जिस भाई को काफ़िर बताकर औरंगजेब ने मरवाया, क्या वो इस्लाम का दुश्मन था? जहांआरा ने खोला था राज

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फायदे के लिए मज़हब का इस्तेमाल कोई नई चीज़ नहीं है. मुगल दौर में इसका खूब इस्तेमाल हुआ. बाबर, हुमायूं ने जब ईरान के बादशाह से मदद मांगी तो उसने दोनों के सामने शिया मत कुबूल करने की शर्त रखी.

दोनों ने इसे मान लिया. लेकिन काम निकलते ही उसे कपड़ों के मानिंद उतार फेंका. शाहजहां की बेटी जहांआरा के मुताबिक गद्दी की लड़ाई में औरंगजेब ने दारा के खिलाफ मज़हब को ही हथियार बनाया और उसे काफ़िर बता बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया. जहांआरा ने इस बात को गलत बताया कि दारा इस्लाम विरोधी था. इतिहास के पन्नों से पढ़िए दारा की कहानी.

शाहजहां ने इस बात को कभी नहीं छिपाया कि उसके बाद हिंदुस्तान की मुगल सल्तनत का वारिस उसका बड़ा बेटा दारा शिकोह होगा. बेटों में इस सवाल पर टकराव न हो इसके मद्देनज़र जहां दारा को उसने हमेशा दरबार में साथ रखा , वहीं औरंगजेब, शुजा और मुराद को दूसरे सूबों की जिम्मेदारियां डालकर आगरा से दूर रखने की कोशिश की. हालांकि आगे शाहजहां का सोचा कुछ भी मुमकिन नहीं हुआ. खुद उसके मजबूत रहते दरबार में दारा की चलती रही. लेकिन दारा की बढ़ती ताकत की हर खबर ने बाकी तीनों भाइयों में उसके प्रति नाराजगी और बढ़ाई. 1657 में शाहजहां की बीमारी के दौरान दारा दिन-रात उसके पलंग के पास बैठा सेवा में लगा रहा.

पिता के नाम पर शासन-व्यवस्था का काम वह देखता रहा लेकिन उनके रहते बादशाहत हासिल करने की उसने कोई कोशिश नहीं की. शाहजहां इस बार ठीक हो गया था. लेकिन शुरुआत में जब वह जीने की उम्मीद छोड़ चुका था तो उसने दरबारियों को बुलाकर दारा के पक्ष में अपनी इच्छा बता दी थी.

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मुगल बादशाह शाहजहां. फोटो: Wikimedia commons

पिता की नजदीकी ने दारा को किया कमजोर !

दारा के लिए पिता का प्रेम आगे उसकी कमजोरी साबित हुआ. हमेशा दरबार में रखे जाने के कारण युद्धों की रणनीति और शासन-सत्ता की जमीनी चुनौतियों का मुकाबला करने का हुनर नहीं हासिल कर सका. मशहूर इतिहासकार यदुनाथ सरकार के मुताबिक पिता के अधिक प्रेम ने दारा का बड़ा नुकसान किया. उन्होंने लिखा “कंधार के तीसरे घेरे के अलावा दारा को कभी सूबों को संभालने या युद्ध संचालन के लिए नहीं भेजा गया.

नतीजतन युद्ध और सीधे राज्य संभालने का उसे कोई अनुभव नहीं हो सका. कठिनाई और खतरे की कसौटियों से वह नावाकिफ रहा. सेना से भी सीधा संपर्क नहीं रहा. धीरे-धीरे उत्तराधिकार के युद्ध में जीत के नज़रिए से वह अयोग्य होता गया. गद्दी की लड़ाई में जीत के लिए जिस साहस और रणनीतिक कौशल की जरूरत थी, उसकी भरपाई दारा के किताबी ज्ञान और शालीनता से नहीं हो सकती थी.

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दारा शिकोह. फोटो: Wikimedia commons

जहांआरा दोनों भाइयों को थी प्रिय

दारा की यह कमजोरियां उसके लिए भारी साबित हुईं. औरंगजेब के मुकाबले धरमत सामूगढ़ और दोराई की लड़ाइयों में वह पराजित हुआ. उसका आगे का समय बचने की कोशिश में भागते हुए बीता. 30 अगस्त 1658 को बेरहमी के साथ दारा के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए. लड़ाई भले गद्दी की रही हो लेकिन औरंगजेब ने दारा के कत्ल की वजह उसका इस्लाम विरोधी होना प्रचारित किया. लेकिन उनकी बहन जहांआरा इसे गलत बताती हैं.

शाहजहां की सबसे बड़ी औलाद जहांआरा संयोग से एक-दूसरे की जान के दुश्मन दारा-औरंगजेब दोनों भाइयों की प्रिय थी. जहांआरा के दारा के प्रति झुकाव से वाकिफ़ होने के बाद भी औरंगजेब ने गद्दी पर बैठने के बाद भी जहांआरा को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया. यहां तक कि पिता शाहजहां को आगरा के किले में बंदी रखने के दौरान उनकी देखभाल के लिए जहांआरा को साथ रहने की इजाजत दी. शाहजहां की मौत के बाद जहांआरा को फिर से साथ जोड़ा और मल्लिका-ए-जहां का खिताब और अख्तियार दिए.

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जहांआरा बेगम.

