फ्रांस ने जिस टेक्नोलॉजी को देने से किया था इनकार, DRDO ने भारत में ही बनाया, जानिए राफेल से जुड़ी ये सीक्रेट स्टोरी
पेरिस/बीजिंग: भारत ने आखिरकार स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड (GaN) सेमीकंडक्टर डेवलप कर लिया है जिसे देने से फ्रांस ने इनकार कर दिया था। इसका इस्तेमाल रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में किया जाता है। हालांकि भारत ने इस टेर्मोलॉजी को खुद बना लिया है लेकिन इसे बनाने के लिए जिन कंपोनेट्स की जरूरत होगी उसे अभी भी विदेशों से खरीदना होगा। रिपोर्ट के मुताबिक DRDO दिल्ली स्थित सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी (SSPL) और हैदराबाद स्थित गैलियम आर्सेनाइड टेक्नोलॉजी इनेबलिंग सेंटर (GAETEC) ने मिलकर इस टेक्नोलॉजी को डेवलप किया है।

GaN टेक्नोलॉजी को डेवलप करना कितनी बड़ी उपलब्धि है?
फ्रांस ने GaN तकनीक देने से कर दिया था इनकार
GaN तकनीक से भारत की सैन्य ताकत कितनी बढ़ेगी
GaN तकनीक तो बनाया लेकिन 3 चुनौतियां अभी भी हैंभारत से पहले अमेरिका, चीन, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और रूस के पास ही ये तकनीक थी। लेकिन इसका मतलह ये नहीं है कि भारत के पास इन देशों की तरफ पूरी रडार बनाने की क्षमता आ गई है। भारत के सामने 3 बड़ी चुनौतिया हैं। जैसे-
1. बड़े पैमाने पर स्वदेशी उत्पादन की क्षमता विकसित करना।
2. इन चिप्स को तेजस, AMCA, युद्धपोतों और एयर डिफेंस सिस्टम के रडार में इंटीग्रेशन
3. विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करते हुए पूरी सप्लाई चेन तैयार करना।
GaN-आधारित चिप्स बनाना कोई आसान बात नहीं है। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बात करते हुए भारतीय वायुसेना के पूर्व पायलट विजयेन्द्र के ठाकुर जो मिलिट्री आर्किटेक्ट भी हैं उन्होंने कहा कि डीआरडीओ ने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इसे बनाने के लिए बहुत ज्यादा सटीक कंट्रोल की जरूरत होती है और फ्रांस ने इसीलिए इसे देने से इनकार कर दिया था।
उन्होंने समझाते हुए कहा कि मान लीजिए भारत का कोई लड़ाकू विमान किसी दुश्मन के लड़ाकू विमान को 150 या 200 किलोमीटर की दूरी से पहचानने की कोशिश कर रहा है तो इसके लिए आपके पास एक अच्छा रडार होना ही जरूरी नहीं है। बल्कि रडार के अंदर लगे हजारों इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट उसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। GaN आधारित MMIC इन्हीं महत्वपूर्ण कंपोनेंट में से एक है। हालांकि 'द वीक' की रिपोर्ट के मुताबिक भारत अभी भी बहुत उच्च शुद्धता वाली गैसों (99.99999% तक) और विशेष रिएक्टरों का आयात करता है जिनकी कीमत सैकड़ों करोड़ रुपये तक हो सकती है।
GaN टेक्नोलॉजी को डेवलप करना कितनी बड़ी उपलब्धि है?
