Mamata Banerjee vs ED: सीएम ममता ने ईडी की रेड के बीच उठाई फाइलें, एजेंसी ने लगाए गंभीर आरोप
गुरुवार को ईडी की टीम ने साल्ट लेक सेक्टर V स्थित राजनीतिक परामर्शदाता फर्म (Political Consultancy) आई-पैक ( I-PAC ) के कार्यालय और लाउडन स्ट्रीट पर इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की। यह कार्रवाई कथित कोयला चोरी घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई थी। लेकिन मामला तब दिलचस्प हो गया जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद प्रतीक जैन के घर पहुंच गईं।
वहां करीब 20 से 25 मिनट बिताने के बाद जब ममता बनर्जी बाहर निकलीं, तो उनके हाथ में एक हरे रंग का फोल्डर था। उन्होंने मीडिया के सामने दावा किया कि ईडी अधिकारी उनकी पार्टी के दस्तावेज और हार्ड डिस्क जब्त करने की कोशिश कर रहे थे, जिनमें आगामी विधानसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की जानकारी थी। ममता बनर्जी ने कहा, 'उन्होंने हमारे IT सेल के इंचार्ज के घर और ऑफिस पर छापा मारा है. वे मेरी पार्टी के डॉक्यूमेंट्स और हार्ड डिस्क जब्त कर रहे थे, जिनमें विधानसभा चुनावों के लिए हमारे पार्टी उम्मीदवारों की डिटेल्स हैं. मैं उन्हें वापस ले आई हूं.' उन्होंने जोर देकर कहा कि इन चीजों का किसी भी फाइनेंशियल जांच से कोई लेना-देना नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि ईडी के पास पीएमएलए (PMLA) की धारा 67 का कवच है। अगर केंद्रीय एजेंसी अदालत में यह साबित करने में सफल हो जाती है कि ममता बनर्जी जो फाइल अपने साथ ले गई हैं, वह जांच के लिए एक महत्वपूर्ण सबूत थी, तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जानकारों के मुताबिक, मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें कोई विशेष संवैधानिक कवच या 'इम्युनिटी' नहीं मिली हुई है। संविधान सरकार के मुखिया या मंत्रियों को सदन के भीतर तो विशेषाधिकार देता है, लेकिन सदन के बाहर किसी आपराधिक जांच में बाधा डालने पर उन्हें सामान्य नागरिक की तरह ही माना जा सकता है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व मंत्री मनीष सिसोदिया के मामले इसके ताजे उदाहरण हैं।
हालांकि, यह साबित करना कि ईडी अधिकारी ने निजी फायदे के लिए दस्तावेज चोरी किए हैं (जैसा कि ममता पक्ष का आरोप हो सकता है), बहुत मुश्किल है। जब तक बंगाल पुलिस यह सिद्ध नहीं कर देती, तब तक जांच के नाम पर दस्तावेज ले जाने को अपराध की श्रेणी में लाना लगभग नामुमकिन है।
वहां करीब 20 से 25 मिनट बिताने के बाद जब ममता बनर्जी बाहर निकलीं, तो उनके हाथ में एक हरे रंग का फोल्डर था। उन्होंने मीडिया के सामने दावा किया कि ईडी अधिकारी उनकी पार्टी के दस्तावेज और हार्ड डिस्क जब्त करने की कोशिश कर रहे थे, जिनमें आगामी विधानसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की जानकारी थी। ममता बनर्जी ने कहा, 'उन्होंने हमारे IT सेल के इंचार्ज के घर और ऑफिस पर छापा मारा है. वे मेरी पार्टी के डॉक्यूमेंट्स और हार्ड डिस्क जब्त कर रहे थे, जिनमें विधानसभा चुनावों के लिए हमारे पार्टी उम्मीदवारों की डिटेल्स हैं. मैं उन्हें वापस ले आई हूं.' उन्होंने जोर देकर कहा कि इन चीजों का किसी भी फाइनेंशियल जांच से कोई लेना-देना नहीं है.
ईडी का आरोप
दूसरी ओर, ईडी का पक्ष बिल्कुल अलग और गंभीर है। केंद्रीय एजेंसी का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने रेड के दौरान जांच में बाधा डाली और 'अहम सबूत' जबरदस्ती अपने साथ ले गईं। ईडी का कहना है कि यह तलाशी अभियान अदालत के दायरे में और कानूनी प्रक्रिया के तहत चलाया जा रहा था। एजेंसी का दावा है कि जिस तरह से मुख्यमंत्री ने हस्तक्षेप किया और दस्तावेजों को वहां से हटाया, वह जांच को प्रभावित करने की कोशिश है।You may also like
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अदालत की दहलीज पर दोनों पक्ष
यह मामला अब अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। ईडी ने कलकत्ता उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और जांच में दखलंदाजी का आरोप लगाते हुए याचिका दायर करने की अनुमति मांगी है। वहीं, आई-पैक(I-PAC) ने भी हाई कोर्ट का रुख किया है और ईडी की कार्रवाई की वैधता को चुनौती दी है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने न सिर्फ रेड वाली जगहों से फाइलें उठाईं, बल्कि ईडी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवा दी है। इस मामले पर शुक्रवार को सुनवाई होने की संभावना है।क्या गिरफ्तार हो सकती हैं मुख्यमंत्री?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल जो सबके मन में है, वह यह है कि क्या ममता बनर्जी के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई हो सकती है? कानूनी जानकारों की मानें तो इस मामले में ईडी का पक्ष काफी मजबूत दिखाई दे रहा है।विशेषज्ञों का कहना है कि ईडी के पास पीएमएलए (PMLA) की धारा 67 का कवच है। अगर केंद्रीय एजेंसी अदालत में यह साबित करने में सफल हो जाती है कि ममता बनर्जी जो फाइल अपने साथ ले गई हैं, वह जांच के लिए एक महत्वपूर्ण सबूत थी, तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जानकारों के मुताबिक, मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें कोई विशेष संवैधानिक कवच या 'इम्युनिटी' नहीं मिली हुई है। संविधान सरकार के मुखिया या मंत्रियों को सदन के भीतर तो विशेषाधिकार देता है, लेकिन सदन के बाहर किसी आपराधिक जांच में बाधा डालने पर उन्हें सामान्य नागरिक की तरह ही माना जा सकता है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व मंत्री मनीष सिसोदिया के मामले इसके ताजे उदाहरण हैं।
हालांकि, यह साबित करना कि ईडी अधिकारी ने निजी फायदे के लिए दस्तावेज चोरी किए हैं (जैसा कि ममता पक्ष का आरोप हो सकता है), बहुत मुश्किल है। जब तक बंगाल पुलिस यह सिद्ध नहीं कर देती, तब तक जांच के नाम पर दस्तावेज ले जाने को अपराध की श्रेणी में लाना लगभग नामुमकिन है।









