तकनीक की दुनिया अब सिर्फ कमांड समझने तक सीमित नहीं रह गई है। अब ऐसी AI टेक्नोलॉजी विकसित की जा रही है जो इंसानों की भावनाओं को समझने की कोशिश कर रही है। इसे इमोशनल AI या अफेक्टिव कंप्यूटिंग कहा जाता है। कई कंपनियां ऐसे सिस्टम पर काम कर रही हैं जो आवाज, बोलने के तरीके और चेहरे के हावभाव के आधार पर यह पहचान सकें कि कोई व्यक्ति तनाव में है, खुश है या थका हुआ महसूस कर रहा है। कैसे काम करती है यह तकनीक जब कोई व्यक्ति बात करता है तो उसकी आवाज की गति, उतार चढ़ाव और टोन लगातार बदलती रहती है। AI सिस्टम इन्हीं पैटर्न्स का विश्लेषण करता है। उदाहरण के लिए अगर किसी की आवाज सामान्य से धीमी हो या उसमें तनाव महसूस हो रहा हो, तो सिस्टम यह संकेत पकड़ सकता है। कुछ स्मार्ट डिवाइस अब वीडियो कॉल के दौरान चेहरे के एक्सप्रेशन भी पढ़ने लगे हैं। इससे डिजिटल असिस्टेंट ज्यादा मानवीय प्रतिक्रिया देने की कोशिश करते हैं। मानसिक स्वास्थ्य में हो सकता है बड़ा इस्तेमाल विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में उपयोगी साबित हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से उदास या तनावग्रस्त आवाज में बात कर रहा हो, तो सिस्टम शुरुआती संकेत पहचान सकता है। हालांकि डॉक्टर साफ कहते हैं कि AI कभी इंसानी समझ और पेशेवर इलाज की जगह नहीं ले सकता। इसे केवल एक सहायक उपकरण के रूप में देखा जा रहा है। ग्राहक सेवा में तेजी से बढ़ रहा उपयोग कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां कॉल सेंटर में इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर चुकी हैं। अगर ग्राहक गुस्से में बात कर रहा हो तो सिस्टम एजेंट को पहले से अलर्ट कर सकता है। इससे बातचीत को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिलती है। कुछ कार कंपनियां भी ऐसी तकनीक पर काम कर रही हैं जो ड्राइवर की थकान पहचान सके। अगर सिस्टम को लगे कि ड्राइवर नींद में है, तो वह चेतावनी दे सकता है। गोपनीयता सबसे बड़ा सवाल इमोशनल AI को लेकर सबसे बड़ी बहस डेटा प्राइवेसी पर हो रही है। कई लोगों को चिंता है कि अगर मशीनें भावनाएं पढ़ने लगेंगी तो व्यक्तिगत जानकारी का दायरा और बढ़ जाएगा। यूरोप समेत कई देशों में इस टेक्नोलॉजी के लिए नियम बनाने पर चर्चा शुरू हो चुकी है। फिर भी यह तय माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में डिजिटल डिवाइस सिर्फ हमारी बात नहीं सुनेंगे, बल्कि हमारी भावनाओं को समझने की भी कोशिश करेंगे।