जहां हम खड़े होते हैं, हमारी रीढ़ भी वहीं खड़ी होती है

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जहां हम खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है। अमिताभ बच्चन ने सिर्फ भारी-भरकम डायलॉग भर नहीं बोला था बल्कि कॉन्फिडेंस से भरे इंसानी मिज़ाज, आत्मसम्मान और चरम व्यक्तिवाद (Individualism) की एक ऐसी हुंकार भरी, जो सदियों के सामाजिक बंधनों को एक झटके में तोड़ देती है। जब हम इस डायलॉग की गहराई में उतरते हैं, तो हमें एहसास होता है कि यह बात सीधे तौर पर उस वैचारिक धरातल से जुड़ती है, जिसे हमने कभी हावर्ड रॉर्क (Howard Roark) के मुंह से एकदम अमिताभ बच्चन स्टाइल में बोलते हुए पढ़ा था - मैं किसी और के लिए नहीं जीता और न ही किसी और से ये उम्मीद करता हूं कि वह मेरे लिए जिए।
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83 साल पहले नॉवेल में सामने आई थी ये फिलॉसफीआज से करीब 83 साल पहले ऐन रैंड (Ayn Rand) ने अपने मशहूर उपन्यास 'द फाउंटेनहेड' (The Fountainhead) में यह फिलॉसफी पेश की थी। इस उपन्यास में दो मुख्य किरदार हैं - हावर्ड रॉर्क (Howard Roark) और पीटर कीटिंग (Peter Keating), जो आज के समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास हैं। दोनों ही आर्किटेक्ट हैं। रॉर्क एक ऐसा नायक है जो अपने सिद्धांतों और मौलिकता के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाता है, वहीं दूसरी तरफ पीटर कीटिंग है, जो समाज की नजरों में सफल होने के लिए अपनी मौलिकता को मारकर सिर्फ भेड़चाल का हिस्सा बनता है। रैंड के उपन्यास के हीरो हावर्ड रॉर्क को पसंद जरूर किया गया हो, लेकिन आज की कड़वी सच्चाई यह है कि हम सब धीरे-धीरे हावर्ड रॉर्क बनने का हौसला खो रहे हैं और पीटर कीटिंग की जमात में शामिल होते जा रहे हैं।


परवरिश की बुनियाद में मौजूद विरोधाभासअगर हम इस वैचारिक कशमकश को भारतीय संदर्भ में देखें, तो हमारी परवरिश की बुनियाद ही एक बिल्कुल अलग विरोधाभास पर टिकी है। बचपन से हमें सिखाया जाता है ‘जैसा देश, वैसा भेष’। पहली नज़र में यह बात सामाजिक सामंजस्य के लिए ठीक लगती है कि जहां रहो, वहां के सामाजिक माहौल में ढल जाओ (When in Rome, do as the Romans do)। लेकिन धीरे-धीरे यह मुहावरा हमारी मौलिकता यानी ओरिजिनैलिटी को कुचलने का एक औज़ार बन जाता है और हमें पता ही नहीं चलता। सच तो यह है कि हमारी परवरिश कुछ इस तरह होती है कि हमें खुद को तलाशने के बजाय, समाज की कसौटियों पर फिट होने के लिए तैयार किया जाता है।


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भेड़चाल में ढलती जिंदगीस्कूल जाओ, टीचर सवालों के जवाब लिखवा देती हैं और उम्मीद करती हैं कि सभी बच्चे उसी जवाब को रटा-रटाया, जस का तस लिखें एग्ज़ाम में। थोड़ा सा जवाब इधर-उधर हुआ नहीं, बच्चे ने वही बात अपनी भाषा में लिखी नहीं कि पूरे नंबर कट। स्कूल की कॉपियों से लेकर जीवन के फैसलों तक, हमारी तारीफ इस बात पर नहीं होती कि हमने नया क्या सोचा, बल्कि इस बात पर होती है कि हमने पहले से बनाए गए नियमों का कितनी खामोशी से पालन किया।

यही भेड़चाल आगे चलकर हमारे करियर के फैसलों में दिखती है। बिना यह सोचे-समझे कि बच्चे का अपना टैलंट क्या है, उसकी दिलचस्पी क्या है, लाखों बच्चों को कोटा, इंजीनियरिंग या UPSC की एक ही अंधी भट्टी में झोंक दिया जाता है। किसी एक coaching का रिज़ल्ट आया नहीं कि पूरा समाज अपने बच्चों को उसी रास्ते पर दौड़ा देता है। हम पीटर कीटिंग पैदा करने वाली फैक्ट्रियां चला रहे हैं, जहां युवा अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि समाज में रुतबा दिखाने के लिए करियर चुनते हैं।

हमें यह सिखाया जाता है कि समाज की नजरों में क्या कमी है, उसे सुधारो न कि इस बात पर जोर दिया जाता है कि हमारे अंदर की ताकत क्या है। यह जो कंडीशनिंग है, वह इंसान को अपनी शर्तों पर जीने के बजाय दूसरों की उम्मीदों का गुलाम बना देती है। इस तरह हम फॉलोअर्स की जमात तो तैयार कर लेंगे लेकिन लीडर कहां से लाएंगे, यह कोई नहीं सोच रहा है।


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एल्गोरिदम के इशारों पर चलता जीवनसोशल मीडिया के इस दौर में हर कोई एल्गोरिदम के इशारों पर नाच रहा है और एक जैसी भेड़चाल का हिस्सा बनता जा रहा है। अगर इंस्टाग्राम पर कोई एक रील या ऑडियो क्लिप ट्रेंड कर गई, तो देश के लाखों लोग, चाहे वो स्टूडेंट हों, डॉक्टर हों या कोई और, अपनी गरिमा भूलकर उसी गाने पर एक जैसे स्टेप्स दोहराने लगते हैं। यह क्रिएटिविटी नहीं, बल्कि डिजिटल गुलामी है।

