रवींद्र नाथ टैगोर के राष्ट्रवाद से कैसे तालमेल बिठाएगी BJP, पार्टी के सामने कई तरह की चुनौतियां

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पूनम पांण्डे, नई दिल्ली: पहले बीआर आंबेडकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और अब रवींद्र नाथ टैगोर। पिछले एक दशक में BJP ने राष्ट्रीय राजनीति में नए प्रतीकों और महापुरुषों को केंद्र में रखकर अपनी वैचारिक और राजनीतिक जमीन का लगातार विस्तार किया है। उसने न सिर्फ इन नामों का जिक्र किया, बल्कि उनकी विरासत को योजनाओं, स्मारकों, जयंती समारोह और राजनीतिक विमर्श के जरिए नए तरीके से पेश भी किया। अब पश्चिम बंगाल में पार्टी उसी रणनीति को आगे बढ़ाती दिख रही है। रवींद्रनाथ टैगोर के जरिए BJP यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बंगाल की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत पर किसी एक राजनीतिक दल का एकाधिकार नहीं हो सकता।
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शपथ ग्रहण से लेकर संदेश तक
पश्चिम बंगाल में BJP के पहले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह को रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर आयोजित किया गया। पार्टी पर पिछले कई सालों से बंगाल में बाहरी होने का आरोप लगता रहा है। तृणमूल कांग्रेस लगातार यह आरोप लगाती रही कि BJP न तो बंगाल की संस्कृति को समझती है और न ही बंगाली समाज की संवेदनाओं को। ऐसे में टैगोर जयंती पर शपथ ग्रहण समारोह आयोजित कर BJP ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया।

2021 विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी को लगा था कि बंगाल की राजनीति में संस्कृति, भाषा, साहित्य और क्षेत्रीय अस्मिता की गहरी भूमिका है। यही वजह थी कि इस बार BJP ने चुनाव प्रचार से लेकर सरकार गठन तक बंगाली अस्मिता को अपनी रणनीति का केंद्र बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई चुनावी सभाओं में बंगाली शब्दों का इस्तेमाल किया, बंगाली खानपान और परंपराओं का जिक्र किया और रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नामों को सामने रखा।

वैचारिक विरोधाभास भी
टैगोर का राष्ट्रवाद और BJP की राजनीति के केंद्र में मौजूद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कई मामलों में एक दूसरे से अलग दिखाई देते हैं। नैशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज में सीनियर रिसर्च फेलो रोनोजॉय सेन ने अपने एक लेख में लिखा है कि ‘टैगोर हिंदू राष्ट्रवाद की कई अवधारणाओं से असहज थे।

वंदे मातरम् को लेकर उनकी भूमिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। टैगोर ने इस गीत को धुन दी और उसे लोकप्रिय बनाया। लेकिन जब मुस्लिम लीग ने इस गीत पर आपत्ति जताई तो उन्होंने सिर्फ शुरुआती दो अंतरे रखने का सुझाव दिया। उनका मानना था कि गीत के पहले हिस्से में मातृभूमि के प्रति प्रेम और श्रद्धा की भावना है लेकिन बाद के हिस्से कुछ समुदायों को असहज कर सकते हैं।

टैगोर राष्ट्र को मां के रूप में पूजने के विचार से पूरी तरह से सहमत नहीं थे
टैगोर राष्ट्र को मां देवी के रूप में पूजने के विचार से भी पूरी तरह सहमत नहीं थे। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘घरे-बाइरे’ में यह असहमति दिखाई देती है’। शायद ये भी वजह है कि टैगोर की विरासत को राजनीतिक रूप से अपनाने की BJP की कोशिश को लेकर बंगाल के बौद्धिक वर्ग में मिश्रित प्रतिक्रिया दिख रही है।

कुछ का मानना है कि यह पार्टी का बंगाल को समझने की दिशा में कदम है, जबकि आलोचकों का कहना है कि पार्टी टैगोर को सिर्फ प्रतीक की तरह इस्तेमाल कर रही है।

राजनीतिक रूप से देखें तो टैगोर सिर्फ कवि या साहित्यकार नहीं बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा के सबसे बड़े प्रतीक हैं। राज्य में शायद ही कोई राजनीतिक दल हो जो खुद को टैगोर की विरासत से अलग रख सके।