Explainer: तमिलनाडु चुनाव नतीजों के बाद बढ़ा सियासी संकट, क्या सरकार बना पाएंगे विजय?

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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे आए चार दिन बीत चुके हैं, लेकिन राज्य में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब भी साफ नहीं है। सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली एकल पार्टी के रूप में एक्टर विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने सरकार बनाने का दावा पेश किया है, लेकिन अभी तक उन्हें सरकार गठन के लिए आमंत्रित नहीं किया गया है।
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तमिलनाडु की राजनीति में यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद टीवीके को बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए अभी और समर्थन जुटाना होगा। इसी वजह से तमिलनाडु सरकार गठन, विजय सरकार दावा और विधानसभा बहुमत जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं।

राज्यपाल ने सरकार बनाने के दावे पर क्या कहा?


तमिलगा वेत्री कड़गम ने कार्यवाहक राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर को पत्र सौंपकर सरकार बनाने का दावा पेश किया था। लेकिन राज्यपाल ने साफ कर दिया कि अभी पार्टी के पास सरकार गठन के लिए जरूरी बहुमत नहीं है।


राजभवन की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, "टीवीके नेता विजय ने राज्यपाल से मुलाकात की. इस बैठक के दौरान राज्यपाल ने स्पष्ट किया कि सरकार गठन के लिए तमिलनाडु विधानसभा में ज़रूरी बहुमत का समर्थन अभी तक हासिल नहीं हुआ है."

6 मई को पहली बार राज्यपाल से मुलाकात के बाद जब विजय को सरकार गठन का न्योता नहीं मिला, तो 7 मई को उन्होंने फिर से मुलाकात की। इस बार उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पांच विधायकों के समर्थन पत्र भी सौंपे। इसके बाद यह प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई।


टीवीके के पास अभी कितनी सीटें हैं?


तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके ने 108 सीटें जीती हैं। हालांकि विजय दो सीटों से चुनाव जीते हैं और एक सीट से उन्हें इस्तीफा देना होगा। ऐसे में पार्टी की प्रभावी संख्या घटकर 107 रह जाएगी।

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इस स्थिति में विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 233 हो जाएगी और बहुमत के लिए 117 विधायकों का समर्थन जरूरी होगा। अगर विधानसभा अध्यक्ष टीवीके का होता है, तब भी पार्टी को बहुमत तक पहुंचने के लिए 11 अतिरिक्त सदस्यों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी।

कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन लगभग तय माना जा रहा है। ऐसे में फिलहाल टीवीके को छह और विधायकों के समर्थन की जरूरत है।


किन दलों के समर्थन से बदल सकती है तस्वीर?


तमिलनाडु सरकार गठन की मौजूदा स्थिति में कुछ छोटे दल अहम भूमिका निभा सकते हैं। दो-दो सीटों वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और सीपीआई ने टीवीके को समर्थन देने के संकेत दिए हैं।

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल), जिसके पास दो सीटें हैं, उसने भी संकेत दिया है कि वह अगली सरकार को "रचनात्मक और आलोचनात्मक" समर्थन दे सकती है।

अगर यह समर्थन औपचारिक रूप लेता है, तो टीवीके प्लस का आंकड़ा 119 तक पहुंच सकता है। यह संख्या बहुमत के आंकड़े से आगे होगी। ऐसे में समर्थन पत्रों के साथ दोबारा दावा पेश होने पर राज्यपाल के लिए टीवीके को आमंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

अगर संख्या पूरी हुई तो आगे क्या होगा?


अगर टीवीके बहुमत का समर्थन जुटा लेती है, तो अगला बड़ा कदम विश्वास मत होगा। अस्थायी स्पीकर के चुनाव में अगर संख्या का अंतर बना रहता है, तो किसी बाहरी पार्टी के विधायक को अस्थायी स्पीकर बनाया जा सकता है।

यदि ऐसा भी संभव नहीं होता, तो कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वास मत कराने के लिए हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अस्थायी स्पीकर और रिटर्निंग ऑफिसर नियुक्त किया जा सकता है।


यही वजह है कि तमिलनाडु विधानसभा में सरकार गठन का मामला अब सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया का विषय भी बन गया है।

विजय की चुप्पी पर क्यों उठ रहे सवाल?


