भारत-बांग्लादेश सीमा पर खिंचेगी 'सुरक्षा की दीवार', सुवेंदु कैबिनेट के फैसले से बदलेगी तस्वीर
India-Bangladesh Border Fencing : भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा होती है। इस सीमा का सबसे बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है जिसकी लंबाई लगभग 2,216 किलोमीटर है। लंबे समय से केंद्र सरकार और सीमा सुरक्षा बल (BSF) इस पूरी सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ यानी फेंसिंग लगाने की कोशिश कर रहे हैं। इसका सीधा मकसद अवैध घुसपैठ, मवेशियों की तस्करी और ड्रग्स जैसे सुरक्षा खतरों को रोकना है। लेकिन पश्चिम बंगाल में यह काम कई सालों तक बहुत धीमी रफ्तार से चला जिससे यह मुद्दा राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच फंसकर रह गया था।
मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालें तो पश्चिम बंगाल में अब तक करीब 1,647 किलोमीटर सीमा पर फेंसिंग का काम पूरा हो चुका है। इसका मतलब है कि लगभग 74 प्रतिशत इलाके में बाड़ लग चुकी है। हालांकि असली चुनौती बाकी बचे हुए लगभग 569 किलोमीटर के हिस्से को लेकर है जो अभी भी खुला पड़ा है। इस खुले हिस्से में से करीब 113 किलोमीटर का इलाका ऐसा है जहां भौगोलिक और तकनीकी कारणों से फेंसिंग लगाना बहुत मुश्किल है। यह हिस्सा मुख्य रूप से नदी वाले क्षेत्र हैं जहां इच्छामती और पद्मा जैसी नदियां अक्सर अपना रास्ता बदलती रहती हैं। इन जगहों पर जमीन स्थिर न होने के कारण बाड़ टिक नहीं पाती। ऐसे संवेदनशील इलाकों में बीएसएफ नावों और हाई-टेक कैमरों के जरिए निगरानी करती है।
बाकी बचा हुआ करीब 456 किलोमीटर का क्षेत्र ऐसा है जहां फेंसिंग लगाई जा सकती है लेकिन वहां जमीन अधिग्रहण के मामले सालों तक फाइलों में दबे रहे। जानकारी के अनुसार पिछली राज्य सरकार के कार्यकाल में केवल 78 किलोमीटर के आसपास की जमीन ही बीएसएफ या केंद्र को सौंपी गई थी। जमीन के बड़े हिस्से का अधिग्रहण या तो शुरू ही नहीं हुआ था या फिर सरकारी मंजूरी के इंतजार में अटका रहा।
इस देरी को लेकर राज्य की पिछली सरकार पर कई गंभीर आरोप लगे थे। केंद्र सरकार और विपक्षी दलों का कहना था कि फेंसिंग के काम को राजनीतिक फायदे के लिए रोका जा रहा है। आरोप यह भी लगे कि सुरक्षा से ज्यादा वोट बैंक की राजनीति को तवज्जो दी गई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कई मंचों से यह बात उठाई कि सीमा सुरक्षा में हो रही यह देरी देश की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है। यह मामला अदालत की चौखट तक भी पहुंचा और कलकत्ता हाई कोर्ट ने कई मौकों पर राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मुद्दा बताया था।
अब 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद बंगाल की राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है। राज्य में बीजेपी की सरकार बनने के बाद नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने सीमा फेंसिंग को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल किया है। मुख्यमंत्री ने अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में बीएसएफ को जमीन सौंपने की प्रक्रिया को युद्ध स्तर पर तेज करने का निर्देश दिया है। राज्य सरकार ने करीब 600 एकड़ जमीन जल्द से जल्द उपलब्ध कराने के लिए काम शुरू कर दिया है। जिला अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि जमीन ट्रांसफर की यह पूरी कानूनी प्रक्रिया 45 दिनों के भीतर पूरी की जाए।
सीमा पर फेंसिंग क्यों जरूरी है?
