क्यों कुछ लोग बहुत तीखा खाना आसानी से खा लेते हैं, जबकि कुछ लोग नहीं?
एक ही मिर्ची वाला खाना किसी व्यक्ति के लिए स्वादिष्ट हो सकता है, जबकि दूसरे के लिए वही निवाला आंखों में आंसू, पसीना और मुंह में तेज जलन पैदा कर सकता है। अक्सर कहा जाता है कि जो लोग बचपन से तीखा खाते हैं, उनकी आदत पड़ जाती है। इसमें काफी सच्चाई है, लेकिन कहानी सिर्फ आदत की नहीं है। मिर्च का तीखापन हमारे शरीर के दर्द और गर्मी महसूस करने वाले रिसेप्टर्स को सक्रिय करता है। साथ ही, आनुवंशिक अंतर, पहले से तीखा खाने की आदत और बार-बार मिर्च खाने से होने वाला अनुकूलन भी यह तय कर सकता है कि किसी व्यक्ति को वही मिर्च कितनी तेज महसूस होगी।
इसलिए जब कैप्साइसिन इन रिसेप्टर्स को सक्रिय करता है, तो दिमाग को ऐसे संकेत मिलते हैं जैसे मुंह बहुत ज्यादा गर्म चीज के संपर्क में आया हो। वास्तव में मिर्च कमरे के तापमान पर हो सकती है, लेकिन शरीर फिर भी गर्मी और जलन जैसा अनुभव करता है।
इसी वजह से तीखा खाना खाने के बाद पसीना आना, आंखों से पानी निकलना या नाक बहना भी शरीर की प्रतिक्रिया का हिस्सा है।
यही कारण है कि बचपन से मसालेदार खाना खाने वाला व्यक्ति किसी तीखी करी को आसानी से खा सकता है, जबकि कम मसाले वाला खाना खाने वाले व्यक्ति के लिए वही करी बेहद तीखी हो सकती है।
यह केवल स्वाद की पसंद नहीं है। शरीर और दिमाग दोनों बार-बार होने वाली इस संवेदना के प्रति कुछ हद तक अनुकूल हो सकते हैं।
हालांकि इसे किसी एक "स्पाइसी फूड जीन" से समझना सही नहीं होगा। आनुवंशिक अंतर के साथ-साथ खान-पान की आदत, मिर्च खाने का अनुभव और व्यक्तिगत संवेदनशीलता भी भूमिका निभाते हैं।
इसलिए किसी का तीखा खाना सहन कर पाना केवल मजबूत होने का प्रमाण नहीं है। उसके शरीर का sensory response भी अलग हो सकता है।
इसका कारण यह है कि कैप्साइसिन पानी में आसानी से घुलता नहीं है। पानी उसे पूरी तरह हटाने के बजाय मुंह के दूसरे हिस्सों तक फैला सकता है। दूध और कुछ डेयरी उत्पाद ज्यादा राहत दे सकते हैं क्योंकि उनमें मौजूद casein जैसे दूध के प्रोटीन कैप्साइसिन को मुंह की सतह से हटाने में मदद कर सकते हैं।
यही वजह है कि बहुत तीखी करी के साथ दही या रायता कई लोगों को पानी से ज्यादा राहत देता है।
इसमें शरीर का अनुकूलन तो शामिल है ही, साथ में दिमाग का अनुभव भी महत्वपूर्ण है। बार-बार तीखा खाने से व्यक्ति समझने लगता है कि जलन अस्थायी है और कुछ समय बाद कम हो जाएगी।
आप दोनों के शरीर में कैप्साइसिन को महसूस करने की संवेदनशीलता अलग हो सकती है। ऊपर से एक व्यक्ति ने वर्षों तक अपने शरीर को मिर्च के संपर्क का अभ्यास कराया हो सकता है।
यानी तीखा खाने की क्षमता केवल जुबान की ताकत नहीं है। यह स्वाद, तंत्रिका तंत्र, शरीर के अनुकूलन और वर्षों की खान-पान की आदतों का दिलचस्प मेल है।
मिर्च असल में मुंह को जलाती नहीं है
मिर्च में मौजूद कैप्साइसिन वह प्रमुख रासायनिक यौगिक है जो तीखेपन का एहसास पैदा करता है। यह TRPV1 नामक रिसेप्टर को सक्रिय करता है। यही रिसेप्टर गर्मी और दर्द जैसी संवेदनाओं को महसूस करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।इसलिए जब कैप्साइसिन इन रिसेप्टर्स को सक्रिय करता है, तो दिमाग को ऐसे संकेत मिलते हैं जैसे मुंह बहुत ज्यादा गर्म चीज के संपर्क में आया हो। वास्तव में मिर्च कमरे के तापमान पर हो सकती है, लेकिन शरीर फिर भी गर्मी और जलन जैसा अनुभव करता है।
