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दादी-नानी के मसाले जिनके फायदे आज भी हैं वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण

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भारतीय रसोई की पहचान सिर्फ स्वादिष्ट व्यंजनों से नहीं, बल्कि उन मसालों से भी है जो सदियों से हमारे भोजन का हिस्सा रहे हैं। हल्दी, जीरा और धनिया जैसे मसाले आज भी आम हैं, लेकिन कई पारंपरिक मसाले धीरे-धीरे हमारी थाली से गायब होते जा रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली और पैकेज्ड मसालों के बढ़ते चलन के बीच लोग इन पुराने मसालों की उपयोगिता को भूलते जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई मसालों पर अब वैज्ञानिक शोध भी हो रहे हैं, जो इनके पोषण और स्वास्थ्य संबंधी गुणों को उजागर कर रहे हैं। ऐसे में इन भूले-बिसरे मसालों को फिर से जानना और अपनाना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
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भारतीय रसोई की विरासत हैं पारंपरिक मसाले

भारत को मसालों की धरती कहा जाता है। सदियों पहले भारतीय मसालों की मांग दुनिया भर में थी और इन्हीं के कारण कई देशों ने समुद्री व्यापार मार्ग खोजे। हर क्षेत्र की अपनी मसाला परंपरा रही है, जो वहां की जलवायु, खेती और खानपान के अनुसार विकसित हुई।

जहां एक ओर काली मिर्च, दालचीनी और इलायची ने अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई, वहीं रतनजोत, नागकेसर, कचूर, जावित्री और पत्थर का फूल जैसे मसाले धीरे-धीरे आम रसोई से दूर होते गए। हालांकि आज भी कई पारंपरिक व्यंजनों का असली स्वाद इन्हीं मसालों से आता है।



स्वाद के साथ पोषण भी देते हैं ये मसाले

पारंपरिक भारतीय मसाले केवल भोजन का स्वाद नहीं बढ़ाते, बल्कि उनमें कई प्राकृतिक पोषक तत्व और पौधों से मिलने वाले लाभकारी यौगिक भी पाए जाते हैं।

उदाहरण के लिए, नागकेसर में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जबकि कचूर अपनी सुगंध और पारंपरिक उपयोग के लिए जाना जाता है। पत्थर का फूल, जिसे कई लोग पहली नजर में पहचान भी नहीं पाते, बिरयानी और कुछ खास मसाला मिश्रणों में गहराई और अलग स्वाद जोड़ता है।

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