Explainer: पीएम मोदी ने क्यों की खास अपील, क्या यह देश के लिए चेतावनी है?

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ईरान युद्ध, वैश्विक सप्लाई चेन और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारत में तेल संकट की आशंका को लेकर बहस तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया भाषण के बाद यह चर्चा और गहरी हो गई कि क्या आने वाले दिनों में भारत को महंगाई, ऊर्जा दबाव और विदेशी मुद्रा पर बढ़ते बोझ के लिए तैयार रहना होगा।
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सिकंदराबाद में दिए गए अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल-डीजल की बचत, सोना न खरीदने, खाने के तेल का सीमित इस्तेमाल, विदेश यात्रा टालने और वर्क फ्रॉम होम जैसे कदमों की अपील की। इसी के बाद विशेषज्ञों, विपक्षी नेताओं और आम लोगों के बीच सवाल उठने लगे कि क्या ईरान युद्ध का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।

प्रधानमंत्री के भाषण के कुछ घंटों बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की ओर से युद्ध समाप्ति के लिए भेजे गए प्रस्ताव को “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया। इससे साफ है कि फिलहाल ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, और यह स्थिति ग्लोबल इकोनॉमी, भारत और शेयर बाजार तीनों के लिए चिंता का विषय है।



पीएम मोदी के भाषण के बाद क्यों बढ़ी चर्चा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में लोगों से पेट्रोल और डीजल का कम इस्तेमाल करने और सार्वजनिक परिवहन अपनाने की अपील की। साथ ही उन्होंने एक साल तक सोना न खरीदने, खाने के तेल का सीमित उपयोग करने और विदेश यात्रा टालने की सलाह भी दी।

प्रधानमंत्री ने कहा, "भारत के पास बड़े-बड़े तेल के कुएं नहीं हैं. हमें अपनी ज़रूरत के पेट्रोल-डीज़ल-गैस ये सभी बहुत बड़ी मात्रा में दुनिया के दूसरे देशों से मंगाने पड़ते हैं. युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीज़ल, गैस और फ़र्टिलाइज़र के दाम बहुत अधिक बढ़ चुके हैं. आसमान को भी पार कर गए हैं. पड़ोस के देशों में क्या है वो तो अख़बारों में आता है."


प्रधानमंत्री की इस अपील को बीजेपी नेताओं ने व्यापक तौर पर साझा किया। वहीं कुछ विशेषज्ञों ने इसे भारत के लिए आर्थिक सावधानी का संकेत माना, जबकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार ईरान युद्ध से बने हालात का बोझ जनता पर डाल रही है।


ईरान युद्ध का भारत पर असर क्यों अहम है?

ईरान युद्ध के कारण होर्मुज़ स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। यह वही समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल सप्लाई गुजरती है। भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस रूट पर काफी हद तक निर्भर है।

इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि एलएनजी, उर्वरक, खाने का तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और हवाई यात्रा भी महंगी हो सकती है।

द हिंदू की एसोसिएट और पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बर ने कहा, "पीएम का भाषण संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संकट के असर को लेकर दिए गए उनके दो बयानों के बाद आया है. यह साफ़ इशारा करता है कि अब ज़्यादा समय तक सब कुछ सामान्य तरीके से नहीं चल सकता और सप्लाई चेन से जुड़ी परेशानियां आने वाली हैं. भारत, तैयार हो जाओ, आगे का सफ़र मुश्किल और झटकों भरा हो सकता है."


पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर 144 बिलियन डॉलर खर्च किए।


सोना न खरीदने की अपील के पीछे क्या वजह है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से एक साल तक सोना न खरीदने की भी अपील की। उन्होंने कहा, "सोने की ख़रीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत खर्च होती है. एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे. आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं ख़रीदेंगे."

उन्होंने आगे कहा, "सोना नहीं ख़रीदेंगे. विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी."

