Somnath Amrit Mahotsav: आखिर क्यों खास है कुंभाभिषेक? 75 साल के इतिहास में पहली बार हुई यह पूजा, पीएम मोदी भी हुए शामिल

11 मई की तारीख इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज है क्योंकि इसी दिन भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ था। आज इस गौरवशाली घटना के 75 साल पूरे हो गए हैं। इस खास अवसर को ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ के रूप में मनाया जा रहा है। इस उत्सव की रौनक बढ़ाने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमनाथ पहुंचे हैं। पीएम मोदी ने मंदिर में विशेष महापूजा की, ध्वजारोहण किया और कई धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लिया। इस बार की सबसे बड़ी खास बात यह रही कि मंदिर में पहली बार 11 पवित्र तीर्थस्थलों के जल से विशेष 'कुंभाभिषेक' किया गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर यह कुंभाभिषेक होता क्या है और इसकी इतनी चर्चा क्यों हो रही है? आइए आपको आसान भाषा में इसके बारे में बताते हैं।
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क्या है कुंभाभिषेक?

कुंभाभिषेक शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला है 'कुंभ' जिसका मतलब होता है कलश या पवित्र पात्र और दूसरा है 'अभिषेक' यानी पवित्र स्नान। जब विशेष वैदिक मंत्रों के जरिए पवित्र किए गए जल को मंदिर के ऊंचे शिखर, कलश और मूर्तियों पर चढ़ाया जाता है, तो उसे कुंभाभिषेक कहते हैं। आमतौर पर दक्षिण भारत के बड़े मंदिरों में हर 10 से 12 साल में यह अनुष्ठान होता है, लेकिन सोमनाथ मंदिर के 75 साल के आधुनिक इतिहास में यह पहली बार हुआ है।


आध्यात्मिक ऊर्जा को जगाने का तरीका

कुंभाभिषेक कोई साधारण पूजा नहीं है। यह किसी भी मंदिर की पवित्रता और वहां की आध्यात्मिक ऊर्जा को फिर से जगाने का एक माध्यम है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब कोई नया मंदिर बनता है, तब मूर्तियों में देवत्व स्थापित करने के लिए 'नूतन कुंभाभिषेकम' किया जाता है। इसके बाद समय-समय पर उस दिव्य ऊर्जा को बनाए रखने के लिए फिर से यह अभिषेक किया जाता है। सोमनाथ में 75 साल पूरे होने पर यह भव्य आयोजन किया गया ताकि मंदिर की दिव्यता और बढ़े।


11 तीर्थों के जल से हुआ अभिषेक

सोमनाथ मंदिर के ऊंचे शिखर पर देश के 11 प्रमुख तीर्थ स्थलों से लाए गए जल से अभिषेक किया गया। माना जाता है कि जब मंदिर के सबसे ऊपरी शिखर पर जल अर्पित किया जाता है, तो ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा मंदिर के गर्भगृह में मौजूद शिवलिंग में समाहित हो जाती है।

कैसे संपन्न होता है यह अनुष्ठान?

कुंभाभिषेक की प्रक्रिया काफी लंबी और कठिन होती है। सबसे पहले मंदिर परिसर में एक बड़ी यज्ञशाला बनाई जाती है। वहां कई हवन कुंड तैयार किए जाते हैं और पवित्र नदियों के जल से भरे कलशों को स्थापित किया जाता है। विद्वान पंडित कई दिनों तक लगातार वैदिक मंत्रों का पाठ करते हैं जिससे मंत्रों की शक्ति कलश के जल में उतर जाती है।


अभिषेक वाले दिन इन पवित्र कलशों को सिर पर रखकर एक बड़ी शोभायात्रा निकाली जाती है। फिर शंख की ध्वनि और मंत्रों के बीच इस जल को मंदिर के ऊंचे शिखर तक ले जाया जाता है। जैसे ही शिखर पर यह जल चढ़ाया जाता है, भक्तों की जयकार से पूरा परिसर गूंज उठता है। अंत में इसी पवित्र जल से गर्भगृह में मुख्य मूर्तियों का भी अभिषेक किया जाता है।