इसी वजह से तीखा खाना खाने के बाद पसीना आना, आंखों से पानी निकलना या नाक बहना भी शरीर की प्रतिक्रिया का हिस्सा है।
बार-बार तीखा खाने से सहनशीलता बढ़ सकती है
अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से मिर्च खाता है, तो समय के साथ उसे वही तीखापन पहले की तुलना में कम महसूस हो सकता है। शोध में कैप्साइसिन के लगातार संपर्क के बाद संवेदनशीलता कम होने के संकेत मिले हैं।यही कारण है कि बचपन से मसालेदार खाना खाने वाला व्यक्ति किसी तीखी करी को आसानी से खा सकता है, जबकि कम मसाले वाला खाना खाने वाले व्यक्ति के लिए वही करी बेहद तीखी हो सकती है।
यह केवल स्वाद की पसंद नहीं है। शरीर और दिमाग दोनों बार-बार होने वाली इस संवेदना के प्रति कुछ हद तक अनुकूल हो सकते हैं।
हर व्यक्ति की संवेदनशीलता एक जैसी नहीं होती
तीखेपन का अनुभव व्यक्ति-व्यक्ति में अलग होने का एक कारण जैविक अंतर भी हो सकता है। दर्द और तापमान महसूस करने वाले तंत्र में मौजूद रिसेप्टर्स की संवेदनशीलता हर व्यक्ति में बिल्कुल समान नहीं होती।हालांकि इसे किसी एक "स्पाइसी फूड जीन" से समझना सही नहीं होगा। आनुवंशिक अंतर के साथ-साथ खान-पान की आदत, मिर्च खाने का अनुभव और व्यक्तिगत संवेदनशीलता भी भूमिका निभाते हैं।
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इसलिए किसी का तीखा खाना सहन कर पाना केवल मजबूत होने का प्रमाण नहीं है। उसके शरीर का sensory response भी अलग हो सकता है।
तीखा खाने के बाद पानी क्यों ज्यादा मदद नहीं करता?
बहुत तीखा खाना खाने के बाद सबसे पहले पानी पीने का मन करता है, लेकिन पानी हमेशा जलन को प्रभावी ढंग से कम नहीं कर पाता।इसका कारण यह है कि कैप्साइसिन पानी में आसानी से घुलता नहीं है। पानी उसे पूरी तरह हटाने के बजाय मुंह के दूसरे हिस्सों तक फैला सकता है। दूध और कुछ डेयरी उत्पाद ज्यादा राहत दे सकते हैं क्योंकि उनमें मौजूद casein जैसे दूध के प्रोटीन कैप्साइसिन को मुंह की सतह से हटाने में मदद कर सकते हैं।
यही वजह है कि बहुत तीखी करी के साथ दही या रायता कई लोगों को पानी से ज्यादा राहत देता है।
तीखा खाने की आदत सीखी भी जा सकती है
दिलचस्प बात यह है कि तीखा खाने की सहनशीलता हमेशा जन्म से तय नहीं होती। जो व्यक्ति आज थोड़ी मिर्च से परेशान हो जाता है, वह धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाकर समय के साथ ज्यादा तीखा खाना सहन कर सकता है।इसमें शरीर का अनुकूलन तो शामिल है ही, साथ में दिमाग का अनुभव भी महत्वपूर्ण है। बार-बार तीखा खाने से व्यक्ति समझने लगता है कि जलन अस्थायी है और कुछ समय बाद कम हो जाएगी।
आखिर कुछ लोगों को मिर्च इतनी आसानी से क्यों लगती है?
अगली बार जब कोई व्यक्ति आपके लिए बेहद तीखी मिर्च वाली डिश को आराम से खा रहा हो और आपको तुरंत पानी या दही की जरूरत पड़ रही हो, तो इसे केवल "आदत" का मामला न समझें।आप दोनों के शरीर में कैप्साइसिन को महसूस करने की संवेदनशीलता अलग हो सकती है। ऊपर से एक व्यक्ति ने वर्षों तक अपने शरीर को मिर्च के संपर्क का अभ्यास कराया हो सकता है।
यानी तीखा खाने की क्षमता केवल जुबान की ताकत नहीं है। यह स्वाद, तंत्रिका तंत्र, शरीर के अनुकूलन और वर्षों की खान-पान की आदतों का दिलचस्प मेल है।





