इस्लाम, ईसाई धर्म और FCRA, मद्रास हाई कोर्ट ने हिंदू धर्म को बताया 'समावेशी', बोला- तेंदुआ अपना धब्बा नहीं बदलता
नई दिल्ली: मद्रास हाई कोर्ट की एक डिविजन बेंच ने हाल ही में फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट(एफसीआरए) से जुड़े एक मामले को लेकर कुछ ऐसी टिप्पणियां की हैं, जिसे काफी संवेदनशील बताया जा रहा है। हाई कोर्ट की मदुरै बेंच का कहना है कि जबतक किसी धार्मिक संगठन की गतिविधियों से देश के सेक्युलर ढांचे और सामाजिक सौहार्द प्रभावित नहीं होता, वह एफसीआरए के तहत रजिस्ट्रेशन के हकदार हैं। लेकिन, जो संगठन धर्मांतरण में लगे हैं, उन्हें यह सुविधा नहीं मिलेगी। इस दौरान अदालत ने हिंदू धर्म से अन्य एकेश्वरवादी धर्मों की तुलना भी कर दी।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने हाल ही में 14 पन्नों का एक आदेश जारी किया है, जिसको लेकर खूब चर्चा भी हो रही है और कुछ लोग उसकी गंभीरता पर सवाल भी उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
कोडाइकनाल में एफसीआरए से जुड़ा मामला क्या है
हिंदू धर्म से की एकेश्वरवादियों की तुलनाद हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार इन्हीं तथ्यों को समझने के बाद जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति ने हिंदू धर्म और अब्राहमिक या एकेश्वरवादी धर्मों की तुलना कर दी।
संबंधित ट्रस्ट का धार्मिक चरित्र
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने हाल ही में 14 पन्नों का एक आदेश जारी किया है, जिसको लेकर खूब चर्चा भी हो रही है और कुछ लोग उसकी गंभीरता पर सवाल भी उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
कोडाइकनाल में एफसीआरए से जुड़ा मामला क्या है
- हाई कोर्ट में तमिलनाडु के कोडाइकनाल के कांजिओन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट की अपील पर सुनवाई चल रही थी। इस ट्रस्ट ने एफसीआरए की अनुमति को लेकर दायर याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की।
- याचिकाकर्ता का दावा था कि यह ट्रस्ट जेन मेडिटेशन सेंटर के रूप में स्थापित है और इसकी गतिविधियों को धार्मिक नहीं बताया जा सकता।
- जबकि, केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि सरकारी नीति यह है कि विदेशों से आने वाले उन फंड की पड़ताल करेगी, जो धर्मांतरण और किसी अन्य ऐसी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हो सकती हैं, जिससे देश के सेक्युलर फैब्रिक को नुकसान पहुंच सकता है।
- जबकि, तथ्य यह था कि ट्रस्ट स्थापित करने वाले एक ईसाई पादरी थे, जिन्हें फादर अमा सामी एसजे कहकर बुलाया जाता था।
हिंदू धर्म से की एकेश्वरवादियों की तुलनाद हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार इन्हीं तथ्यों को समझने के बाद जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति ने हिंदू धर्म और अब्राहमिक या एकेश्वरवादी धर्मों की तुलना कर दी।
संबंधित ट्रस्ट का धार्मिक चरित्र
- अदालत ने कहा कि अपील करने वाले ट्रस्ट के खुद का कहना है कि वे जेन बॉद्ध दर्शन मानते हैं। मतलब, एक धार्मक संगठन है। सरकार भी यही कह रही है कि यह महायान बौद्ध संप्रदाय से जुड़ा है।
- कोर्ट ने इसी आधार पर याचिका खारिज किया कि आवेदक ने संगठन को धार्मिक नहीं बताया था।
- हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक या शैक्षणिक संगठनों में अंतर करना आवश्यक है।
- अदालत के मुताबिक वेदांत, भगवद गीता, उपनिषद, योग और उनसे जुड़े भारतीय ज्ञान दर्शन जो व्यवस्थित शिक्षा देते हों, वह धार्मिक संस्थान के तौर पर वर्गीकृत नहीं किए जा सकते। भारतीय ज्ञान परंपरा शिक्षा या संस्कृति की श्रेणी में आएंगी।
- वास्तव में जेन दर्शन चीनी मूल की है। इसलिए संबंधित ट्रस्ट जैसे संगठन 'एफसीआरए के तहत रजिस्ट्रेशन का हक नहीं जता सकते।'
- बेंच ने साफ तौर पर कहा कि 'यदि धर्म-परिवर्तन की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए विदेशी फंड को देश में आने की खुली छूट दी जाएगी, तो देश की संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी।'
- हालांकि हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि,'हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि हम अपील करने वाले पर इस तरह का कोई एजेंडा होने का आरोप नहीं लगा रहे हैं।'
Next Story