क्यों सालों-साल रखने के बाद भी कभी खराब नहीं होता शहद?
क्या आप जानते हैं कि जब वैज्ञानिकों ने मिस्र के प्राचीन पिरामिडों और राजाओं के मकबरों की खुदाई की, तो उन्हें वहां मिट्टी के बर्तनों में बंद शहद मिला? सबसे हैरानी की बात यह थी कि 3,000 साल से भी ज्यादा पुराना होने के बावजूद वह शहद बिल्कुल ठीक था और खाने लायक था।
आमतौर पर रसोई में रखी हर चीज़ कुछ दिनों, महीनों या सालों में खराब हो जाती है या सड़ने लगती है। लेकिन शहद के साथ ऐसा कभी नहीं होता। आखिर शुद्ध शहद कभी एक्सपायर क्यों नहीं होता? इसके पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि कुदरत का एक बेहतरीन केमिकल साइंस काम करता है। आइए इसे बहुत ही आसान और साधारण भाषा में समझते हैं।
शहद में पानी की मात्रा न के बराबर होती है, आमतौर पर यह केवल 17 से 18 प्रतिशत ही होती है। इसके अलावा, शहद में शर्करा यानी शुगर का घनत्व इतना ज्यादा होता है कि अगर कोई बैक्टीरिया इसमें प्रवेश भी कर जाए, तो शहद उसकी पूरी नमी को बाहर खींच लेता है। पानी की कमी के कारण बैक्टीरिया तुरंत खत्म हो जाते हैं और पनप नहीं पाते।
इतनी ज्यादा एसिडिक जगह पर किसी भी तरह के बैक्टीरिया या रोगाणु का जीवित रहना लगभग नामुमकिन होता है। यह अमलता किसी भी तरह के सड़न पैदा करने वाले तत्वों को शहद में अपनी जगह बनाने ही नहीं देती।
जब यह एंजाइम फूलों के रस के साथ मिलता है, तो यह दो चीज़ें बनाता है: ग्लूकोनिक एसिड और हाइड्रोजन पेरोक्साइड। हाइड्रोजन पेरोक्साइड वही केमिकल है जो घावों को साफ करने और इंफेक्शन रोकने के काम आता है। यह कुदरती एंटीसेप्टिक शहद में बैक्टीरिया को पूरी तरह पनपने से रोक देता है।
अगर शहद को कांच या किसी अच्छे जार में सील बंद करके रखा जाए और उसमें बाहर से पानी या सीलन न पहुंचे, तो यह अनिश्चित काल तक कभी खराब नहीं हो सकता। यह कुदरत का एक ऐसा अजूबा है जो हमें दिखाता है कि मधुमक्खियों की मेहनत और साइंस मिलकर क्या कमाल कर सकते हैं।
आमतौर पर रसोई में रखी हर चीज़ कुछ दिनों, महीनों या सालों में खराब हो जाती है या सड़ने लगती है। लेकिन शहद के साथ ऐसा कभी नहीं होता। आखिर शुद्ध शहद कभी एक्सपायर क्यों नहीं होता? इसके पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि कुदरत का एक बेहतरीन केमिकल साइंस काम करता है। आइए इसे बहुत ही आसान और साधारण भाषा में समझते हैं।
1. नमी यानी पानी की भारी कमी
किसी भी खाने की चीज़ को खराब करने के लिए बैक्टीरिया, फंगस और सूक्ष्मजीवों की जरूरत होती है। इन जीवाणुओं को पनपने और जीवित रहने के लिए पानी या नमी की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है।शहद में पानी की मात्रा न के बराबर होती है, आमतौर पर यह केवल 17 से 18 प्रतिशत ही होती है। इसके अलावा, शहद में शर्करा यानी शुगर का घनत्व इतना ज्यादा होता है कि अगर कोई बैक्टीरिया इसमें प्रवेश भी कर जाए, तो शहद उसकी पूरी नमी को बाहर खींच लेता है। पानी की कमी के कारण बैक्टीरिया तुरंत खत्म हो जाते हैं और पनप नहीं पाते।
2. शहद का अम्लीय यानी एसिडिक होना
शहद का स्वभाव काफी अम्लीय होता है। इसका पीएच लेवल लगभग 3 से 4.5 के बीच होता है।इतनी ज्यादा एसिडिक जगह पर किसी भी तरह के बैक्टीरिया या रोगाणु का जीवित रहना लगभग नामुमकिन होता है। यह अमलता किसी भी तरह के सड़न पैदा करने वाले तत्वों को शहद में अपनी जगह बनाने ही नहीं देती।
3. मधुमक्खियों का जादुई एंजाइम
जब मधुमक्खियां फूलों से मकरंद यानी नेक्टर इकट्ठा करती हैं, तो वे इसे अपने पेट में मौजूद एक खास एंजाइम के साथ मिलाती हैं। इस एंजाइम का नाम ग्लूकोज ऑक्सीडेज होता है।जब यह एंजाइम फूलों के रस के साथ मिलता है, तो यह दो चीज़ें बनाता है: ग्लूकोनिक एसिड और हाइड्रोजन पेरोक्साइड। हाइड्रोजन पेरोक्साइड वही केमिकल है जो घावों को साफ करने और इंफेक्शन रोकने के काम आता है। यह कुदरती एंटीसेप्टिक शहद में बैक्टीरिया को पूरी तरह पनपने से रोक देता है।
4. मधुमक्खियों की कड़ी मेहनत
फूलों के रस में पानी ज्यादा होता है। मधुमक्खियां जब अपने छत्ते में इस रस को लाती हैं, तो वे अपने पंखों को तेजी से फड़फड़ाकर उससे हवा बनाती हैं। हवा के इस बहाव से रस का ज्यादातर पानी उड़ जाता है और वह गाढ़ा होकर शहद बन जाता है।अगर शहद को कांच या किसी अच्छे जार में सील बंद करके रखा जाए और उसमें बाहर से पानी या सीलन न पहुंचे, तो यह अनिश्चित काल तक कभी खराब नहीं हो सकता। यह कुदरत का एक ऐसा अजूबा है जो हमें दिखाता है कि मधुमक्खियों की मेहनत और साइंस मिलकर क्या कमाल कर सकते हैं।
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