रामायण की धरती पर रावण का साम्राज्य? जमीन के नीचे मिलीं 35 मूर्तियों ने इतिहासकारों को चौंकाया....

Newspoint


कर्नाटक की जमीन ने इतिहास का ऐसा पन्ना खोला है जिसने पुरातत्वविदों से लेकर इतिहास प्रेमियों तक सबका ध्यान खींच लिया है। जिस इलाके को सदियों से भगवान राम, माता सीता और रामायण की कथाओं से जोड़कर देखा जाता रहा, वहीं अब रावण की दर्जनों प्राचीन मूर्तियां मिलने की खबर सामने आई है।


मांड्या और मैसूर क्षेत्र में हुई पुरातात्विक खोज ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या प्राचीन भारत में रावण को सिर्फ एक खलनायक के रूप में देखा जाता था या कुछ क्षेत्रों में उसकी पूजा और सम्मान की परंपरा भी मौजूद थी?
Hero Image

क्योंकि जमीन के नीचे मिली ये मूर्तियां सिर्फ पत्थर की आकृतियां नहीं हैं, बल्कि ये उस दौर की धार्मिक सोच, सामाजिक परंपराओं और सांस्कृतिक विविधता की कहानी कहती हैं।

जमीन के नीचे छिपा था इतिहास का नया अध्याय

कर्नाटक के मांड्या और आसपास के इलाकों में हुई खोज ने इतिहासकारों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई और रिसर्च के दौरान रावण से जुड़ी कई प्राचीन मूर्तियां मिली हैं।

मांड्या के मद्दूर, मलावल्ली और आसपास के क्षेत्रों में खुदाई के दौरान करीब 15 से 20 मूर्तियां मिलने की बात सामने आई है।

वहीं पुरातत्व विशेषज्ञों के स्वतंत्र शोध में भी मलावल्ली, बन्नूर और टी. नरसीपुरा क्षेत्र से कई अन्य मूर्तियों के मिलने का दावा किया गया है।

इतनी बड़ी संख्या में एक ही चरित्र से जुड़ी मूर्तियों का मिलना सामान्य पुरातात्विक घटना नहीं मानी जा रही।

रामायण से जुड़े इलाके में रावण की मौजूदगी क्यों चौंकाती है?

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मांड्या का मुथथी क्षेत्र धार्मिक और पौराणिक महत्व रखता है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान भगवान राम, माता सीता और हनुमान जी से जुड़ी कथाओं से संबंधित है।

कहा जाता है कि मुथथी क्षेत्र में कावेरी नदी और रामायण से जुड़ी कई लोककथाएं प्रचलित हैं।

ऐसे क्षेत्र में रावण की इतनी बड़ी संख्या में मूर्तियों का मिलना इतिहासकारों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि भारतीय समाज में धार्मिक मान्यताएं हमेशा एक ही रूप में नहीं रहीं।

एक ही पात्र को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नजरिए से देखा जाता रहा है।

रावण: खलनायक या विद्वान राजा?

भारतीय परंपराओं में रावण की छवि बेहद जटिल रही है।

रामायण में वह लंका का राजा और भगवान राम का विरोधी बताया गया है, लेकिन दूसरी तरफ उसे महान विद्वान, शिव भक्त, संगीतज्ञ और वेदों का ज्ञाता भी माना जाता है।

दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में रावण को उसकी विद्वता और तपस्या के लिए सम्मान देने की परंपरा भी देखने को मिलती है।

यही वजह है कि इतिहासकार इस खोज को केवल धार्मिक नजरिए से नहीं बल्कि सांस्कृतिक अध्ययन के रूप में देख रहे हैं।

यह खोज बताती है कि भारत की सभ्यता में कई विचारधाराएं और स्थानीय परंपराएं एक साथ अस्तित्व में रही हैं।

वैज्ञानिक जांच बताएगी मूर्तियों की असली उम्र

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि ये मूर्तियां कितनी पुरानी हैं?

पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार, मूर्तियों की वास्तविक उम्र पता लगाने के लिए वैज्ञानिक जांच, शिलालेखों का अध्ययन और अन्य तकनीकी प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाएगा।

कार्बन डेटिंग और दूसरी वैज्ञानिक जांचों से यह पता लगाने की कोशिश होगी कि ये मूर्तियां किस कालखंड की हैं और इनका निर्माण किस उद्देश्य से किया गया था।

क्योंकि सिर्फ मूर्ति मिल जाना पर्याप्त नहीं होता, उसके पीछे छिपे इतिहास को समझना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

हर पुरानी मूर्ति अपने अंदर सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता की आवाज छिपाए होती है।

मांड्या में पहले से मौजूद है रावण मंदिर

मांड्या जिले में रावण से जुड़ी परंपरा पहले से मौजूद रही है।

मालवल्ली तालुक के निदघट्टा गांव में रावण का एक प्राचीन मंदिर होने की बात सामने आती है, जहां स्थानीय लोग रावण को शिव भक्त और महान राजा के रूप में देखते हैं।

यह परंपरा बताती है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक पात्रों को देखने का नजरिया अलग-अलग रहा है।

कहीं रावण को अधर्म का प्रतीक माना गया, तो कहीं उसकी विद्वता और शक्ति को सम्मान मिला।

दक्षिण भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रमाण?

इतिहासकारों का मानना है कि दक्षिण भारत में कई ऐसी स्थानीय परंपराएं रही हैं जो मुख्यधारा की धार्मिक कहानियों से अलग अपनी पहचान बनाए हुए हैं।

रावण की पूजा या सम्मान की परंपरा भी इसी सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा मानी जाती है।

पुरातत्वविदों के लिए यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि प्राचीन समाज किस तरह धार्मिक प्रतीकों को अपनाता और बदलता था।

यह खोज सिर्फ रावण से जुड़ी नहीं है, बल्कि भारत के सामाजिक इतिहास को समझने की एक नई खिड़की खोल सकती है।

इतिहास के पन्नों में अब कौन सा रहस्य खुलेगा?

कर्नाटक की धरती से मिली इन मूर्तियों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारत का इतिहास सिर्फ किताबों में दर्ज नहीं है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में जमीन के नीचे आज भी हजारों कहानियां दबी हुई हैं, जो समय-समय पर बाहर आती हैं।

रावण की इन मूर्तियों के पीछे की पूरी कहानी वैज्ञानिक जांच के बाद ही साफ होगी, लेकिन इतना तय है कि इस खोज ने भारतीय इतिहास, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं पर एक नई बहस शुरू कर दी है।

क्योंकि इतिहास हमेशा सीधा नहीं होता… कई बार जमीन के नीचे दबा एक पत्थर सदियों पुराने सवालों को फिर से जिंदा कर देता है।