क्यों हमेशा जाने से ज्यादा छोटा लगता है वापसी का सफर? जानिए असली वजह
छुट्टियों पर जाते समय कार या बस की लंबी यात्रा कभी-कभी खत्म ही नहीं होती लगती, लेकिन वही रास्ता लौटते समय बहुत जल्दी कट जाता है। सड़क, ट्रैफ़िक और लाल बत्तियां वही होती हैं, लेकिन हमारा अहसास एकदम बदल जाता है। सफर के इस आम अनुभव को 'रिटर्न ट्रिप इफेक्ट' कहा जाता है। यह उस अहसास को दर्शाता है जहाँ वापसी की यात्रा जाने वाली यात्रा की तुलना में बहुत कम समय की लगती है, भले ही दोनों में एक जैसा ही समय क्यों न लगा हो।
जब हम बार-बार घड़ी देखते हैं और रास्ते पर ज्यादा ध्यान देते हैं, तो समय बहुत धीमा बीतता हुआ महसूस होता है।
इसके उलट, जब हम उसी रास्ते से वापस लौट रहे होते हैं, तो रास्ता जाना-पहचाना हो चुका होता है। दिमाग को रास्ते के मोड़ों की जानकारी पहले से होती है, इसलिए वह ज्यादा ध्यान नहीं लगाता और सफर आसान महसूस होता है।
रिसर्च बताती है कि जाने वाले सफर की थकान ही वापसी के सफर को छोटा महसूस कराती है। जाते समय जब ज्यादा समय लगता है, तो उसकी तुलना में वापसी का रास्ता बहुत छोटा महसूस होने लगता है, भले ही घड़ी में दोनों का समय एक समान ही हो।
इसके अलावा, हमारी मंजिल भी मायने रखती है। किसी ट्रिप या रिश्तेदार के घर से अपने घर वापस लौटते समय, हमें घर के आराम की चाहत होती है। यह खुशी भी रास्ते के अहसास को बदल देती है।

अनजान रास्ते पर दिमाग ज्यादा ध्यान देता है
जब हम पहली बार किसी नई जगह जा रहे होते हैं, तो हमारा दिमाग आसपास की हर चीज़ को बहुत ध्यान से देखता है। हम रास्ते के बोर्ड पढ़ते हैं, नए मोड़ देखते हैं, अजनबी इमारतों पर नज़र रखते हैं और बार-बार सोचते हैं कि मंजिल अभी और कितनी दूर है।जब हम बार-बार घड़ी देखते हैं और रास्ते पर ज्यादा ध्यान देते हैं, तो समय बहुत धीमा बीतता हुआ महसूस होता है।
इसके उलट, जब हम उसी रास्ते से वापस लौट रहे होते हैं, तो रास्ता जाना-पहचाना हो चुका होता है। दिमाग को रास्ते के मोड़ों की जानकारी पहले से होती है, इसलिए वह ज्यादा ध्यान नहीं लगाता और सफर आसान महसूस होता है।
हमारी उम्मीदें समय के अहसास को बदल देती हैं
हमारी उम्मीदें भी इस बात को तय करती हैं कि हमें सफर कैसा लगेगा। अगर जाते समय का रास्ता उम्मीद से ज्यादा लंबा और थकाऊ लगता है, तो हम सोच लेते हैं कि वापसी भी उतनी ही मुश्किल होगी। लेकिन लौटते समय रास्ता पहले से जाना-पहचाना होता है, इसलिए सफर उम्मीद से ज्यादा आसान लगने लगता है।रिसर्च बताती है कि जाने वाले सफर की थकान ही वापसी के सफर को छोटा महसूस कराती है। जाते समय जब ज्यादा समय लगता है, तो उसकी तुलना में वापसी का रास्ता बहुत छोटा महसूस होने लगता है, भले ही घड़ी में दोनों का समय एक समान ही हो।
जाने-पहचाने रास्ते से खत्म होता है तनाव
जाने-पहचाने रास्ते पर दिमाग को नई जानकारी ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती। किसी नई जगह जाते समय हम इस बात से चिंतित रहते हैं कि कहीं गलत रास्ते पर न चले जाएँ। लेकिन लौटते समय वही जाने-पहचाने बोर्ड और मोड़ हमें तसल्ली देते हैं कि हम सही दिशा में जा रहे हैं।इसके अलावा, हमारी मंजिल भी मायने रखती है। किसी ट्रिप या रिश्तेदार के घर से अपने घर वापस लौटते समय, हमें घर के आराम की चाहत होती है। यह खुशी भी रास्ते के अहसास को बदल देती है।
क्या वापसी का सफर सच में छोटा होता है?
ज़रूरी नहीं। कई बार वापसी का रास्ता कम ट्रैफ़िक या कम रुकावटों की वजह से सच में थोड़ा छोटा हो सकता है। लेकिन जब आने-जाने में बिल्कुल बराबर समय लगा हो, तब भी वापसी का सफर छोटा लगना सिर्फ दिमाग का अहसास होता है।Next Story