'दंगे होंगे, खून की नदियां बहेंगी', दारा सिंह को मिली थी धमकी, फिल्म पर लगा बैन, संजय गांधी ने की थी मदद
इमरजेंसी के दौर को भारत के इतिहास का सबसे काला और दर्दनाक अध्याय माना जाता है। इमरजेंसी साल 1975 में लागू की गई थी और 1977 में यह खत्म हुई। उस वक्त प्रेस की आजादी पर बहुत ज्यादा रोक लगा दी गई थी। एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री पर भी इसका बुरा असर पड़ा था। कई ऐसी फिल्मों और गानों पर रोक लगा दी गई, जो सत्ताधारी सरकार पर सवाल उठाते थे या उनकी राजनीति के हिसाब से नहीं थे। एक्टर दारा सिंह की एक फिल्म को रिलीज होने के बाद बैन कर दिया गया था, जिससे उन्हें तब 35 लाख रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा था। आज यानी 2026 के हिसाब से देखें, तो दारा सिंह को अपनी फिल्म के बैन होने से 10 करोड़ का नुकसान हुआ था। तब इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने उनकी मदद की थी।

इमरजेंसी के उस दौर में कई एक्टर्स और डायरेक्टर्स को बहुत कुछ झेलना पड़ा था। किशोर कुमार से लेकर बलराज साहनी और देव आनंद जैसे कलाकार सरकार का खुलकर विरोध कर रहे थे। एक्टर और डायरेक्टर मनोज कुमार ने तो सरकार पर केस ही कर दिया। इसी तरह इमरजेंसी का खामियाजा संजीव कपूर की 'आंधी' और रमेश सिप्पी की 'शोले' जैसी फिल्मों को भी उठाना पड़ा। उसी दौर में एक्टर दारा सिंह को भी बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। उनकी पंजाबी फिल्म 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' को रिलीज के बाद बैन कर दिया गया और उन्हें 35 लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ।
क्या थी 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' की कहानी?
इस फिल्म को दारा सिंह ने डायरेक्ट किया था और एक्टिंग भी की थी। इसमें उन्होंने करतार सिंह नाम के एक हिंदू व्यक्ति का किरदार निभाया था, जो सिख धर्म अपना लेता है और मुगल सेना के खिलाफ लड़ रही बागी सिख सेना में शामिल हो जाता है। उन दिनों दारा सिंह की पंजाबी फिल्में काफी हिट हो रही थीं और उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी फिल्म को लेकर कोई विवाद होगा। हालांकि, जब 1975 में 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' की शूटिंग चल रही थी, तभी देश में इमरजेंसी लागू हो गई और जब 1976 में फिल्म रिलीज होने वाली थी, तो वह बड़ी मुश्किल में फंस गई।
दारा सिंह ने बयां की थी घटना, बताया फिल्म में क्या दिखाया था
दारा सिंह ने इस घटना का जिक्र अपनी ऑटोबायोग्राफी में किया था। उन्होंने लिखा, 'हमने फिल्म में दिखाया कि कैसे सिख समुदाय को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा और कैसे हिंदू लोग सिखों के लिए लड़ते थे। असल में, हिंदू परिवारों में कम से कम एक लड़का सिख बनता था और सेना में भर्ती होता था। हमने इस फिल्म में भी यही दिखाने की कोशिश की कि कैसे सिख हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों की रक्षा करते थे। उनका मकसद गरीब और बेबस लोगों को न्याय दिलाना और जुल्म के खिलाफ लड़ना था।'
फिल्म का नाम बदला, स्थानीय नेताओं ने किया विरोध
फिल्म में राजेश खन्ना और नीतू कपूर के कैमियो भी थे। पहले फिल्म का नाम 'राज करेगा खालसा' था, लेकिन जब दारा सिंह को लगा कि इस पर विरोध हो सकता है, तो उन्होंने इसका नाम बदलकर 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' कर दिया। उन्होंने यह नाम गुरु गोबिंद सिंह की शिक्षाओं से प्रेरित होकर रखा। हालांकि, इससे ज्यादा फायदा नहीं हुआ। इंदिरा गांधी द्वारा देश में इमरजेंसी लागू करने के बाद, पंजाब के स्थानीय नेताओं ने फिल्म का विरोध करने का फैसला किया। दारा सिंह, जो तब तक कांग्रेस के वफादार थे, इन विरोधी राजनीतिक विचारधाराओं के बीच फंस गए।
