नवरात्रि में बच्चों को सुनाइए मां दुर्गा की ये 9 कहानियां, फोन छोड़ बच्चे खुद आपके पास दौड़े आएंगे, जानिए सुनाने का सही तरीका
नवरात्रि के पावन दिनों में bachcho navratri katha सुनाना एक पुरानी और खूबसूरत परंपरा रही है, जिसे आज के भागदौड़ भरे समय में हम कहीं पीछे छोड़ते जा रहे हैं। घरों में जहां पहले शाम को दादी-नानी मां दुर्गा की कहानियां सुनाया करती थीं, वहां आज बच्चे मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि नवरात्रि के ये नौ दिन बच्चों से जुड़ने और उन्हें संस्कार देने का सबसे अच्छा मौका होते हैं।
मां दुर्गा की कहानियां सिर्फ धार्मिक प्रसंग नहीं हैं, बल्कि साहस, धैर्य और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती हैं। महिषासुर पर दुर्गा की विजय, शुंभ-निशुंभ का वध या फिर नौ देवियों के अलग-अलग रूप — हर कथा में बच्चों के लिए कोई न कोई सीख छिपी है। जब बच्चा सुनता है कि कैसे मां दुर्गा ने अकेले ही इतनी बड़ी सेना का सामना किया, तो उसके भीतर भी डर से लड़ने का हौसला पैदा होता है।
आज के दौर में बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ना हर माता-पिता की चिंता है। दरअसल बच्चों को कहानी सुनाने वाला कोई नहीं मिलता, इसलिए वे फोन पकड़ते हैं।
नवरात्रि के हर दिन मां के एक अलग रूप की पूजा होती है और हर रूप की अपनी कहानी है। पहले दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, फिर चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और आखिर में सिद्धिदात्री — इन नौ देवियों की कथाएं क्रम से सुनाने से बच्चों में दिन गिनने और आगे की कहानी जानने की उत्सुकता बनी रहती है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कहानियों को बच्चों की उम्र के हिसाब से आसान भाषा में सुनाएं। छोटे बच्चों को महिषासुर वध की कहानी नाटकीय अंदाज में सुनाइए — जैसे किसी फिल्म की कहानी सुना रहे हों। बड़े बच्चों को नौ देवियों के गुणों से जोड़कर बताइए कि हर गुण उनके जीवन में कैसे काम आएगा। कहानी के अंत में बच्चों से पूछिए कि उन्हें क्या सीख मिली, इससे उनकी सोचने की क्षमता बढ़ेगी।
बच्चों के चरित्र पर असर: साहस और संस्कार का खजानाबाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार कहानियां बच्चों के चरित्र निर्माण में सबसे बड़ा हथियार होती हैं।
इसके साथ ही कहानी सुनाने का समय परिवार को एक साथ लाता है। आज जब सब अपने-अपने कमरों में फोन लिए बैठे रहते हैं, नवरात्रि की कथाएं एक ऐसा बहाना बन सकती हैं, जब पूरा परिवार एक साथ बैठे, हंसे-बोले और पुरानी यादें ताजा करे। कई परिवारों में दादा-दादी की कहानियां ही बच्चों की सबसे प्यारी यादें बन जाती हैं।
सबसे पहले कहानी सुनाने का एक तय समय बनाइए — जैसे रात का खाना खाने के बाद आधा घंटा। माहौल भी खास बनाइए: दीया जलाइए, फोन साइलेंट पर रखिए और बच्चों को आराम से बैठाइए। कहानी को एक ही सांस में खत्म करने की जल्दबाजी न करें, बल्कि अगले दिन की कहानी की झलक देकर उत्सुकता छोड़ दीजिए।
कहानी सुनाते वक्त आवाज में उतार-चढ़ाव लाइए और बीच-बीच में बच्चों से सवाल पूछिए — “तुम्हें क्या लगता है, अब दुर्गा मां क्या करेंगी?” इससे बच्चे कहानी में डूब जाते हैं।
असल में नवरात्रि की कथाएं बच्चों को सिर्फ धर्म नहीं सिखातीं, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला सिखाती हैं। ये नौ दिन आपके और आपके बच्चों के बीच एक ऐसा सेतु बन सकते हैं, जो उम्रभर बना रहे। तो इस नवरात्रि फोन को थोड़ी देर के लिए दूर रखिए और बच्चों को मां दुर्गा की कहानियों की दुनिया में ले चलिए — यकीन मानिए, बच्चे खुद आपके पास आएंगे।