15,000 पौधे, 25 डिग्री तापमान और शून्य बिजली बिल - जानें दिल्ली के सैनिक फार्म्स के ग्रीन वंडर के बारे में

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दिल्ली की प्रदूषित हवा में सांस लेना मुश्किल हो गया है, जहां AQI 400 पार कर जाता है। लेकिन दक्षिण दिल्ली के सैनिक फार्म्स में एक ऐसा घर है, जो जहरीले वातावरण के बीच हरा-भरा बाग बन गया है। पीटर सिंह और नीनो कौर ने 1998 में नीनो के ब्लड कैंसर के इलाज के लिए यह जीवनशैली अपनाई। आज 27 साल बाद वे स्वस्थ हैं और अपना घर एक मॉडल बना चुके हैं। यहां सिर्फ एक खिड़की है, लेकिन हवा हमेशा शुद्ध रहती है। यह घर पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्रतीक बन गया है।
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500 गज में हरे-भरे पौधों का साम्राज्य


पीटर सिंह ने बताया कि उनका पूरा आवास 500 गज क्षेत्र में फैला है। आंगन से लेकर छत तक हर जगह 15,000 पौधे लगाए गए हैं। ये पौधे रात-दिन ऑक्सीजन पैदा करते हैं, जिससे घर के अंदर हवा हमेशा ताजी बनी रहती है। बाहर की गर्मी 45 डिग्री तक पहुंच जाए, तब भी अंदर 25 डिग्री का तापमान बना रहता है। AQI मापने वाले मीटर से पता चलता है कि यहां की हवा 10-15 के बीच रहती है। पीटर सिंह ने कहा, "उन्होंने बताया कि उनका पूरा घर 500 गज में है और सैनिक फार्म्स दक्षिणी दिल्ली के इलाके में उनका यह घर है. इस 500 गज में उन्होंने अपने घर के आंगन से लेकर छत तक पर 15000 पौधे लगा रखे हैं. ये कुल 15000 पौधे लगातार ऑक्सीजन विकसित करते रहते हैं। इस वजह से यहां की हवा हर समय शुद्ध होती है."

प्राकृतिक सामग्री से बना मजबूत आशियाना


घर की बनावट पूरी तरह प्राकृतिक है। सिर्फ ईंटों का इस्तेमाल किया गया है, ऊपर लाल पत्थर की छत है और दीवारों पर चूने की पुताई हुई है। किसी भी रासायनिक पेंट का प्रयोग नहीं हुआ। यह सब देहरादून के एक वैद्य के सुझाव पर किया गया, जिन्होंने नीनो कौर को सात्विक भोजन और शुद्ध वातावरण की सलाह दी थी। दिल्ली लौटकर पीटर ने एक्वापोनिक्स अपनाकर घर को बदल दिया। पीटर सिंह ने बताया, "पीटर सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने घर को सिर्फ ईटों से बनवाया है. लाल पत्थर की छत है और चूने से ही पूरी पुताई करवाई है। उन्होंने केमिकल वाले पेंट का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं किया है."


बाजार से दूर, खुद की उपज से पेट भरा


बाजार की सब्जियां रासायनिक होने के कारण वे कभी नहीं खाते। घर पर ही करेला, लौकी, बैंगन, शिमला मिर्च, टमाटर, मेथी और गोभी जैसी सब्जियां उगाते हैं। अतिरिक्त बेचकर महीने में 30,000 रुपये कमाते हैं, यानी सालाना 3.6 लाख। मछली पालन से 50 किलो मछलियां मिलती हैं। कुल मिलाकर सालाना 7 लाख की आय होती है। सोलर पैनल लगे हैं, इसलिए बिजली का बिल शून्य है। पूरा घर ग्रीनहाउस की तरह काम करता है, जहां पानी का एक बूंद भी बर्बाद नहीं होता। जापान, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी से लोग इसे अध्ययन के लिए आते हैं। पूरे घर को एक्वापोनिक्स तकनीक से बनाने के लिए उनका 6 लाख रुपए का खर्चा हुआ था। "

एक्वापोनिक्स: मछली और पौधों का अनोखा साथ


यह तकनीक मछली पालन और बिना मिट्टी के पौधे उगाने को जोड़ती है। घर अब हरे बगीचे में बदल गया है, जहां 15,000 से ज्यादा पौधे बिना मिट्टी या रासायनिक खाद के बढ़ते हैं। मछलियों का कचरा ही सब्जियों के लिए प्राकृतिक पोषक तत्व बन जाता है। इससे सब्जियां पूरी तरह जैविक निकलती हैं। पीटर सिंह ने बताया, एक्वापोनिक्स एक ऐसी तकनीक है, जिसमें मछली पालन और बिना मिट्टी के पौधे उगाना एक साथ किया जाता है। आज उनका घर एक हरे-भरे बगीचे के रूपए में बदल चुका है। जहां 15 हजार से भी ज्यादा पौधे लगे हैं। खास बात यह है कि इतने सारे पौधे बिना मिट्टी और बिना किसी रासायनिक खाद के उगाए गए हैं। मछली के जरिए जो खाद निकलता है, उसी को वह सब्जियों में डालते हैं। जिस वजह से सब्जियां ऑर्गेनिक निकलती हैं। "







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