भारत कच्चे तेल के साथ-साथ बड़ी मात्रा में सोना भी आयात करता है। ऐसे में सोने की खरीद बढ़ने का सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ने से रुपया कमजोर हो सकता है और महंगाई पर असर पड़ सकता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 51.4 बिलियन डॉलर रहा, जो 2023 के 45.54 बिलियन डॉलर से 13.7 प्रतिशत ज्यादा था।


आरबीआई के 9 मई 2026 तक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 690.6 अरब डॉलर था।

वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी ने एक्स पर लिखा, "पीएम मोदी की एक साल तक सोना मत खरीदिए वाली अपील अपने भीतर एक बड़ा संदेश छिपाए हुए है- रुपये को बचाइए. यह विदेशी मुद्रा संकट से निपटने की शुरुआती चेतावनी जैसी लगती है, क्योंकि आयातित सोने पर खर्च होने वाला हर अतिरिक्त डॉलर रुपये को और कमज़ोर करता है. भारत में सोने की भारी मांग है. देश हर साल लगभग 800–900 टन सोना आयात करता है, जो दुनिया में दूसरे सबसे बड़े स्तर पर है. कच्चे तेल के बाद सोना भारत का सबसे बड़ा आयात है. वित्तीय वर्ष 2026 में सोने का आयात रिकॉर्ड लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वित्तीय वर्ष 2025 के लगभग 24% ज़्यादा है."


वर्क फ्रॉम होम और खाने के तेल का क्या संबंध है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन मीटिंग्स को फिर से बढ़ावा देने की बात कही। इसका मकसद साफ है। अगर लोगों की रोजाना आवाजाही कम होगी, तो पेट्रोल-डीजल की खपत भी कम होगी।

इसी तरह उन्होंने खाने के तेल को लेकर भी कहा, "ऐसे ही खाने के तेल का भी है. इसके आयात के लिए भी बहुत बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा ख़र्च करनी पड़ती है. हर खाने में तेल के उपयोग में कुछ कमी करें तो वो भी देशभक्ति का काम है. इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी. इससे देश के ख़ज़ाने का स्वास्थ्य भी सुधरेगा और परिवार के लोगों का भी स्वास्थ्य सुधरेगा."

भारत अपनी कुल खाद्य तेल जरूरत का करीब 55 से 60 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में खाने के तेल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर घरेलू बजट और विदेशी मुद्रा दोनों पर पड़ सकता है।

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उर्वरक संकट की आशंका क्यों बढ़ी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से केमिकल फर्टिलाइजर पर निर्भरता कम करने की भी अपील की। भारत यूरिया, डीएपी, पोटाश और इनके कच्चे माल का बड़ा हिस्सा आयात करता है।

अगर पश्चिम एशिया संकट की वजह से तेल, गैस और शिपिंग महंगी होती है, तो उर्वरकों की लागत भी बढ़ेगी। इसका असर सरकार की सब्सिडी पर भी पड़ेगा, क्योंकि भारत में किसानों को खाद कम कीमत पर उपलब्ध कराई जाती है।


विपक्ष ने क्यों उठाए सवाल?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के भाषण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे- सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम इस्तेमाल करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो. ये उपदेश नहीं, ये नाकामी के सबूत हैं."

उन्होंने आगे लिखा, "12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है- क्या ख़रीदें, क्या न ख़रीदें, कहां जाएं, कहां न जाएं. हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें. देश चलाना अब कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम के बस की बात नहीं."

शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी कहा, "मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष से निपटने में नीतिगत विफलता के बाद अब चुनावी फ़ैसलों का बोझ नागरिकों पर नहीं डाला जा सकता और उनसे तेल बचाने, यात्रा कम करने या ख़रीदारी घटाने की अपील नहीं की जा सकती."



सरकार का पक्ष क्या है?

गृहमंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री की अपील का समर्थन करते हुए कहा, "वैश्विक संकट के इस दौर में मोदी जी ने देशवासियों से एक दूरदर्शी अपील की है. पेट्रोल-डीज़ल के उपयोग में संयम, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा और केमिकल फर्टिलाइजर को छोड़ नेचुरल फार्मिंग को अपनाने का उनका यह आह्वान भारत को आत्मनिर्भर और एनर्जी-सिक्योर राष्ट्र बनाने का स्पष्ट रोडमैप है. यह वैश्विक चुनौतियों के बीच देश को एक स्थिर, सशक्त और अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में निर्णायक सिद्ध होगा."

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कहा, "माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा तेल और गैस को लेकर की गई अपील पर देशवासी अमल करें."


क्या भारत को चुनौतीपूर्ण दिनों के लिए तैयार रहना चाहिए?

ईरान युद्ध, तेल संकट, विदेशी मुद्रा दबाव और वैश्विक सप्लाई चेन की अनिश्चितता को देखते हुए यह साफ है कि भारत पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि गंभीर तेल संकट तय है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील और विशेषज्ञों की चेतावनियां इस बात का संकेत जरूर देती हैं कि आने वाले समय में महंगाई, आयात लागत और रोजमर्रा के खर्च पर असर महसूस किया जा सकता है।



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