अंधेरा हटे, ज्ञान मिले: सूर्य देव से मांगे तत्त्वज्ञान, पढ़ें करुणाकर आरती

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सनातन परंपरा में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है, जो हर दिन हमें ऊर्जा और प्रकाश देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, सुबह जल्दी उठकर सूर्य देव को अर्घ्य देना और उनकी स्तुति करना केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक शक्तिशाली तरीका है। जो व्यक्ति निष्ठा और लगन से सूर्य देव की उपासना करता है, उसके जीवन में अंधकार नहीं टिकता। यह नियमित साधना व्यक्ति के मन को शांत करती है, उसके आत्मविश्वास में वृद्धि करती है, और उसे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की ओर ले जाती है।
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सूर्य उपासना के लाभ और महत्व


1. आत्मविश्वास और सकारात्मकता में वृद्धि
सूर्य ऊर्जा और तेज का प्रतीक हैं। जब कोई व्यक्ति प्रतिदिन सूर्योदय के समय उनकी उपासना करता है, तो उसके मन में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है। यह नियमित अभ्यास व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाता है, जिससे वह चुनौतियों का सामना अधिक साहस और दृढ़ता से कर पाता है। यह अराधना जीवन में हमेशा एक सकारात्मक माहौल बनाए रखती है।

2. सुख-संपत्ति और भौतिक सफलता
सूर्य देव की कृपा से व्यक्ति के जीवन में केवल आत्मिक शांति ही नहीं, बल्कि भौतिक सुख-संपत्ति भी आती है। माना जाता है कि उनकी उपासना से व्यक्ति का भाग्य चमकता है, जिससे उसे अपने नौकरी और कारोबार में सफलता मिलती है। नियमित पूजा-पाठ से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।


3. पूजा का आवश्यक अंग: सूर्यदेव की आरती
सूर्य देव की आराधना को पूर्ण और फलदायी बनाने के लिए, उपासना के बाद उनकी आरती करना बहुत महत्वपूर्ण है। आरती के माध्यम से भक्त अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और देवता से सुख-शांति का आशीर्वाद मांगते हैं।

सूर्यदेव की आरती


जय कश्यप-नन्दन, ओम जय अदिति-नन्दन ।
त्रिभुवनतिमिरनिकन्दन भक्तहृदय चन्दन ।। टेक ।।

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सप्तअश्वरथ राजित एक चक्रधारी ।
दुःखहारी सुखकारी, मानस मलहारी ।।
ओम जय कश्यप-नन्दन।।
ओम जय अदिति-नन्दन

सुरमुनिभूसुरवन्दित विमल विभवशाली ।
अघदलदलन दिवाकर दिव्य किरणमाली ।।
ओम जय कश्यप-नन्दन।।

सकलसुकर्मप्रसविता सविता शुभकारी ।
विश्वविलोचन मोचन भवबन्धनभारी ।।
ओम जय कश्यप-नन्दन।
ओम जय अदिति-नन्दन।

कमलसमूहविनाशक नाशक रूम तापा ।
सेवत सहज हरत अति मनसिज सन्तापा ।।
ओम जय कश्यप-नन्दन।
ओम जय अदिति-नन्दन।


नेत्र व्याधिहर सुरवर भू-पीड़ाहारी ।
वृष्टिविमोचन सन्तत परहित व्रतधारी ।।
ओम जय कश्यप-नन्दन।
ओम जय अदिति-नन्दन।

सूर्यदेव करुणाकर अब करुणा कीजै ।
हर अज्ञानमोह सब तत्त्वज्ञान दीजै ।।
ओम जय कश्यप-नन्दन।
ओम जय अदिति-नन्दन।


























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