पंजाब में ब्लॉकबस्टर रही फिल्म, ज्ञानी जैल सिंह ने करवाए बदलाव
'सवा लाख से एक लड़ाऊं' को साल 1976 में सेंसर सर्टिफिकेट मिला था और बोर्ड से हरी झंडी मिलने के बाद रिलीज हुई। पंजाब में यह ब्लॉकबस्टर रही, पर रिलीज के दो दिन बाद पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने फिल्म देखने की इच्छा जाहिर की। फिल्म देखी तो उन्होंने दारा सिंह से इसमें कुछ बदलाव करने के लिए कहा। उन्होंने दारा से सरकार में भ्रष्टाचार के बारे में बात करने वाले डायलॉग हटाने को कहा, जबकि फिल्म 1970 के दशक पर आधारित नहीं थी। कुछ और बदलावों का भी सुझाव दिया गया, और दारा सिंह ने उन्हें मान लिया। लेकिन ज्ञानी जैल सिंह फिल्म से संतुष्ट नहीं थे और उन्हें डर था कि इससे दंगे हो सकते हैं और यह एक राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
पगड़ी का रंग बदलने को कहा, तो दारा सिंह ने दिया था ये जवाब
सीमा सोनिक अलीमचंद की किताब 'दीदारा उर्फ दारा सिंह' के अनुसार, ज्ञानी जैल सिंह ने दारा सिंह से कहा कि वह फिल्म में सिख किरदारों द्वारा पहनी जाने वाली पगड़ियों का रंग नीले से बदलकर सफेद कर दें। जब दारा सिंह ने समझाया कि पगड़ियों का रंग बदलने के लिए उन्हें फिल्म का ज्यादातर हिस्सा दोबारा शूट करना पड़ेगा, तो ज्ञानी जैल सिंह ने पूछा कि क्या यह बहुत महंगा पड़ेगा। दारा सिंह ने कहा, 'हां, अगर मैं दोबारा शूट करता हूं तो मुझे बहुत नुकसान होगा क्योंकि फिल्म पर लगभग 35 लाख रुपये खर्च किए थे, जो उस समय तक की सबसे महंगी पंजाबी फिल्मों में से एक थी।'
बाबा संता सिंह ने दी धमकी- दंगे होंगे, खून की नदियां बहेंगी
इसके कुछ दिनों बाद, 'बुड्ढा दल' नाम के एक पंथ के प्रमुख बाबा संता सिंह ने फिल्म पर रोक लगाने की मांग की। खबरों के अनुसार, उन्होंने एक सभा को संबोधित करते हुए सवाल उठाया कि दारा सिंह कटे हुए बालों के साथ जत्थेदार की भूमिका कैसे निभा सकते हैं? यह दारा सिंह की मुश्किलों की बस शुरुआत थी। जब दारा सिंह अपनी फिल्म का मकसद समझाने के लिए सांता सिंह से मिलने गए, तो उनसे कहा गया, 'अगर इस धार्मिक फिल्म को रिलीज होने दिया गया, तो सब सावधान हो जाएं, दंगे होंगे, खून की नदियां बहेंगी।' जब दारा सिंह ने उनसे फिल्म देखने की गुजारिश की और कहा कि यह सिखों के लिए है, उनके खिलाफ नहीं, तो सांता सिंह ने गुस्से में कहा कि मैं फिल्में नहीं देखता।
इमरजेंसी के उस दौर में कई एक्टर्स और डायरेक्टर्स को बहुत कुछ झेलना पड़ा था। किशोर कुमार से लेकर बलराज साहनी और देव आनंद जैसे कलाकार सरकार का खुलकर विरोध कर रहे थे। एक्टर और डायरेक्टर मनोज कुमार ने तो सरकार पर केस ही कर दिया। इसी तरह इमरजेंसी का खामियाजा संजीव कपूर की 'आंधी' और रमेश सिप्पी की 'शोले' जैसी फिल्मों को भी उठाना पड़ा। उसी दौर में एक्टर दारा सिंह को भी बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। उनकी पंजाबी फिल्म 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' को रिलीज के बाद बैन कर दिया गया और उन्हें 35 लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ।
क्या थी 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' की कहानी?
