मॉनसून के लिए क्यों खतरा बना अल नीनो? जानें भारत में इसका इतिहास और असर

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समुद्र की लहरों में छिपी गर्मी कभी-कभी पूरी दुनिया के मौसम को तहस-नहस करने की ताकत रखती है। इसी ताकत का नाम है अल नीनो। साल 2026 की शुरुआत से ही वैज्ञानिक प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य बढ़त देख रहे हैं। सतह के नीचे जमा हो रही यह गर्मी अब हवाओं के जरिए इधर-उधर फैलने लगी है, जिसने एक 'मजबूत अल नीनो' या 'सुपर अल नीनो' की आशंका को जन्म दे दिया है।
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भारत में गर्मी का मिजाज पहले ही बेहद कड़ा हो चुका है। अप्रैल के महीने में ही उत्तर प्रदेश के बांदा जैसे इलाकों में पारा 47.4 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा, जो इस सीजन का रिकॉर्ड है। देश के बड़े हिस्से में लू का प्रकोप जारी है और तापमान लगातार 40 से 45 डिग्री के बीच बना हुआ है। मौसम के ये तेवर अक्सर एक कमजोर मॉनसून की तरफ इशारा करते हैं, जो भारत जैसे देश के लिए चिंता की बात है क्योंकि यहाँ खेती, पानी और बिजली आज भी काफी हद तक बारिश पर ही निर्भर हैं।

आखिर क्या है यह अल नीनो?

अगर आसान शब्दों में कहें, तो अल नीनो जलवायु की एक ऐसी स्थिति है जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी जरूरत से ज्यादा गर्म हो जाता है। जब यह पानी गर्म होता है, तो यह हवाओं के स्वाभाविक चक्र को बदल देता है। इसका असर दक्षिण अमेरिका से लेकर दक्षिण एशिया तक की बारिश पर पड़ता है।

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तापमान की इस बढ़त को वैज्ञानिक अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हैं। अगर तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़े तो इसे कमजोर, 1.5 डिग्री पर प्रबल और 2 डिग्री या उससे ज्यादा होने पर 'अत्यंत प्रबल' माना जाता है। 'सुपर अल नीनो' कोई किताबी नाम नहीं है, बल्कि यह शब्द उन स्थितियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जब गर्मी सारे रिकॉर्ड तोड़ दे। हालांकि, यह अभी केवल अनुमान हैं और जरूरी नहीं कि इसका असर हर जगह एक जैसा ही हो।

भारत में अल नीनो का पुराना इतिहास

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि अल नीनो का मतलब हमेशा सूखा नहीं होता। साल 1950 से अब तक भारत ने कुल 16 अल नीनो वर्ष देखे हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इनमें से केवल 7 साल ही ऐसे रहे जब मॉनसून की बारिश सामान्य से कम हुई।


उदाहरण के तौर पर, 1982 और 2015 में तो अल नीनो ने सूखे जैसे हालात पैदा किए, लेकिन 1997 की घटना ने सबको चौंका दिया। उस साल अल नीनो काफी खतरनाक था, फिर भी भारत में मॉनसून लगभग सामान्य रहा और कोई बड़ा सूखा नहीं पड़ा। रिसर्च बताते हैं कि अब अल नीनो का असर पूरे भारत पर एक जैसा नहीं पड़ता। दक्षिण भारत में इसका असर स्थिर है, उत्तर भारत में यह पहले से ज्यादा प्रभावी हुआ है, जबकि मध्य भारत में इसका असर अब काफी कम हो गया है।

कमजोर मॉनसून से क्या-क्या छिन सकता है?

भारत की करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी में खेती का हिस्सा 18 प्रतिशत है और मॉनसून देश की 70 प्रतिशत बारिश लेकर आता है। हमारी आधी आबादी को खेती से ही रोजगार मिलता है। अगर बारिश कम होती है, तो इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं:
  • फसलों पर मार: चावल, कपास और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों की पैदावार गिर सकती है। जमीन में नमी कम होने से गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों को भी नुकसान होगा।
  • निर्यात पर पाबंदी: खाने-पीने की चीजों की कमी होने पर सरकार को इनके निर्यात पर रोक लगानी पड़ सकती है, जैसा कि 2023 में भी देखा गया था।
  • आयात का बोझ: खाद्य तेलों (पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल) की मांग पूरी करने के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर होना पड़ सकता है।
  • बिजली संकट: कम बारिश का मतलब है बांधों में कम पानी, जिससे पनबिजली (Hydro Power) का उत्पादन घट सकता है।

महंगाई और आम आदमी की जेब पर असर

भारत में महंगाई दर को तय करने में खाने-पीने की चीजों की कीमतों का बड़ा रोल होता है। पिछले दो सालों में अच्छी बारिश की वजह से खाद्य कीमतें नियंत्रण में रहीं, जिससे बैंक ब्याज दरों को स्थिर रख पाए। लेकिन कमजोर मॉनसून की खबर महंगाई को फिर से भड़का सकती है।

ईरान जैसे वैश्विक संघर्षों के कारण पहले ही चीजों के दाम बढ़ रहे हैं, ऐसे में अगर सूखा पड़ता है तो रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ सकता है। इससे आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है और डॉलर के मुकाबले रुपया, जो पहले ही निचले स्तर पर है, और भी कमजोर हो सकता है।

कुल मिलाकर, अल नीनो केवल एक मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि यह भारत की रसोई से लेकर उसकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार तक को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। अब सबकी नजरें आसमान की ओर हैं कि क्या मॉनसून इस समुद्री गर्मी को मात दे पाएगा।





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