां तक कि झारखंड हाई कोर्ट ने भी घर दामाद वाली थ्योरी के पक्ष में ही फैसला सुनाया और उरांव परंपरा पर गौर नहीं किया। इसी के खिलाफ वादी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
- उसने दलील दी कि उरांव परंपरा में चाचा ससुर के लिए घर दामाद बनाने जैसी कोई पारंपरिक व्यवस्था मौजूद नहीं है। इसलिए, चाचा की संपत्ति का वह एकमात्र वारिस है।
- अपने फैसले में जस्टिस करोल ने लिखा है कि प्रतिवादी यह स्थापित करने में नाकाम रहे कि स्थापित परंपरा में इस तरह से घर दामाद वाली कोई व्यवस्था मौजूद है।
संपत्ति पर पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, '...संपत्ति के मालिक से सीधे तौर पर जुड़े अन्य पुरुष वारिस की गैर-मौजूदगी में संपत्ति पर हक नजदीकी पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार का होगा। इस कारण से निचली अदालतों के फैसले रद्द किए जाते हैं। मुकदमा वादी के पक्ष में जाता है।'
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