यहां तक कि हमारा घूमना-फिरना और सुकून भी अब FOMO (Fear of Missing Out) और दूसरों को दिखाने की भेड़चाल से तय होता है। लोग किसी जगह को महसूस करने नहीं जाते, बल्कि सोशल मीडिया के बताए Insta-worthy या एस्थेटिक पॉइंट्स पर रील बनाने और फोटो खिंचाने जाते हैं। पहाड़ों पर लगने वाला मीलों लंबा ट्रैफिक जाम प्रकृति प्रेम का नहीं, बल्कि इसी नकलची संस्कृति का नतीजा है।


तो हो जाता है बॉयकॉटअगर आप भीड़ से अलग कोई राय रखते हैं या स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाते हैं, तो डिजिटल दुनिया आपको तुरंत अलग-अलग कर देगी, कैंसल या बॉयकॉट कर देने का डर दिखाने लगती है। कलेक्टिव मानसिक गुलामी के दौर में ऐन रैंड की फिलॉसफीऔर उनके उपन्यास का हीरो हावर्ड रॉर्क एक गाइड की तरह उभरते हैं।

रॉर्क एक ऐसा किरदार है जो पूरी दुनिया के खिलाफ जाकर, गरीबी और गुमनामी को गले लगा लेता है लेकिन अपने आर्किटेक्चर की मौलिकता से रत्ती भर भी समझौता नहीं करता। रॉर्क का नजरिया आज के उस सोशल मीडिया जेनरेशन के लिए एक तमाचा है, जो हर सुबह उठकर दूसरों की मंजूरियों, लाइक्स, डिसलाइक्स, वैलिडेशन की बैसाखियों पर अपना वजूद तलाशती है।

जब पूरी दुनिया एक दिशा में भाग रही हो, तब अपनी जगह पर मजबूती से अकेले खड़े रहने के लिए जिस असाधारण हिम्मत की जरूरत होती है, वही हिम्मत रॉर्क के कैरेक्टर का असली आर्किटेक्चर है। इस कहानी में सिर्फ इमारतों को तराशने की बात ही नहीं है, बल्कि यह इंसान के भीतर की रीढ़ की हड्डी को सीधा और मजबूत रखने की कला बताई गई है।


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मौलिकता को बचाए रखने का संघर्षयह हर उस क्रिएटिव व्यक्ति, कवि, कहानीकार, पत्रकार, कलाकार, इन्फ्लुएंसर और इनोवेटर की अंतहीन लड़ाई है जो सिस्टम और बाजार के दबावों के बीच अपनी मौलिकता को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। टीवी में एक तरह का सीरियल हिट हुआ तो बस उसी तरह के सैकड़ों सीरियलों की लाइन लग जाती है। हर क्रिएटिव काम को एक प्रॉडक्ट में बदल दिया गया है। प्रकाशक, निर्माता और समाज के ठेकेदार हमेशा रचनाकार पर यह दबाव बनाते हैं कि वह वही लिखे या बनाए जो बिकता है, न कि वह जो उसकी आत्मा की आवाज है। जब एक रचनाकार इस दबाव के आगे घुटने टेक देता है, तो उसकी कला की मौत हो जाती है।

मॉरल ऑफ द स्टोरी'द फाउंटेनहेड' इसी रचनात्मक समझौते के खिलाफ एक आवाज़ है जो आज से लगभग 83 साल पहले उठाई गई मगर आज भी हम उससे सबक नहीं ले पा रहे हैं। इस उपन्यास में रॉर्क के उलट जो पीटर कीटिंग का किरदार है, वह हमेशा वही करता है जो समाज उससे चाहता है यानी वह 'जैसा देश वैसा भेष' के सिद्धांत को चरम पर ले जाता है। वह दूसरों की तारीफों के सहारे जीता है और अंत में एक खोखला इंसान बनकर रह जाता है।

रॉर्क कीटिंग से कहता है कि तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह थी कि तुमने हमेशा दूसरों की आंखों के जरिए खुद को देखा। यह बात आज के हर उस लेखक, कलाकार और आम इंसान पर लागू होती है जो अपने नज़रिए को छोड़कर बाजार या समाज की मांग के अनुसार खुद को मोड़ लेता है।

उपन्यास के एक बेहद पावरफुल सीन में जब कोर्ट के अंदर हावर्ड रॉर्क पर मुकदमा चलता है, तब वह अपनी पैरवी खुद करते हुए कहता है कि सदियों से उन लोगों को सजा दी जाती रही, जो सबसे पहले लीक से हटकर चले, लेकिन अंत में उन्हीं के बनाए रास्तों पर पूरी इंसानियत आगे बढ़ी।

रॉर्क की यह दलील इस बात का सबूत है कि दुनिया को आगे ले जाने वाले हमेशा वही लोग होते हैं जो अनुमति मांगने के बजाय अपने काम को अंजाम देने का हौसला रखते हैं। हावर्ड रॉर्क का किरदार हमें यह याद दिलाने के लिए हमेशा प्रासंगिक रहेगा कि सफलता की असली परिभाषा वह नहीं है जो दुनिया या सोशल मीडिया के लाइक्स आपके लिए तय करते हैं, बल्कि सफलता वह है जब आप अपनी बनाई इमारतों या अपने विचारों को देखकर गर्व से कह सकें कि यह पूरी तरह मेरी है और इसे बनाने में मैंने अपनी आत्मा का सौदा नहीं किया।