सरकार का मानना है कि बाड़ लगने से सीमा पार से होने वाली अवैध गतिविधियों पर लगाम लगेगी। इससे न केवल घुसपैठ रुकेगी बल्कि नकली नोटों और नशीले पदार्थों की तस्करी पर भी नियंत्रण पाना आसान होगा। पूरी फेंसिंग होने से बीएसएफ के जवानों को गश्त करने और कार्रवाई करने में काफी मदद मिलेगी। हालांकि नदियों वाले इलाकों की चुनौती अब भी बरकरार है और वहां के लिए किसी स्थायी समाधान पर विचार किया जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अपनी तय समयसीमा में इस काम को कितना पूरा कर पाती है और सुरक्षा के मोर्चे पर बंगाल बॉर्डर पर कितने बड़े बदलाव आते हैं।
मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालें तो पश्चिम बंगाल में अब तक करीब 1,647 किलोमीटर सीमा पर फेंसिंग का काम पूरा हो चुका है। इसका मतलब है कि लगभग 74 प्रतिशत इलाके में बाड़ लग चुकी है। हालांकि असली चुनौती बाकी बचे हुए लगभग 569 किलोमीटर के हिस्से को लेकर है जो अभी भी खुला पड़ा है। इस खुले हिस्से में से करीब 113 किलोमीटर का इलाका ऐसा है जहां भौगोलिक और तकनीकी कारणों से फेंसिंग लगाना बहुत मुश्किल है। यह हिस्सा मुख्य रूप से नदी वाले क्षेत्र हैं जहां इच्छामती और पद्मा जैसी नदियां अक्सर अपना रास्ता बदलती रहती हैं। इन जगहों पर जमीन स्थिर न होने के कारण बाड़ टिक नहीं पाती। ऐसे संवेदनशील इलाकों में बीएसएफ नावों और हाई-टेक कैमरों के जरिए निगरानी करती है।
बाकी बचा हुआ करीब 456 किलोमीटर का क्षेत्र ऐसा है जहां फेंसिंग लगाई जा सकती है लेकिन वहां जमीन अधिग्रहण के मामले सालों तक फाइलों में दबे रहे। जानकारी के अनुसार पिछली राज्य सरकार के कार्यकाल में केवल 78 किलोमीटर के आसपास की जमीन ही बीएसएफ या केंद्र को सौंपी गई थी। जमीन के बड़े हिस्से का अधिग्रहण या तो शुरू ही नहीं हुआ था या फिर सरकारी मंजूरी के इंतजार में अटका रहा।
इस देरी को लेकर राज्य की पिछली सरकार पर कई गंभीर आरोप लगे थे। केंद्र सरकार और विपक्षी दलों का कहना था कि फेंसिंग के काम को राजनीतिक फायदे के लिए रोका जा रहा है। आरोप यह भी लगे कि सुरक्षा से ज्यादा वोट बैंक की राजनीति को तवज्जो दी गई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कई मंचों से यह बात उठाई कि सीमा सुरक्षा में हो रही यह देरी देश की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है। यह मामला अदालत की चौखट तक भी पहुंचा और कलकत्ता हाई कोर्ट ने कई मौकों पर राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मुद्दा बताया था।
अब 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद बंगाल की राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है। राज्य में बीजेपी की सरकार बनने के बाद नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने सीमा फेंसिंग को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल किया है। मुख्यमंत्री ने अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में बीएसएफ को जमीन सौंपने की प्रक्रिया को युद्ध स्तर पर तेज करने का निर्देश दिया है। राज्य सरकार ने करीब 600 एकड़ जमीन जल्द से जल्द उपलब्ध कराने के लिए काम शुरू कर दिया है। जिला अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि जमीन ट्रांसफर की यह पूरी कानूनी प्रक्रिया 45 दिनों के भीतर पूरी की जाए।
सीमा पर फेंसिंग क्यों जरूरी है?
सरकार का मानना है कि बाड़ लगने से सीमा पार से होने वाली अवैध गतिविधियों पर लगाम लगेगी। इससे न केवल घुसपैठ रुकेगी बल्कि नकली नोटों और नशीले पदार्थों की तस्करी पर भी नियंत्रण पाना आसान होगा। पूरी फेंसिंग होने से बीएसएफ के जवानों को गश्त करने और कार्रवाई करने में काफी मदद मिलेगी। हालांकि नदियों वाले इलाकों की चुनौती अब भी बरकरार है और वहां के लिए किसी स्थायी समाधान पर विचार किया जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अपनी तय समयसीमा में इस काम को कितना पूरा कर पाती है और सुरक्षा के मोर्चे पर बंगाल बॉर्डर पर कितने बड़े बदलाव आते हैं। Next Story