Lohri 2026: इस बार की लोहड़ी है बेहद खास, बस एक चुटकी तिल और गुड़ से घर आएगी सुख-समृद्धि
साल 2026 में लोहड़ी 13 जनवरी, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह पर्व मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। शाम के समय जब सूरज ढल जाता है, तब अलाव (बोनफायर) जलाकर इस त्योहार का जश्न शुरू होता है। लोग आग के चारों ओर इकट्ठा होते हैं, गीत गाते हैं और एक-दूसरे को बधाई देते हैं।
इस अग्नि में तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली अर्पित की जाती है। ऐसा माना जाता है कि अग्नि में ये चीजें अर्पित करके हम देवताओं और पितरों का आह्वान करते हैं और उनसे सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुए लोग "आदर आए, दलिदर जाए" (सम्मान आए और दरिद्रता दूर हो) का मंत्र बोलते हैं। यह केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि जीवन से नकारात्मकता को दूर करने और सकारात्मकता को अपनाने का संकल्प है।
उस समय लड़कियों को गुलामी के लिए अमीर लोगों को बेचने की कुप्रथा चल रही थी। दुल्ला भट्टी ने न केवल उन लड़कियों को छुड़ाया, बल्कि उनकी शादी करवाकर उन्हें सम्मानजनक जीवन भी दिया। उन्होंने सुंदर और मुंदरी नाम की दो गरीब लड़कियों की शादी करवाई और शगुन के तौर पर उनकी झोली में शक्कर (गुड़) डाली। तभी से लोहड़ी के गीतों में "सुंदर मुंदरीए हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो" गाकर उन्हें याद किया जाता है। यह कहानी हमें समाज सेवा और नारी सम्मान की प्रेरणा देती है।
लोहड़ी केवल आग जलाने और नाचने-गाने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह आपसी भाईचारे, प्रेम और एकता का प्रतीक है। यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और प्रकृति का सम्मान करना सिखाता है। आग की लपटों के साथ, यह त्योहार हमारे जीवन से अंधकार को मिटाकर प्रकाश और उम्मीद की नई किरण लेकर आता है।
किसानों के लिए खास महत्व
लोहड़ी का संबंध सीधा प्रकृति और कृषि से है। यह समय रबी की फसलों के पकने का होता है। किसान अपनी मेहनत को लहलहाते खेतों के रूप में देखकर खुश होते हैं और इस खुशी को लोहड़ी के रूप में मनाते हैं। वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी फसल अच्छी हो और घर में समृद्धि आए। इसे गन्ने की कटाई का भी समय माना जाता है, इसलिए लोहड़ी के प्रसाद में गुड़ का विशेष महत्व होता है। यह त्योहार किसानों के लिए नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत जैसा भी माना जाता है।अग्नि पूजा और प्रसाद का महत्व
लोहड़ी की शाम को लकड़ियों का एक बड़ा ढेर लगाकर उसमें आग जलाई जाती है। यह पवित्र अग्नि सूर्य देव का प्रतीक मानी जाती है, जो पृथ्वी को ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। कड़ाके की ठंड में यह आग न केवल गर्मी देती है, बल्कि समुदाय को एक साथ लाने का काम भी करती है।इस अग्नि में तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली अर्पित की जाती है। ऐसा माना जाता है कि अग्नि में ये चीजें अर्पित करके हम देवताओं और पितरों का आह्वान करते हैं और उनसे सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुए लोग "आदर आए, दलिदर जाए" (सम्मान आए और दरिद्रता दूर हो) का मंत्र बोलते हैं। यह केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि जीवन से नकारात्मकता को दूर करने और सकारात्मकता को अपनाने का संकल्प है।
दुल्ला भट्टी की कहानी
लोहड़ी का जिक्र हो और दुल्ला भट्टी का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। लोहड़ी के लोकगीतों में अक्सर दुल्ला भट्टी को याद किया जाता है। एक प्रचलित कथा के अनुसार, मुगल काल में दुल्ला भट्टी नाम का एक शख्स था, जो अमीरों को लूटता था और गरीबों की मदद करता था।उस समय लड़कियों को गुलामी के लिए अमीर लोगों को बेचने की कुप्रथा चल रही थी। दुल्ला भट्टी ने न केवल उन लड़कियों को छुड़ाया, बल्कि उनकी शादी करवाकर उन्हें सम्मानजनक जीवन भी दिया। उन्होंने सुंदर और मुंदरी नाम की दो गरीब लड़कियों की शादी करवाई और शगुन के तौर पर उनकी झोली में शक्कर (गुड़) डाली। तभी से लोहड़ी के गीतों में "सुंदर मुंदरीए हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो" गाकर उन्हें याद किया जाता है। यह कहानी हमें समाज सेवा और नारी सम्मान की प्रेरणा देती है।
जश्न का तरीका: भांगड़ा और गिद्दा
लोहड़ी का असली रंग शाम को देखने को मिलता है। ढोल की थाप पर लोग भांगड़ा और गिद्दा करते हैं। पंजाब में तो इसका उत्साह देखते ही बनता है। रंग-बिरंगे कपड़े पहने पुरुष और महिलाएं लोकगीत गाते हैं और नाचते हैं। घर के बच्चे घर-घर जाकर लोहड़ी मांगते हैं, जिसमें उन्हें पैसे, गुड़, तिल और रेवड़ी दी जाती है।नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशुओं के लिए पहली लोहड़ी
जिन घरों में हाल ही में शादी हुई हो या बच्चे का जन्म हुआ हो, उनके लिए लोहड़ी का महत्व और भी बढ़ जाता है। नवविवाहित जोड़े अग्नि के फेरे लेते हैं और बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। नई दुल्हन को शगुन के तौर पर कपड़े और गहने दिए जाते हैं। इसी तरह, नवजात शिशु को भी अग्नि की गर्मी दिखाई जाती है ताकि वह स्वस्थ और तंदुरुस्त रहे। परिवार और रिश्तेदार मिलकर जश्न मनाते हैं और खुशियां बांटते हैं।लोहड़ी केवल आग जलाने और नाचने-गाने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह आपसी भाईचारे, प्रेम और एकता का प्रतीक है। यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और प्रकृति का सम्मान करना सिखाता है। आग की लपटों के साथ, यह त्योहार हमारे जीवन से अंधकार को मिटाकर प्रकाश और उम्मीद की नई किरण लेकर आता है।
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