Exclusive: अविनाश तिवारी बोले- लाइफ पार्टनर ऐसी चाहिए जो मुझे झेल पाए, हमें झेलना थोड़ा मुश्किल है

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'लैला मजनू', 'ओ रोमियो' जैसी फिल्में हों या 'खाकी: द बिहार चैप्टर', 'काला', 'बंबई मेरी जान' जैसी वेब सीरीज, एक्टर अविनाश तिवारी ने पर्दे पर इंटेंस, ग्रे और गंभीर भूमिकाओं में अपनी अलग धाक जमाई है। लेकिन अब अपनी नई फिल्म 'गिन्नी वेड्स सनी 2' में वह पहली बार नाच-गाने, रोमांस वाली फुल मसाला एंटरटेनर में नजर आने वाले हैं। पेश है उनसे यह खास बातचीत।

आपकी फिल्म शादी के इर्द-गिर्द है, कभी आप पर यह दबाव नहीं आया कि अब शादी की उम्र हो गई है! बुआ-चाची ने फोटोज नहीं भेजीं?
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बिल्कुल भेजी हैं। यह पूरा जो चक्र होता है शादी कर लो वाला, वो दो-तीन बार पूरा हो चुका है। पहली बार जब मैं 28-30 साल के पास पहुंचा तब ये बात शुरू हुई कि अब शादी कर लेनी चाहिए। दो-चार साल यह सब चला, फिर वे शांत हो गए कि इसका कुछ होना नहीं है। पांच साल बाद फिर उन्होंने शुरू किया। वहीं, अब तीसरी बार वापस यह चालू हुआ है। मेरी भी चाहत है कि मैं उनकी ये ख्वाहिश पूरी कर दूं। लड़की मिले तो मैं ये काम करूं।



ऐसा क्या ढूंढ़ रहे हैं लड़की में, जो नहीं मिल रही?
मेरी जो जरूरतें या चाहतें हैं वो तो अपनी जगह है मगर सबसे जरूरी बात ये है कि वो मुझे झेल पाए। शादी के रिश्ते के सफल होने के लिए बहुत जरूरी है कि दोनों एक-दूसरे के लिए झेल पाएं। मेरा मानना है कि मुझे झेलना थोड़ा मुश्किल है। जैसे, फिल्म में सनी जैसे आदमी को लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा का रूप सरीखी गिन्नी संभाल सकती है। मेरे जैसे आदमी को झेलने के लिए एक पार्वती भी चाहिए तो ऊपरवाला जब ऐसा कोई बनाएगा तो देखेंगे।



आपको लगता है कि यह फिल्म सही समय पर थिएटर में आ रही है, क्योंकि हाल ही में 'धुरंधर' देखने के लिए दर्शक भर-भरकर कर सिनेमा हॉल पहुंचे?
यह एक चक्र होता है, जिसमें कुछ फिल्में ऐसी आएंगी जो बहुत बिजनेस करेंगी। फिर कुछ ऐसी फिल्में होंगी जो बिल्कुल नहीं चलेंगी। मुझे लगता है कि यह किसी को नहीं पता कि कौन सी चीज दर्शकों को थिएटर में ला सकती है। जब फिल्म चल जाती है तो सब लोग जीनियस हो जाते हैं। सबको पता हो जाता है कि क्या करना है। वहीं, जब फिल्म नहीं चलती है तो हर कोई बोलता है कि इन्हें कुछ नहीं पता, कुछ नहीं आता कि कैसे आएगी ऑडियंस? पर हर किसी की कोशिश तो यही होती है कि उन्होंने जो बनाया है, वो ऑडियंस को पसंद आए। कोई इसलिए तो फिल्म बनाता नहीं है कि कोई उसे देखने ना आए। रही बात 'धुरंधर' की, तो वह बहुत अच्छे से बनाई गई फिल्म है। उसका क्राफ्ट लाजवाब है, स्टोरी टेलिंग जबरदस्त है। वह एक फिल्म है, उसमें कुछ लोग रिएलिटी ढूंढ़ने लगे तो उनकी दिक्कत है। लोगों के अपने-अपने नैरेटिव हैं, मैं उसमें नहीं जाना चाहता लेकिन जहां तक फिल्म मेकिंग के क्राफ्ट की बात है, वो टॉप नॉच है। अच्छी बात यह है कि ऑडियंस भी इवॉल्व हो रही है। इससे उम्मीद बंधती है कि अगर लोग क्वॉलिटी वर्क को सराहेंगे, तो जो लोग क्वॉलिटी काम करते हैं उनका कद बढ़ेगा और मैं उम्मीद करता हूं कि ऐसा हो।


