ममता भी नहीं समझ पाईं RSS का ये गेम प्लान! शाखा से बूथ तक ऐसे बदली बंगाल की हवा

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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जो ऐतिहासिक जीत हासिल की है, वह केवल एक-दो साल की मेहनत का नतीजा नहीं है। बंगाल की राजनीति हमेशा से बड़े चेहरों और आक्रामक चुनाव अभियानों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस बार 'दीदी' के जादू को कमजोर करने के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की एक बहुत लंबी और गहरी रणनीति रही है। इसे समझने के लिए हमें संघ के इतिहास, उसके फैलाव और चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट को करीब से देखना होगा।
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2021 की हार से सीखा सबक

2021 के चुनावों में भाजपा 3 सीटों से उछलकर 77 सीटों तक तो पहुंच गई थी, लेकिन सत्ता की कुर्सी अब भी दूर थी। उस समय संघ ने समझ लिया था कि बंगाल में सिर्फ 'हवा' बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके बाद RSS ने तीन स्तरों पर काम शुरू किया: संगठन को गांव-गांव तक ले जाना, स्थानीय मुद्दों को उठाना और कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल बिठाना। 2026 तक आते-आते यही रणनीति जीत का मंत्र बनी।

शाखाओं का जाल और सांगठनिक मजबूती

संघ का बंगाल से रिश्ता बहुत पुराना है, लेकिन असली रफ्तार 2023 से 2025 के बीच देखने को मिली। संघ ने पूरे राज्य को अलग-अलग प्रांतों में बांटकर शाखाओं की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी की।
  • उत्तर बंगाल में शाखाएं 1,034 से बढ़कर 1,153 हो गईं।
  • मध्य बंगाल के जिलों जैसे बीरभूम और बाकुंड़ा में 1,320 से बढ़कर 1,823 शाखाएं हो गईं।
  • दक्षिण बंगाल में भी यह संख्या 1,206 से बढ़कर 1,564 तक पहुंच गई।

मार्च 2026 में संघ ने अपये भी पढ़ें ने पूरे ढांचे को और भी छोटा और प्रभावी बनाने के लिए 5 संभागों में बांट दिया, जिससे फैसले लेना और काम करना आसान हो गया।

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सांस्कृतिक राजनीति और हिंदू सम्मेलन

संघ ने अपने सहयोगी संगठनों जैसे हिंदू जागरण मंच और विश्व हिंदू परिषद के साथ मिलकर राज्य भर में 2,000 से ज्यादा हिंदू सम्मेलन किए। इन सम्मेलनों में सीधे वोट मांगने के बजाय सामाजिक एकता, परिवार के संस्कार और सांस्कृतिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बात की गई। इसने लोगों के मन में एक वैचारिक माहौल तैयार किया।


साइलेंट कैंपेन: जब रैलियों से ज्यादा काम आया 'पर्सनल टच'

2026 के चुनाव में जहां दूसरी पार्टियां बड़ी रैलियों और शोर-शराबे में व्यस्त थीं, वहीं संघ के स्वयंसेवकों ने 'साइलेंट कैंपेन' चलाया। करीब 2 लाख छोटी बैठकें चाय की दुकानों, मोहल्लों और मंदिरों में की गईं। विचारधारा को किसी नेता के भाषण के बजाय पड़ोसियों और दोस्तों के जरिए लोगों तक पहुंचाया गया। यह तरीका ज्यादा भरोसेमंद साबित हुआ।

बूथ मैनेजमेंट: जीत की असली चाबी

चुनाव के दिन असली मुकाबला बूथ पर होता है। संघ ने हर बूथ पर 10 युवा स्वयंसेवकों की टीम तैनात की। उनका काम सिर्फ लोगों को वोट के लिए प्रेरित करना ही नहीं था, बल्कि उन्हें सुरक्षित तरीके से मतदान केंद्र तक पहुंचाना भी था। इस माइक्रो-लेवल की निगरानी ने विरोधी खेमे की किसी भी गड़बड़ी की गुंजाइश को खत्म कर दिया।





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