Good News: कभी 'लाल आतंक' का गढ़ था ये गांव, गोलियां नहीं अब सुनाई देती हैं स्कूल की घंटियां

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बालाघाट : एक वक्त था जब मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले का चुक्का गांव पुलिस की फाइलों में 'लाल आतंक' का गढ़ माना जाता था। ये वो इलाका था जहां माओवादी नेता मिलिंद तेलतुम्बडे जैसे बड़े नामों का बोलबाला था और गांव के लोग अनजाने में ही सही, उनके नेटवर्क का हिस्सा बन चुके थे। लेकिन आज इस गांव की कहानी बदल चुकी है। यहां अब गोलियों की गूंज नहीं, बल्कि स्कूल की घंटियां सुनाई देती है और सबसे बड़ी बात ये है कि ये बदलाव किसी बंदूक की जोर पर नहीं, बल्कि शिक्षा की ताकत से आया है।
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एक पुलिस अफसर की अनोखी सोचइस शनदार बदलाव के पीछे हैं 2018 बैच के युवा IPS ऑफिसर और बालाघाट के SP अदित्य मिश्रा उन्होंने महसूस किया कि नक्सलवाद वहीं पनपता है जहां विकास नहीं पहुंचता। ग्राउंड लेवल इंटेलिजेंस से पता चला कि जिन इलाकों में नक्सलियों का प्रभाव सबसे ज्यादा था, वहां के प्राइमरी स्कूल सालों से खंडहर बने हुए थे। जब स्कूल नहीं थे, तो बच्चे मुख्यधारा से कट गए और आसानी से गलत रास्ते पर चले गए। इसी को देखते हुए अदित्य मिश्र ने 'एकल सुविधा केंद्र' के तहत 'विद्यजलि' मुहिम शुरू की। उन्होंने सोचा कि क्यों न इन स्कूलों को फिर से जिंदा किया जाए?

जब पुलिस वालों ने खुद उठाई कुदाल और फावड़ाइस मुहिम की सबसे खास बात ये थी कि पुलिस ने इसे सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रखा। पुलिस के जवानों ने खुद श्रमदान किया। वर्दी पहनकर कानून संभालने वाले हाथों खुद स्कूलों की मरम्मत की पैंट किया और उन्हें संवारा। इसका फायदा ये हुआ कि गांव वालों का पुलिस पर भरोसा बढ़ने लगा और सरकारी खर्च भी बहुत कम आया। जो स्कूल कभी टूटी दीवारों और अंधेरे कमरों वाले थे, आज वे चमक रहे हैं। वहां अब बैठने के लिए अच्छे डेस्क है, रोशनी के लिए बिजली है, पौने का सफ पानी है और बच्चों के लिए टॉयलेट्स और किचन की सुविधा भी है।

250 स्कूलों का कायाकल्पशुरुआत चुक्का टोला के एक छोटे से स्कूल से हुई थी, लेकिन देखते ही देखते ये एक जन-आंदोलन बन गया। लक्ष्य था 2026 तक 100 स्कूलों को सुधारना, लेकिन काम इतनी तेजी से हुआ कि अब तक करीब 250 स्कूलों की सूरत बदली जा चुकी है। एक स्कूल को ठीक करने में औसतन सिर्फ 1.2 लाख रुपये का खर्च आया। ये मुमकिन हो पाया लोगों के सहयोग और पुलिस की मेहनत से इस प्रोजेक्ट के लिए अब तक करीब 3.9 करोड़ रुपये का चंदा इकट्ठा हो चुका है। SP आदित्य मिश्रा और उनके परिवार ने खुद भी स्कूल गोद लिए, जिससे प्रेरित होकर स्थानीय कारोबारियों और आम जनता ने भी दिल खोलकर मदद की।

दिसंबर 2025: एक नई सुबहदिसंबर 2025 में प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर जिले से नक्सलवादके खात्मे का ऐलान कर दिया। सुरक्षा के मोर्चे पर जीत मिलने के बाद अब पूरा ध्यान विकास पर है। 'विद्यांजलि' पोर्टल के जरिए लोग सीधे इस मुहिम से जुड़ रहे हैं और दान दे रहे हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी हुई है।

'मकसद सिर्फ दीवारें रंगना नहीं है, बच्चों का भविष्य बनाना है'बात सिर्फ स्कूलों की पुताई तक सीमित नहीं है। पुलिस अब उन माओवादियों को भी मुख्यधारा में वापस ला रही है जिन्होंने सरेंडर किया है। उन्हें पहचान पत्र (ID), बैंक खाते
और रोजगार दिलाने में मदद की जा रही है ताकि वे भी सम्मान से जी सके। SP आदित्य मिश्रा कहते हैं कि हमारा मकसद सिर्फ दीवारे रंगना नहीं है, बल्कि एक ऐसा भविष्य बनाना है जहां हर बच्चे के पास बेहतर सुविधाए और पढ़ने का मौका हो।