सरकार गठन की इस पूरी कवायद के बीच सबसे ज्यादा चर्चा विजय की चुप्पी को लेकर हो रही है। राजनीतिक विश्लेषक राजन कुरई कृष्णन ने इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "विजय सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता के रूप में सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं. उन्हें सिर्फ दिए गए समय के भीतर विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना है. अगर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) विश्वास मत के दौरान मतदान में हिस्सा नहीं लेती, तब टीवीके को सदन में बहुमत हासिल करने में समस्या नहीं होगी."

उन्होंने आगे कहा, "लेकिन यह कहना कि केवल स्पष्ट बहुमत होने पर ही उन्हें बुलाया जाएगा, ये राज्यपाल का अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना है. दुख की बात यह है कि इस मुद्दे पर विजय को खुद खुलकर बोलना चाहिए, जो वो नहीं कर रहे हैं. विजय ने अभी तक पत्रकारों से मुलाकात नहीं की है. कम से कम अब उन्हें मीडिया से मिलना चाहिए और सरकार गठन के लिए राज्यपाल के रवैये पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखनी चाहिए."

राजनीतिक विश्लेषकों ने क्या कहा?


प्रोफेसर राजन कुरई कृष्णन ने विजय की राजनीतिक शैली की तुलना नरेंद्र मोदी से करते हुए कहा, "मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी 20-25 साल तक एक कार्यकर्ता रहे थे. उस दौरान वह पत्रकारों से मिला करते थे. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने सीधे बात नहीं की, क्योंकि उनकी ओर से या पार्टी की ओर से बोलने के लिए कई प्रवक्ता मौजूद थे. लेकिन विजय ने अभी-अभी राजनीति में कदम रखा है और उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला है. उन्हें खुलकर बोलना चाहिए."

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वी सी काची के महासचिव आलूर शानवास ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "राज्यपाल बाधा पैदा कर रहे हैं, लेकिन टीवीके उनका विरोध करने से डर रही है. क्या विजय में इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति और साहस है कि वह उस राज्यपाल के ख़िलाफ़ अपनी राय खुलकर रख सकें, जिन्होंने टीवीके को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया?"

कपिल सिब्बल और अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया


राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने भी इस मुद्दे पर राज्यपाल की भूमिका की आलोचना की। उन्होंने कहा, "जब राज्यपाल बीजेपी के एजेंट बन जाते हैं, तो वे भाजपा की इच्छा के अनुसार काम करते हैं. अगर विधानसभा कोई विधेयक पारित करती है, तो राज्यपाल मंजूरी दिए बिना उसे लंबित रखते हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल में, जहां अब बीजेपी सत्ता में आई है, वहां वे तुरंत मंजूरी दे देंगे."

उन्होंने आगे कहा, "आज की स्थिति में टीवीके के पास सदन में बहुमत नहीं है. राज्यपाल तमिलनाडु की मौजूदा स्थिति से पूरी तरह वाकिफ हैं. उन्हें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए. सरकारिया आयोग ने भी इसे स्पष्ट रूप से कहा है."

राज्यसभा सांसद और अभिनेता कमल हासन तथा सीपीआई के राज्य सचिव वीरापांडियन ने भी राज्यपाल से विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने की मांग की है।

अब तमिलनाडु में आगे क्या?


तमिलनाडु की राजनीति इस समय बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में टीवीके सरकार बनाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ बहुमत का गणित अब भी पूरी तरह साफ नहीं है।


आने वाले दिनों में यह तय होगा कि विजय समर्थन जुटाकर सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचते हैं या फिर तमिलनाडु में कोई नया राजनीतिक समीकरण उभरता है। फिलहाल राज्य की नजरें राज्यपाल के अगले कदम और टीवीके की रणनीति पर टिकी हुई हैं।











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