Explainer: डीलिमिटेशन क्या है और महिला आरक्षण कैसे जुड़ा है? 5 सवालों में समझें
संसद में मोदी सरकार ने डीलिमिटेशन बिल पेश कर दिया है और इस पर संसद के अंदर और बाहर जोरदार बहस जारी है। खासकर दक्षिण भारत में इस परिसीमन प्रक्रिया को लेकर विरोध देखने को मिल रहा है।
विपक्ष और कई दक्षिण भारतीय राज्यों के नेताओं का कहना है कि यह डीलिमिटेशन प्रस्ताव उनके साथ नाइंसाफी कर सकता है। वहीं सरकार का दावा है कि इस बिल से किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि डीलिमिटेशन बिल क्या है, इसका महिला आरक्षण से क्या संबंध है, और जनगणना की इसमें क्या भूमिका है।
इस नए डीलिमिटेशन बिल के तहत सीटों की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। अगर यह विधेयक पास होता है, तो लोकसभा की सीटें बढ़कर 816 तक हो सकती हैं। यह बदलाव भारत की राजनीतिक संरचना पर बड़ा असर डाल सकता है।
जनगणना के आधार पर यह तय किया जाता है कि किस क्षेत्र की आबादी कितनी है और उसी के अनुसार लोकसभा और विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली जाती हैं। इसके लिए एक परिसीमन आयोग बनाया जाता है, जिसे संविधान से शक्तियां मिलती हैं।
भारत में अब तक 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोग का गठन किया जा चुका है। 1976 में 42वें संशोधन के जरिए इस प्रक्रिया पर रोक लगाई गई थी, जिसे बाद में 2002 के बाद भी टाल दिया गया। अब नए डीलिमिटेशन बिल के जरिए फिर से सीटों के पुनर्वितरण की चर्चा हो रही है।
लेकिन इस महिला आरक्षण को लागू करने के लिए जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन को जरूरी शर्त बनाया गया था। अब 2026 के प्रस्तावित संशोधन में कहा जा रहा है कि इस प्रक्रिया में देरी महिलाओं की “प्रभावी और समर्पित भागीदारी” को प्रभावित कर सकती है।
इसमें यह भी प्रस्ताव है कि आरक्षण का आधार ताजा जनगणना के आंकड़े होंगे। वहीं विपक्ष का तर्क है कि 33 प्रतिशत आरक्षण मौजूदा 543 सीटों में ही लागू किया जाना चाहिए, न कि सीटें बढ़ाकर।
1993 में 73वें और 74वें संशोधन के जरिए पंचायत और शहरी निकायों में महिलाओं को आरक्षण मिला। 1996 में पहली बार संसद में महिला आरक्षण बिल पेश हुआ, लेकिन पास नहीं हो पाया।
2010 में राज्यसभा में यह बिल पास हुआ, लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो सका। 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार ने महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक पास किया, लेकिन इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया। अब इसी शर्त को हटाने की चर्चा हो रही है, जिससे विवाद और बढ़ गया है।
अगर सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर होगा, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें ज्यादा बढ़ जाएंगी। इससे दक्षिण राज्यों का प्रतिनिधित्व कमजोर हो सकता है।
वहीं सरकार का कहना है कि ऐसा नहीं होगा। गृह मंत्री Amit Shah के अनुसार, 50 प्रतिशत वृद्धि मॉडल के बाद दक्षिण राज्यों की सीटें भी बढ़ेंगी। उनका दावा है कि दक्षिण भारत की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो सकती हैं और कुल हिस्सेदारी लगभग 24 प्रतिशत बनी रहेगी।
सरकार का कहना है कि डीलिमिटेशन कमिशन एक्ट में कोई बदलाव नहीं किया गया है और पूरी प्रक्रिया पहले की तरह ही चलेगी। गृह मंत्री के अनुसार, परिसीमन आयोग की रिपोर्ट संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही लागू होगी।
इसका मतलब है कि 2029 से पहले इस प्रक्रिया के लागू होने की संभावना नहीं है। तब तक सभी चुनाव मौजूदा लोकसभा सीटों और निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही होंगे।
साथ ही, महिला आरक्षण, जनगणना और परिसीमन जैसे मुद्दों के एक साथ जुड़ने से यह मामला और जटिल हो गया है। आने वाले समय में इस पर राजनीतिक बहस और तेज होने की पूरी संभावना है।
विपक्ष और कई दक्षिण भारतीय राज्यों के नेताओं का कहना है कि यह डीलिमिटेशन प्रस्ताव उनके साथ नाइंसाफी कर सकता है। वहीं सरकार का दावा है कि इस बिल से किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि डीलिमिटेशन बिल क्या है, इसका महिला आरक्षण से क्या संबंध है, और जनगणना की इसमें क्या भूमिका है।
लोकसभा सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव क्या है
सरकार ने लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया है। इस समय लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं, जिन पर चुनाव होते हैं।इस नए डीलिमिटेशन बिल के तहत सीटों की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। अगर यह विधेयक पास होता है, तो लोकसभा की सीटें बढ़कर 816 तक हो सकती हैं। यह बदलाव भारत की राजनीतिक संरचना पर बड़ा असर डाल सकता है।
