यादों में मन्ना डे: स्कूल में संगीत के टॉपर से हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग तक, सचिन देव बर्मन के सहायक बनकर शुरू की संगीत की यात्रा
मुंबई, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा जगत में कई नायाब सितारे हुए, जिनकी कला के गायन, संगीत, अभिनय समेत अन्य रूप आज भी प्रशंसकों के दिलों में जिंदा है। मन्ना डे न केवल एक बेहतरीन गायक बल्कि शास्त्रीय संगीत को पॉपुलर और फिल्मी संगीत में कुशलतापूर्वक ढालने के लिए भी जाने जाते हैं।
मन्ना डे का जन्म 1 मई 1919 को कोलकाता में हुआ था। उनका असली नाम प्रबोध चंद्र डे था।
स्कूली दिनों के गायन प्रतियोगिताओं में वह लगातार तीन वर्ष तक प्रथम स्थान पर रहे। साल 1942 में मन्ना डे अपने चाचा केसी डे के साथ मुंबई आ गए। यहां उन्होंने शुरू में अपने चाचा के सहायक के रूप में काम किया और बाद में महान संगीतकार सचिन देव बर्मन के सहायक बन गए। मुंबई में संगीत की उनकी यह शुरुआत काफी संघर्षपूर्ण रही, लेकिन उनकी मेहनत और प्रतिभा ने उन्हें आगे बढ़ाया।
मन्ना डे ने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में आई पहली फिल्म ‘महापूजा’ के लिए संगीत दिया। इसके बाद उन्होंने ‘घर घर की बात’, ‘शिव कन्या’, ‘कमला’, ‘जय महादेव’, ‘विश्वामित्र’ जैसी कई फिल्मों में संगीत रचा।
मन्ना डे ने उस्ताद अमान अली खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से शास्त्रीय संगीत की गहराई सीखी। वह शास्त्रीय रागों पर आधारित गीतों को बेहद सहजता से गाते थे।
खास बात है कि मन्ना डे ने हिंदी के अलावा बांग्ला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया समेत कई भाषाओं में गीत गाए। साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन की कृति ‘मधुशाला’ को उन्होंने अपने स्वर से जीवंत किया। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री, पद्मभूषण और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।
24 अक्टूबर 2013 को मन्ना डे का निधन हो गया।
--आईएएनएस
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