आपने पर्दे पर सीरियस, इंटेंस रोल ज्यादा किए हैं। इस फिल्म में पहली बार नाच-गाना, रोमांस-कॉमिडी सब करते दिख रहे हैं। यह अनुभव कितना अलग रहा?
मुझे बहुत मजा आया क्योंकि पहली बार मुझे टिपिकल बॉलीवुड मसाला फिल्म करने का मौका मिला और हर एक्टर ऐसी फिल्म करना चाहता है तो मैं बहुत शुक्रगुजार हूं कि मुझे यह फिल्म मिली। खास बात यह है कि इसे शूट करने से दो दिन पहले तक मैं जो फिल्म शूट कर रहा था वो बहुत ही इंटेंस था तो मुझे इतना वक्त ही नहीं मिल पाया कि मैं उस जोन से निकलकर इसमें आ पाऊं। इसके बावजूद, सब कुछ बहुत मजेदार तरीके से हो पाया, उसका एक बड़ा श्रेय मेरी को-एक्टर मेधा शंकर को जाता है। जब मैं सेट पर आया तो उनका पहला सवाल था- आज रात को हम कहां घूमने जा रहे हैं? तो ऐसी फिल्म के लिए एक जो एनर्जी होनी चाहिए, वो शुरू में ही सेट हो गई। वह इतनी खुशदिल इंसान हैं, जैसे रेगिस्तान में कहीं-कहीं जो हरियाली होती है न, वैसा था।

'दोस्त फर्स्ट आए, आप फेल हो जाए, दर्द तो...', 'धुरंधर 2' पर अविनाश तिवारी के बेबाक बोल

'धुरंधर' की सफलता को काफी सेलिब्रेट किया गया, मगर चर्चा ये भी रही कि इंडस्ट्री में काफी लोगों को उससे जलन भी हुई। आपके हिसाब से इंडस्ट्री दूसरे साथियों की सक्सेस को सेलिब्रेट करती है या इन्सिक्योर महसूस करती है?
इसका '3 इडियट्स' में एक बड़ा अच्छा उदाहरण था कि दोस्त फर्स्ट आए और आप फेल हो जाएं तो बहुत दर्द होता है तो हम कुछ भी कह लें, पर मैंने भी एक दुकान खोली है, आपने भी एक दुकान खोली है और सारी भीड़ आपके पास ही जा रही है तो मुझे थोड़ी तकलीफ होना लाजिमी है। ये बहुत नैचुरल सी बात है। इसमें एक तरीका ये होता है कि हम सोचें कि यार, दूसरा ऐसा क्या कर रहा है जिससे इतने लोग आ रहे हैं? मैं ऐसा क्या कर सकता हूं जिसकी वजह से मेरे पास लोग आएं। दूसरा तरीका जो मैं सोचता हूं कि जिसे शहर पर राज करना हो, वो अपने बगल वाले के घर पर थोड़ी देख रहा है कि उसके घर पर आज तीन रोटी एक्स्ट्रा आई है तो दो पहलू हैं। इसमें कुछ लोग इंस्पायर होता है, किसी की नजर ही नहीं जाती लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि मैंने फिल्म लगाई कोई देखने नहीं आया। दूसरे ने लगाई जिसमें सब लोग आ गए तो कैसे मैं बोलूं कि ओह, मैं तो बहुत खुश हूं, कैसे मैं बोलूं? हम आम इंसान हैं। मगर समझदारी इसी में है कि हम उससे प्रेरणा लें और खुद बेहतर करें, पर ऐसा महसूस होना लाजिमी है। उसमें कोई बड़ी बात नहीं है।