डीलिमिटेशन या परिसीमन होता क्या है
डीलिमिटेशन को हिंदी में परिसीमन कहा जाता है। यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जो आमतौर पर जनगणना के बाद की जाती है।जनगणना के आधार पर यह तय किया जाता है कि किस क्षेत्र की आबादी कितनी है और उसी के अनुसार लोकसभा और विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली जाती हैं। इसके लिए एक परिसीमन आयोग बनाया जाता है, जिसे संविधान से शक्तियां मिलती हैं।
भारत में अब तक 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोग का गठन किया जा चुका है। 1976 में 42वें संशोधन के जरिए इस प्रक्रिया पर रोक लगाई गई थी, जिसे बाद में 2002 के बाद भी टाल दिया गया। अब नए डीलिमिटेशन बिल के जरिए फिर से सीटों के पुनर्वितरण की चर्चा हो रही है।
महिला आरक्षण से कैसे जुड़ा है यह मामला
डीलिमिटेशन बिल और महिला आरक्षण का मुद्दा एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। 2023 में एक कानून पास हुआ था, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया।लेकिन इस महिला आरक्षण को लागू करने के लिए जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन को जरूरी शर्त बनाया गया था। अब 2026 के प्रस्तावित संशोधन में कहा जा रहा है कि इस प्रक्रिया में देरी महिलाओं की “प्रभावी और समर्पित भागीदारी” को प्रभावित कर सकती है।
इसमें यह भी प्रस्ताव है कि आरक्षण का आधार ताजा जनगणना के आंकड़े होंगे। वहीं विपक्ष का तर्क है कि 33 प्रतिशत आरक्षण मौजूदा 543 सीटों में ही लागू किया जाना चाहिए, न कि सीटें बढ़ाकर।
महिला आरक्षण का इतिहास क्या कहता है
महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है। 1987 में राजीव गांधी के समय एक कमेटी बनाई गई थी, जिसने महिलाओं के लिए आरक्षण की सिफारिश की थी।1993 में 73वें और 74वें संशोधन के जरिए पंचायत और शहरी निकायों में महिलाओं को आरक्षण मिला। 1996 में पहली बार संसद में महिला आरक्षण बिल पेश हुआ, लेकिन पास नहीं हो पाया।
2010 में राज्यसभा में यह बिल पास हुआ, लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो सका। 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार ने महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक पास किया, लेकिन इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया। अब इसी शर्त को हटाने की चर्चा हो रही है, जिससे विवाद और बढ़ गया है।
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता क्या है
डीलिमिटेशन बिल को लेकर सबसे ज्यादा चिंता दक्षिण भारतीय राज्यों में है। इन राज्यों का कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।You may also like
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अगर सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर होगा, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें ज्यादा बढ़ जाएंगी। इससे दक्षिण राज्यों का प्रतिनिधित्व कमजोर हो सकता है।
वहीं सरकार का कहना है कि ऐसा नहीं होगा। गृह मंत्री Amit Shah के अनुसार, 50 प्रतिशत वृद्धि मॉडल के बाद दक्षिण राज्यों की सीटें भी बढ़ेंगी। उनका दावा है कि दक्षिण भारत की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो सकती हैं और कुल हिस्सेदारी लगभग 24 प्रतिशत बनी रहेगी।
जनगणना की भूमिका क्यों अहम है
डीलिमिटेशन प्रक्रिया में जनगणना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। सीटों का पुनर्वितरण जनसंख्या के आंकड़ों पर आधारित होता है, इसलिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात की जा रही है।सरकार का कहना है कि डीलिमिटेशन कमिशन एक्ट में कोई बदलाव नहीं किया गया है और पूरी प्रक्रिया पहले की तरह ही चलेगी। गृह मंत्री के अनुसार, परिसीमन आयोग की रिपोर्ट संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही लागू होगी।
इसका मतलब है कि 2029 से पहले इस प्रक्रिया के लागू होने की संभावना नहीं है। तब तक सभी चुनाव मौजूदा लोकसभा सीटों और निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही होंगे।
आगे क्या हो सकता है
डीलिमिटेशन बिल भारत के राजनीतिक नक्शे को बदलने की क्षमता रखता है। यह सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि इससे राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।साथ ही, महिला आरक्षण, जनगणना और परिसीमन जैसे मुद्दों के एक साथ जुड़ने से यह मामला और जटिल हो गया है। आने वाले समय में इस पर राजनीतिक बहस और तेज होने की पूरी संभावना है।









