'पति के तो मजे हो गए ना, पत्नी का पैसा लूटना है, उससे फिजिकल लेबर कराना है...'
आज के समय में महिला सशक्तिकरण को लड़कियों की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। पढ़ाई, नौकरी और सेल्फ इंडिपेंडेंट होना इसकी सबसे बड़ी पहचान समझी जाती है। लेकिन कंटेंट क्रिएटर लोकेश कटारिया ने अपने एक इंस्टाग्राम वीडियो में इस मुद्दे पर एक अलग नजरिया रखा है। उनका कहना है कि कई जगहों पर महिला सशक्तिकरण को पति और ससुराल वाले गलत तरीके से समझने लगे हैं, जिसकी वजह से कई लड़कियां घर और बाहर की सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने ऊपर उठाकर ठगी हुई महसूस करती हैं। अपने वीडियो में उन्होंने बताया कि किस तरह वुमेन एम्पावरमेंट का फायदा कई बार लड़कियों से ज्यादा लड़कों को मिलने लगता है। आइए जानते हैं उन्होंने इस बारे में क्या कहा।

महिला सशक्तिकरण का फायदा किसे मिल रहा है?
लोकेश कटारिया कहते हैं कि वुमेन एम्पावरमेंट का असली मतलब लड़कियों को पढ़ाई, नौकरी और अपने फैसले लेने की आजादी देकर उन्हें सोसाइटी में बराबरी का दर्जा दिलाना था। इसका मकसद यह नहीं था कि लड़कियों पर जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ा दिया जाए। लेकिन उनके मुताबिक, आज भी कई घरों में पति और ससुराल वालों की नजर में वुमेन एम्पावरमेंट की डेफिनेशन कुछ और ही समझ ली गई है। उनका कहना है कि लड़कियां नौकरी भी कर रही हैं, घर भी संभाल रही हैं और बच्चों की जिम्मेदारी भी उठा रही हैं, जबकि परिवार वालों और पति का बर्ताव पहले जैसा ही बना हुआ है।
नौकरी करने वाली महिलाओं से होती है दोगुनी उम्मीद
लोकेश कटारिया के मुताबिक, आजकल कई लड़के वाले ऐसी लड़की चाहते हैं जो पढ़ी-लिखी हो, अच्छी नौकरी करती हो और फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट हो, ताकि वह घर के खर्चों में भी मदद कर सके। लेकिन शादी के बाद उसी महिला से यह उम्मीद भी की जाती है कि वह घर का खाना बनाए, बच्चों को संभाले और पूरे परिवार का ध्यान भी रखे। लोकेश का कहना है कि अगर कोई लड़की नौकरी भी कर रही है और घर की सारी जिम्मेदारियां भी अकेले निभा रही है, तो इसे बराबरी नहीं कहा जा सकता।
महिला सशक्तिकरण का फायदा किसे मिल रहा है?
लोकेश कटारिया कहते हैं कि वुमेन एम्पावरमेंट का असली मतलब लड़कियों को पढ़ाई, नौकरी और अपने फैसले लेने की आजादी देकर उन्हें सोसाइटी में बराबरी का दर्जा दिलाना था। इसका मकसद यह नहीं था कि लड़कियों पर जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ा दिया जाए। लेकिन उनके मुताबिक, आज भी कई घरों में पति और ससुराल वालों की नजर में वुमेन एम्पावरमेंट की डेफिनेशन कुछ और ही समझ ली गई है। उनका कहना है कि लड़कियां नौकरी भी कर रही हैं, घर भी संभाल रही हैं और बच्चों की जिम्मेदारी भी उठा रही हैं, जबकि परिवार वालों और पति का बर्ताव पहले जैसा ही बना हुआ है।
नौकरी करने वाली महिलाओं से होती है दोगुनी उम्मीद
लोकेश कटारिया के मुताबिक, आजकल कई लड़के वाले ऐसी लड़की चाहते हैं जो पढ़ी-लिखी हो, अच्छी नौकरी करती हो और फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट हो, ताकि वह घर के खर्चों में भी मदद कर सके। लेकिन शादी के बाद उसी महिला से यह उम्मीद भी की जाती है कि वह घर का खाना बनाए, बच्चों को संभाले और पूरे परिवार का ध्यान भी रखे। लोकेश का कहना है कि अगर कोई लड़की नौकरी भी कर रही है और घर की सारी जिम्मेदारियां भी अकेले निभा रही है, तो इसे बराबरी नहीं कहा जा सकता।
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