क्या आपको भी बार-बार फोन देखने की आदत है? समझिए इसके असली कारण

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप बस समय देखने के लिए फोन उठाते हैं, और आधे घंटे बाद खुद को किसी अजनबी की पुरानी तस्वीरें देखते हुए पाते हैं? या शायद आपको महसूस हुआ हो कि जेब में फोन बजा है, लेकिन बाहर निकालने पर वहां कोई नोटिफिकेशन नहीं होता। हम एक ऐसी पीढ़ी बन गए हैं जो बिना किसी वजह के अपने फोन को बार-बार अनलॉक करती रहती है।
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डोपामाइन का जाल

हमारा दिमाग बहुत चालाक है। जब भी हमें कोई लाइक, कमेंट या मैसेज मिलता है, तो दिमाग में 'डोपामाइन' नाम का एक केमिकल रिलीज होता है। यह हमें खुशी का अहसास कराता है। धीरे-धीरे दिमाग को इसकी लत लग जाती है। अब जब हम बोर होते हैं या तनाव में होते हैं, तो हमारा हाथ अपने आप फोन की तरफ चला जाता है, इस उम्मीद में कि शायद कुछ नया और मजेदार मिल जाए। यह वैसा ही है जैसे कोई बंदर फल की तलाश में बार-बार एक ही पेड़ पर जाता है।

फोमो (FOMO) का डर

'फियर ऑफ मिसिंग आउट' यानी कुछ छूट जाने का डर हमें चैन से बैठने नहीं देता। हमें लगता है कि अगर हमने अभी फोन नहीं देखा, तो शायद हम किसी बड़ी खबर या अपने दोस्तों के बीच चल रही किसी चर्चा से पिछड़ जाएंगे। यह एक तरह की सामाजिक असुरक्षा है जो हमें स्क्रीन से चिपकाए रखती है। पुराने समय में इंसान को झुंड के साथ रहना जरूरी था, आज वह झुंड डिजिटल हो गया है।

एक अनचाही आदत

अक्सर हम बिना किसी उद्देश्य के फोन चेक करते हैं क्योंकि यह एक 'मसल्स मेमोरी' बन गई है। जैसे हम घर से निकलते समय बिना सोचे ताला चेक करते हैं, वैसे ही फोन का लॉक खोलना एक रिफ्लेक्स एक्शन बन गया है। हम बस खालीपन को भरने की कोशिश कर रहे होते हैं। चाहे हम शांत बैठे हों या किसी का इंतजार कर रहे हों, फोन हमारा सबसे आसान सहारा बन जाता है।

फोन चेक करना आज के दौर की एक सामान्य बीमारी है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि हम इसे कंट्रोल कर सकते हैं। अगली बार जब आपका हाथ फोन की तरफ जाए, तो बस एक पल के लिए रुककर खुद से पूछें कि क्या वाकई इसकी जरूरत है?