इस फिल्म को दारा सिंह ने डायरेक्ट किया था और एक्टिंग भी की थी। इसमें उन्होंने करतार सिंह नाम के एक हिंदू व्यक्ति का किरदार निभाया था, जो सिख धर्म अपना लेता है और मुगल सेना के खिलाफ लड़ रही बागी सिख सेना में शामिल हो जाता है। उन दिनों दारा सिंह की पंजाबी फिल्में काफी हिट हो रही थीं और उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी फिल्म को लेकर कोई विवाद होगा। हालांकि, जब 1975 में 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' की शूटिंग चल रही थी, तभी देश में इमरजेंसी लागू हो गई और जब 1976 में फिल्म रिलीज होने वाली थी, तो वह बड़ी मुश्किल में फंस गई।
दारा सिंह ने बयां की थी घटना, बताया फिल्म में क्या दिखाया था
दारा सिंह ने इस घटना का जिक्र अपनी ऑटोबायोग्राफी में किया था। उन्होंने लिखा, 'हमने फिल्म में दिखाया कि कैसे सिख समुदाय को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा और कैसे हिंदू लोग सिखों के लिए लड़ते थे। असल में, हिंदू परिवारों में कम से कम एक लड़का सिख बनता था और सेना में भर्ती होता था। हमने इस फिल्म में भी यही दिखाने की कोशिश की कि कैसे सिख हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों की रक्षा करते थे। उनका मकसद गरीब और बेबस लोगों को न्याय दिलाना और जुल्म के खिलाफ लड़ना था।'
फिल्म का नाम बदला, स्थानीय नेताओं ने किया विरोध
फिल्म में राजेश खन्ना और नीतू कपूर के कैमियो भी थे। पहले फिल्म का नाम 'राज करेगा खालसा' था, लेकिन जब दारा सिंह को लगा कि इस पर विरोध हो सकता है, तो उन्होंने इसका नाम बदलकर 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' कर दिया। उन्होंने यह नाम गुरु गोबिंद सिंह की शिक्षाओं से प्रेरित होकर रखा। हालांकि, इससे ज्यादा फायदा नहीं हुआ। इंदिरा गांधी द्वारा देश में इमरजेंसी लागू करने के बाद, पंजाब के स्थानीय नेताओं ने फिल्म का विरोध करने का फैसला किया। दारा सिंह, जो तब तक कांग्रेस के वफादार थे, इन विरोधी राजनीतिक विचारधाराओं के बीच फंस गए।
पंजाब में ब्लॉकबस्टर रही फिल्म, ज्ञानी जैल सिंह ने करवाए बदलाव
'सवा लाख से एक लड़ाऊं' को साल 1976 में सेंसर सर्टिफिकेट मिला था और बोर्ड से हरी झंडी मिलने के बाद रिलीज हुई। पंजाब में यह ब्लॉकबस्टर रही, पर रिलीज के दो दिन बाद पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने फिल्म देखने की इच्छा जाहिर की। फिल्म देखी तो उन्होंने दारा सिंह से इसमें कुछ बदलाव करने के लिए कहा। उन्होंने दारा से सरकार में भ्रष्टाचार के बारे में बात करने वाले डायलॉग हटाने को कहा, जबकि फिल्म 1970 के दशक पर आधारित नहीं थी। कुछ और बदलावों का भी सुझाव दिया गया, और दारा सिंह ने उन्हें मान लिया। लेकिन ज्ञानी जैल सिंह फिल्म से संतुष्ट नहीं थे और उन्हें डर था कि इससे दंगे हो सकते हैं और यह एक राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
पगड़ी का रंग बदलने को कहा, तो दारा सिंह ने दिया था ये जवाब
सीमा सोनिक अलीमचंद की किताब 'दीदारा उर्फ दारा सिंह' के अनुसार, ज्ञानी जैल सिंह ने दारा सिंह से कहा कि वह फिल्म में सिख किरदारों द्वारा पहनी जाने वाली पगड़ियों का रंग नीले से बदलकर सफेद कर दें। जब दारा सिंह ने समझाया कि पगड़ियों का रंग बदलने के लिए उन्हें फिल्म का ज्यादातर हिस्सा दोबारा शूट करना पड़ेगा, तो ज्ञानी जैल सिंह ने पूछा कि क्या यह बहुत महंगा पड़ेगा। दारा सिंह ने कहा, 'हां, अगर मैं दोबारा शूट करता हूं तो मुझे बहुत नुकसान होगा क्योंकि फिल्म पर लगभग 35 लाख रुपये खर्च किए थे, जो उस समय तक की सबसे महंगी पंजाबी फिल्मों में से एक थी।'
बाबा संता सिंह ने दी धमकी- दंगे होंगे, खून की नदियां बहेंगी
इसके कुछ दिनों बाद, 'बुड्ढा दल' नाम के एक पंथ के प्रमुख बाबा संता सिंह ने फिल्म पर रोक लगाने की मांग की। खबरों के अनुसार, उन्होंने एक सभा को संबोधित करते हुए सवाल उठाया कि दारा सिंह कटे हुए बालों के साथ जत्थेदार की भूमिका कैसे निभा सकते हैं? यह दारा सिंह की मुश्किलों की बस शुरुआत थी। जब दारा सिंह अपनी फिल्म का मकसद समझाने के लिए सांता सिंह से मिलने गए, तो उनसे कहा गया, 'अगर इस धार्मिक फिल्म को रिलीज होने दिया गया, तो सब सावधान हो जाएं, दंगे होंगे, खून की नदियां बहेंगी।' जब दारा सिंह ने उनसे फिल्म देखने की गुजारिश की और कहा कि यह सिखों के लिए है, उनके खिलाफ नहीं, तो सांता सिंह ने गुस्से में कहा कि मैं फिल्में नहीं देखता।
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