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गोवर्धन महाराज की आरती: मन को सुकून देने वाला भक्ति रस

गोवर्धन महाराज को गिरिराज के रूप में पूजा जाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण की लीला से जुड़े हैं। उनकी आरती गाने से मन को सुकून मिलता है और भक्ति की गहराई बढ़ती है। यह भजन सरल शब्दों में महाराज के सौंदर्य और कृपा का गुणगान करता है। । यह आरती विशेष रूप से गोवर्धन पूजा के अवसर पर भावपूर्ण लगती है।
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गोवर्धन महाराज की महिमा


गोवर्धन महाराज भक्तों के आश्रय हैं। उनकी आरती में वर्णन है कि कैसे वे भक्तों का बेड़ा पार लगाते हैं। गिरिराज धरण प्रभु के रूप में वे सभी संकटों से रक्षा करते हैं। यह भजन हमें याद दिलाता है कि सच्ची श्रद्धा से हर कठिनाई दूर हो जाती है। आरती गाते समय मन में कृष्ण भक्ति का भाव जागृत होता है।

आरती के छंद: भाव और अर्थ


आरती के हर छंद में गोवर्धन महाराज के अलौकिक रूप का चित्रण है। पहले छंद में उनके माथे पर मुकुट की बात है, साथ ही पान, फूल और दूध की धार चढ़ाने का वर्णन। दूसरे में सात कोस की परिक्रमा और चकलेश्वर विश्राम का जिक्र। तीसरे में गले का कण्ठा और ठोड़ी पर लाल हीरा। चौथे में कान के कुण्डल की चमक और विशाल झांकी। अंतिम छंद में भक्तों की शरणागति। ये छंद भक्ति रस से ओतप्रोत हैं।


श्री गोवर्धन महाराज की आरती - पूर्ण छंद


नीचे गोवर्धन महाराज की आरती के सभी छंद दिए गए हैं। इन्हें धीरे-धीरे गाएं और भाव से निभाएं:

गोवर्धन महाराज की आरती


श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े,
तोपे चढ़े दूध की धार।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

तेरी सात कोस की परिकम्मा,
और चकलेश्वर विश्राम
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

तेरे गले में कण्ठा साज रहेओ,
ठोड़ी पे हीरा लाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।


तेरे कानन कुण्डल चमक रहेओ,
तेरी झांकी बनी विशाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण।
करो भक्त का बेड़ा पार
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

गोवर्धन महाराज की जय... भगवान कृष्ण की जय... मानसी गंगा की जय... राधा कुंड की जय... कृष्ण कुंड की जय...

आरती गाने के लाभ


इस आरती को रोज गाने से मन शांत रहता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। गोवर्धन पूजा के दिन इसे अवश्य गाएं। आरती के बाद तुलसीजी की आरती करना शुभ माना जाता है। इससे घर में सकारात्मकता आती है और भगवान की कृपा बनी रहती है।