- GaN टेक्नोलॉजी बनाने का मतलब है कि भारत ने अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर बनाने की क्षमता हासिल कर ली है।
- इसका इस्तेमाल रडार, मिसाइलों के सीकर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और हाई-पावर मिलिट्री कम्युनिकेश के निर्माण में होता है।
- GaN का पूरा नाम है Gallium Nitride यानि गैलियम नाइट्राइड होता है।
- यह ज्यादा ताकतवर रडार सिग्नल पैदा करता है और रडार की क्षमता को बढ़ाता है।
- आधुनिक एडवांस AESA रडार में GaN तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।
फ्रांस ने GaN तकनीक देने से कर दिया था इनकार
- इसका मतलब ये है कि भारत के पास अब GaN-आधारित 'हाई इलेक्ट्रॉन मोबिलिटी ट्रांजिस्टर' (HEMTs) और 'मोनोलिथिक माइक्रोवेव इंटीग्रेटेड सर्किट' (MMICs) बनाने की स्वदेशी क्षमता आ गई है। ये वही टेक्नोलॉजी है जिसे 2016 में फ्रांस ने भारत को देने से इनकार कर दिया था।
- द वीक की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में जब भारत ने फ्रांस से राफेल लड़ाकू समझौता किया था उस वक्त GaN तकनीक भी मांगी थी लेकिन फ्रांस ने ये टेक्नोलॉजी देने से मना कर दिया था।
- फ्रांस ने GaN तकनीक को संवेदनशील बताया था जबकि भारत ने 50 प्रतिशत ऑफसेट डील के हिस्से के रूप में ये तकनीक मांगी थी।
- नवंबर 2024 में रक्षा मंत्रालय ने बताया था कि SSPL ने 4-इंच सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) वेफर और 150 वॉट तक के GaN HEMT बनाने की स्वदेशी क्षमता विकसित कर ली है। उन्होंने 40 वॉट तक की क्षमता वाले GaN-आधारित MMIC भी विकसित किए हैं।
GaN तकनीक से भारत की सैन्य ताकत कितनी बढ़ेगी
- GaN आधारित MMIC से ज्यादा शक्तिशाली और क्षमता वाला AESA रडार डेवलप करने में मदद मिलेगी। इससे भविष्य में दुश्मन के विमानों और दूसरे लक्ष्यों का पता लगाने की क्षमता बेहतर हो सकती है।
- मिसाइलों के RF सीकर और गाइडेंस सिस्टम में हाई-फ्रीक्वेंसी इलेक्ट्रॉनिक्स का इस्तेमाल होता है। स्वदेशी MMIC इन सिस्टम्स के विकास में मदद कर सकती है।
- दुश्मन के रडार को जाम करना, उसके कम्युनिकेशन सिग्नल को जाम करने में और इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम में अपनी क्षमता बढ़ाने में इस तकनीक से मदद मिलेगी।
- सैटेलाइट और कम्युनिकेश में भी इसका इस्तेमाल होता है। इसके अलावा भारत कई UAV प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है और इनमें भी इसका इस्तेमाल होगा।
GaN तकनीक तो बनाया लेकिन 3 चुनौतियां अभी भी हैंभारत से पहले अमेरिका, चीन, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और रूस के पास ही ये तकनीक थी। लेकिन इसका मतलह ये नहीं है कि भारत के पास इन देशों की तरफ पूरी रडार बनाने की क्षमता आ गई है। भारत के सामने 3 बड़ी चुनौतिया हैं। जैसे-
1. बड़े पैमाने पर स्वदेशी उत्पादन की क्षमता विकसित करना।
2. इन चिप्स को तेजस, AMCA, युद्धपोतों और एयर डिफेंस सिस्टम के रडार में इंटीग्रेशन
3. विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करते हुए पूरी सप्लाई चेन तैयार करना।
GaN-आधारित चिप्स बनाना कोई आसान बात नहीं है। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बात करते हुए भारतीय वायुसेना के पूर्व पायलट विजयेन्द्र के ठाकुर जो मिलिट्री आर्किटेक्ट भी हैं उन्होंने कहा कि डीआरडीओ ने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इसे बनाने के लिए बहुत ज्यादा सटीक कंट्रोल की जरूरत होती है और फ्रांस ने इसीलिए इसे देने से इनकार कर दिया था।
उन्होंने समझाते हुए कहा कि मान लीजिए भारत का कोई लड़ाकू विमान किसी दुश्मन के लड़ाकू विमान को 150 या 200 किलोमीटर की दूरी से पहचानने की कोशिश कर रहा है तो इसके लिए आपके पास एक अच्छा रडार होना ही जरूरी नहीं है। बल्कि रडार के अंदर लगे हजारों इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट उसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। GaN आधारित MMIC इन्हीं महत्वपूर्ण कंपोनेंट में से एक है। हालांकि 'द वीक' की रिपोर्ट के मुताबिक भारत अभी भी बहुत उच्च शुद्धता वाली गैसों (99.99999% तक) और विशेष रिएक्टरों का आयात करता है जिनकी कीमत सैकड़ों करोड़ रुपये तक हो सकती है।
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