रेलवे की पटरियों के चारों तरफ पत्थर क्यों बिछे होते हैं? जानिए असली वजह

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अगर आप कभी किसी रेलवे लाइन को ध्यान से देखें, तो आपको पटरियों और कंक्रीट के पट्टों (स्लीपर्स) के नीचे हजारों नुकीले और खुरदरे पत्थर बिछे दिखाई देंगे। पहली नजर में ये पत्थर किसी कंस्ट्रक्शन का कचरा लग सकते हैं, लेकिन ये ट्रेन के पूरे सिस्टम का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। रेलवे इंजीनियरिंग में इन पत्थरों को 'बैलास्ट' कहा जाता है। ये पत्थर पटरियों को मजबूत बनाए रखने और ट्रेनों के भारी वजन व झटकों को सहने का काम करते हैं।
why railway tracks have stones


पटरियों को अपनी जगह पर जमाए रखना

लोहे की पटरियों को सीधे मिट्टी पर नहीं बिछाया जा सकता। अगर ऐसा किया गया तो जब हज़ारों टन वजनी ट्रेन उस पर से गुजरेगी, तो मिट्टी धंस जाएगी और पटरी टेढ़ी-मेढ़ी हो जाएगी।

रेलवे की ये गिट्टियां ट्रेन के भारी वजन को नीचे की मिट्टी पर बराबर हिस्से में फैला देती हैं। पत्थर नुकीले होने की वजह से आपस में मजबूती से फंस जाते हैं। इससे जब ट्रेन तेज़ रफ़्तार से गुजरती है, तो पटरी न तो दाएं-बाएं खिसकती है और न ही नीचे धंसती है। ट्रेन को सुरक्षित चलाने के लिए पटरियों का अपनी जगह पर बने रहना बहुत जरूरी है।


पत्थर गोल नहीं, हमेशा नुकीले क्यों होते हैं?

इन पत्थरों की बनावट का सही होना बहुत जरूरी है। अगर पटरियों पर नदी वाले गोल पत्थर डाल दिए जाएं, तो वे ट्रेन के गुजरने पर फिसलने लगेंगे और एक-दूसरे के ऊपर से लुढ़क जाएंगे।

इसीलिए रेलवे में हमेशा खदानों से तोड़े गए नुकीले और खुरदरे पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है। ये नुकीले पत्थर एक-दूसरे के साथ बहुत मजबूती से जकड़ जाते हैं। ये पत्थर इतने मजबूत होते हैं कि मौसम की मार, भारी वजन और ट्रेन के तेज़ कंपन्न को आसानी से झेल लेते हैं।

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पानी की निकासी और जलभराव से बचाव

बारिश का पानी अगर पटरियों के आसपास जमा हो जाए, तो पटरियों के नीचे की ज़मीन कमजोर हो सकती है और मिट्टी बह सकती है।

गिट्टियों के बीच खाली जगह होती है, जिससे बारिश का पानी तुरंत छनकर नीचे चला जाता है और पटरियों के पास पानी जमा नहीं होता। इससे पटरियाँ और कंक्रीट के स्लीपर पानी से खराब होने से बच जाते हैं। इसके अलावा, ये पत्थर पटरियों के आसपास घास और पेड़-पौधों को उगने से भी रोकते हैं।

पटरियों की मरम्मत और रखरखाव में आसानी

समय के साथ लगातार ट्रेनें गुजरने से पटरियों का संतुलन थोड़ा-बहुत बिगड़ जाता है। ऐसे में रेलवे की मेंटेनेंस टीमें इन पत्थरों की मदद से पटरियों की ऊँचाई और दिशा को दोबारा सही कर लेती हैं।

विशेष मशीनों के ज़रिए इन पत्थरों को स्लीपर्स के नीचे दोबारा दबाया और सेट किया जाता है। इससे पूरी पटरी को उखाड़े बिना ही उसकी मरम्मत आसानी से हो जाती है।


क्या हर रेलवे लाइन पर पत्थर होना जरूरी है?

हर जगह पत्थरों वाली पटरी नहीं होती। आजकल कई आधुनिक मेट्रो स्टेशनों, सुरंगों और हाई-स्पीड रेल लाइनों पर पत्थरों की जगह कंक्रीट के पक्के ट्रैक (स्लैब ट्रैक) का इस्तेमाल किया जाता है।

लेकिन आम रेलवे लाइनों के लिए पत्थरों वाला यह तरीका आज भी सबसे सस्ता, टिकाऊ और आसान माना जाता है।

इसलिए अगली बार जब आप रेलवे पटरी पर फैले पत्थरों को देखें, तो समझ जाएं कि वे सिर्फ जगह घेरने के लिए नहीं हैं। वे ट्रेन के वजन को संभालने, पानी निकालने और आपकी रेल यात्रा को सुरक्षित बनाने का बहुत बड़ा काम कर रहे हैं।

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