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On This Day in 1992: जब पर्थ की उछाल भरी पिच पर 18 साल के सचिन ने जड़ा था ऐतिहासिक शतक

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क्रिकेट की दुनिया में पर्थ का वाका मैदान अपनी तेज रफ्तार और खतरनाक उछाल के लिए जाना जाता रहा है। साल 1992 में जब भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर थी, तब श्रृंखला का अंतिम मैच इसी मैदान पर खेला गया। इस मैच ने क्रिकेट के इतिहास में कई बड़े रिकॉर्ड दर्ज किए। ऑस्ट्रेलिया की टीम उस समय बेहद मजबूत थी और पिच की परिस्थितियों ने उनके गेंदबाजों को और भी खतरनाक बना दिया था। इस मैच में गेंद इतनी उछल रही थी कि बल्लेबाजों के लिए उसे संभालना एक बड़ी चुनौती बन गया था।

डेविड बून का बेहतरीन प्रदर्शन

मैच की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज बल्लेबाज डेविड बून ने अपनी क्लास दिखाई। उन्होंने पिच की उछाल को बखूबी समझते हुए एक शानदार शतक जड़ा। उनकी इस पारी ने ऑस्ट्रेलिया को एक मजबूत स्थिति में खड़ा कर दिया। बून की बल्लेबाजी की खासियत यह थी कि उन्होंने बेहद संयम के साथ भारतीय गेंदबाजों का सामना किया और खराब गेंदों को बाउंड्री के बाहर भेजने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी इस पारी ने मैच की दिशा तय कर दी थी।

युवा सचिन तेंदुलकर का जलवा

जब भारतीय टीम बल्लेबाजी करने उतरी, तो पूरी दुनिया की नजरें 18 साल के एक युवा खिलाड़ी पर टिकी थीं। वह नाम था सचिन तेंदुलकर। पर्थ की उस तेज पिच पर जहाँ अनुभवी बल्लेबाज संघर्ष कर रहे थे, वहाँ सचिन ने अद्भुत तकनीक और साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपनी पारी में कई शानदार शॉट्स लगाए और एक यादगार शतक पूरा किया। तेंदुलकर का यह शतक आज भी उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक गिना जाता है, क्योंकि उन्होंने दुनिया के सबसे तेज गेंदबाजों के सामने निडर होकर रन बनाए थे।

विकेटों का अनोखा रिकॉर्ड

इस मैच में एक बहुत ही दिलचस्प और दुर्लभ रिकॉर्ड बना। पर्थ की पिच पर मौजूद एक्स्ट्रा बाउंस की वजह से इस मुकाबले में गिरने वाले 36 विकेटों में से 33 विकेट कैच आउट होकर गिरे। यह अपने आप में एक टेस्ट रिकॉर्ड बन गया। गेंद बल्ले का किनारा लेकर बार-बार स्लिप या कीपर के हाथों में जा रही थी। फील्डरों के लिए भी यह मैच काफी व्यस्त रहा, क्योंकि लगभग हर विकेट के पीछे एक कैच की कहानी जुड़ी हुई थी।

भारतीय टीम का अचानक पतन

मैच के आखिरी दिन भारत को जीत या ड्रा के लिए संघर्ष करना था। एक समय भारतीय टीम की शुरुआत काफी अच्छी रही थी और स्कोर बिना किसी नुकसान के 82 रन था। ऐसा लग रहा था कि टीम इंडिया इस मैच में कड़ी टक्कर देगी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने सबको हैरान कर दिया। महज 59 रनों के भीतर भारत ने अपने सभी 10 विकेट गंवा दिए। भारतीय पारी ताश के पत्तों की तरह ढह गई और पूरी टीम 141 रनों पर सिमट गई।

माइक व्हिटनी की घातक गेंदबाजी

भारत की इस दूसरी पारी को ध्वस्त करने में ऑस्ट्रेलिया के गेंदबाज माइक व्हिटनी ने मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी सटीक लाइन और लेंथ से भारतीय बल्लेबाजों को बेबस कर दिया। व्हिटनी ने सिर्फ 27 रन देकर 7 विकेट हासिल किए। उनकी इस घातक गेंदबाजी के सामने भारतीय टीम के पास कोई जवाब नहीं था। इस शानदार प्रदर्शन की बदौलत ऑस्ट्रेलिया ने यह मैच 300 रनों के भारी अंतर से जीत लिया।

श्रृंखला का परिणाम

पर्थ में मिली इस हार के साथ ही भारत ने यह टेस्ट श्रृंखला 4-0 से गंवा दी। हालांकि टीम इंडिया के लिए यह दौरा काफी कठिन रहा, लेकिन सचिन तेंदुलकर की उस पारी ने भारतीय क्रिकेट के भविष्य की एक सुनहरी झलक दिखा दी थी। ऑस्ट्रेलिया ने अपनी सरजमीं पर दबदबा कायम रखा और साबित किया कि क्यों उन्हें उनकी पिचों पर हराना दुनिया की किसी भी टीम के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। पर्थ का वह मैदान आज भी उन ऐतिहासिक पलों का गवाह बना हुआ है।







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