एक भाई किताबों में दूसरा जमीनी हालात में माहिर

जहांआरा ने उस दौर के मुगल सल्तनत से जुडी तमाम घटनाओं को कलमबंद किया है. पिता के उत्तराधिकार के लिए भाइयों की बीच चली खूनी जंग पर भी उसने विस्तार से लिखा है. हेरंब चतुर्वेदी की किताब “जहाँआरा- एक ख़्वाब एक हक़ीकत” में जहांआरा के हवाले से लिखा, “वाक़ई हमारे चारों भाइयों में ये दोनों ही, दारा और औरंगजेब हम-उम्र वालों से अलग और कांधे से भी बहुत ऊपर थे. दारा ख्यालो और किताबों की दुनिया में अव्वल था तो औरंगजेब अपने ख्यालों को अमलीजामा पहनाने में.

दारा ने इस्लाम और सूफीवाद के अलावा वेद-पुराण और बाइबिल भी पढ़ी थी तो औरंगजेब ने इस्लामी कानून में महारत हासिल की थी. औरंगजेब का रुझान भी मज़हबी रहस्यवाद की तरफ था. वह भी धर्म-मर्म की जानकारी रखता था लेकिन इसे किताबी ज्ञान तक महदूद रखने में यकीन करता था.

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मुगल बादशाह औरंगजेब. फोटो: Wikimedia commons

इस्लाम नहीं कट्टरता से था दारा को एतराज

मज़हबी सवालों पर दारा और औरंगजेब की सोच का फर्क इस्लाम मानने को लेकर नहीं बल्कि उसकी कट्टरता के मुद्दे पर था. जहांआरा ने लिखा, “दारा ने मज़हबी जानकारी को जिंदगी की असलियत के तौर पर माना तो औरंगजेब ने किताब तक. दोनों अगर अकबर की तरह तालमेल बिठा पाते तो शायद इस सवाल पर झगड़े की गुंजाइश न रहती, क्योंकि दारा और औरंगजेब दोनों ही इस्लाम को मानने वाले थे. बस दारा उसे उलमा की कट्टरता से बचाने का हिमायती था तो औरंगजेब उलमा की नकेल भी सियासी हाथों में रखना चाहता था. दारा इस्लाम को आमफहम बनाने के साथ उसके रहस्यवाद में लचीलापन चाहता था, जबकि औरंगजेब इस्लाम में किसी समझौते के खिलाफ था.

एक के पास ज्ञान दूसरे के पास ताकत

जहांआरा के मुताबिक दारा को अपने ज्ञान पर ऐतबार था तो औरंगजेब को अपनी ताकत पर. दारा दिमागी और रूहानी बातों में डूबा हुआ था और औरंगजेब ठेठ जिस्मानी और दुनियावी हसरतों में. जहांआरा ने लिखा, “औरंगजेब को दारा और उसके ख़्याल सख्त नापसन्द थे. अपने खतों में उसने आगाह किया कि भाईजान जियू (दारा) के रिसालों को पढ़ें लेकिन उन पर हरगिज यकीन न करें. भाईजान कुफ़्र कर रहे हैं और अपने साथ सबको दोज़ख़ की सैर कराएंगे. दारा सिर्फ अच्छा इंसान बनने और दूसरों को भी अच्छा इंसान बनता देखना चाहता था. दूसरी तरफ औरंगजेब अपने सिवा किसी दूसरे की सुनने को तैयार नहीं था.

इतिहासकार यदुनाथ सरकार भी दारा को इस्लाम विरोधी नहीं मानते. अपनी किताब ‘औरंगजेब’ में उन्होंने लिखा “उसने अकबर को अपना आदर्श बनाया. विश्व-देववादी दर्शन में उसका विश्वास था. उसने तालमद, बाइबिल, सूफी, हिंदू वेदांत आदि का अध्ययन किया. हिंदुओं-मुसलमानों के बीच समन्वय की उसकी मंशा थी. लेकिन वह इस्लाम विरोधी नहीं था. उसने मुस्लिम संतो के जीवन और सीख का संकलन किया. वह मुस्लिम संत मियां मीर का शिष्य था. उसकी रचनाओं में इस्लामी मान्यताओं की कहीं अवहेलना नहीं की गई. उसने तो केवल सूफियों के सिद्धांतों के प्रति आदर और विश्वास प्रकट किया.

एक के सिर पर पिता का हाथ, दूसरे को तलवार पर ऐतबार

दारा और औरंगजेब दोनों की हसरत तख्त-ए-ताउस पर कब्जे की थी. दारा के सिर पर पिता शाहजहां का हाथ था तो औरंगजेब ने कठिन लड़ाइयों में साहस-धैर्य और युद्ध कौशल की पूंजी जुटा रखी थी. जहांआरा ने लिखा, “दोनों के ख्याल-ख्वाब थे, जिन पर अमल की ताकत के लिए सियासी चालों में एक-दूसरे को मात देने की जरूरत थी. इसमें औरंगजेब कहीं आगे निकल गया था.

औरंगजेब ने हमेशा मुश्किलों का सामना किया था. इसलिए वह हर माहौल का आदी था. जबकि दारा ने सिर्फ दरबार और माकूल हालात के बीच वक्त गुजारा था. मुकाबले की लड़ाइयों में दारा हारा और बंदी बना लिया गया. ” औरंगजेब ने गद्दी के दावेदार दूसरे भाइयों शुजा और मुराद को भी खत्म कराया. लेकिन दारा के कत्ल के लिए उसने मज़हब की आड़ ली. अगले तकरीबन पचास साल गद्दी पर रहते औरंगजेब ने जिस मज़हबी कट्टरता को अपने शासन का जरूरी वसूल बनाए रखा, उसकी बुनियाद में भाई दारा के खून-हड्डियों-मज्जा का इस्तेमाल किया.

जहांआरा ने लिखा, “औरंगजेब ने दारा को काफ़िर ऐलान करवा के दिल्ली की सड़कों पर घुमाया और फिर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया. उसने दारा को जैसी दर्दनाक मौत दी, वैसी किसी दुश्मन को न मिले.”