अयोध्या न्याय और मानवता की भूमि, निर्दोष पर आरोप बर्दाश्त नहीं : परमहंस आचार्य

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अयोध्या, 15 जुलाई (आईएएनएस)। तपस्वी छावनी के पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले के बीच आगामी 22 जुलाई को होने वाली श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की प्रस्तावित बैठक को लेकर कहा कि अयोध्या हमेशा से न्याय, मानवता और त्याग की भूमि रही है। उन्होंने कहा कि अयोध्या की परंपरा ही न्याय और मर्यादा की रही है, इसलिए यहां किसी भी मामले में पक्षपात नहीं होगा।

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परमहंस आचार्य ने कहा कि भगवान श्रीराम ने पिता के वचन को निभाने के लिए 14 वर्षों तक वनवास स्वीकार किया था। उन्होंने कहा कि जब प्रजा के एक व्यक्ति ने माता सीता को लेकर सवाल उठाया तो भगवान श्रीराम ने राजा के धर्म का पालन करते हुए कठोर निर्णय लिया। यहां किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।

उन्होंने चंपत राय के इस्तीफे पर कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने चोरी या कोई गलत काम किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन बिना प्रमाण किसी निर्दोष व्यक्ति पर आरोप लगाना भी गलत है। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को दोषी साबित करने के लिए साक्ष्य जरूरी हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग बिना सबूत के बयानबाजी कर रहे हैं, जिसका संत समाज विरोध करता है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को जबरदस्ती दोषी ठहराने का प्रयास किया जाएगा तो साधु-संत समाज इसका विरोध करेगा और जरूरत पड़ने पर बड़े स्तर पर आंदोलन भी किया जा सकता है।

मथुरा कृष्ण जन्मभूमि विवाद को लेकर परमहंस आचार्य ने कहा कि जिस तरह राम मंदिर मामले में लंबे इंतजार के बाद न्याय मिला, उसी तरह कृष्ण जन्मभूमि मामले में भी देशवासियों और सनातन समाज की नजरें न्यायपालिका पर टिकी हुई हैं।

उन्होंने कहा कि सत्य को परेशान किया जा सकता है, लेकिन पराजित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जल्द फैसला देना चाहिए। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के उस बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि देर से मिला न्याय भी कई बार अन्याय जैसा महसूस होता है। उन्होंने कहा कि कृष्ण जन्मभूमि से जुड़े विवाद का समाधान जल्द होना चाहिए और लोगों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

धार भोजशाला विवाद पर परमहंस आचार्य ने कहा कि यदि किसी मामले में साक्ष्यों के आधार पर फैसला आ चुका है तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि विवाद को लंबे समय तक बनाए रखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान और न्यायपालिका के आदेशों का सम्मान किया जाना चाहिए।

उन्होंने भोजशाला में नमाज को लेकर अपनी राय रखते हुए कहा कि इस विषय पर अंतिम निर्णय न्यायपालिका का होगा। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में सभी पक्षों को कानून और व्यवस्था का पालन करना चाहिए।

ज्ञानवापी मामले पर बोलते हुए परमहंस आचार्य ने कहा कि इस विवाद का समाधान भी जल्द होना चाहिए। एसआईटी जांच के दौरान वहां कई पुरातात्विक साक्ष्य सामने आए हैं और न्यायपालिका को उपलब्ध तथ्यों के आधार पर फैसला लेना चाहिए।