False Memory क्या है और दिमाग कभी-कभी गलत यादों को सच क्यों मान लेता है?

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क्या आपको कभी पूरा भरोसा रहा है कि कोई घटना आपके सामने हुई थी, लेकिन बाद में पता चला कि ऐसा हुआ ही नहीं? शायद आपको याद हो कि किसी दोस्त ने कोई खास बात कही थी, आपने कोई वस्तु किसी जगह रखी थी या बचपन में कोई घटना आपके साथ हुई थी। फिर अचानक कोई तस्वीर, वीडियो या बातचीत आपकी याद को गलत साबित कर देती है। यह सिर्फ भूलने की समस्या नहीं है। हमारा दिमाग यादों को किसी कैमरे की तरह रिकॉर्ड करके सुरक्षित नहीं रखता। वह उन्हें समय-समय पर दोबारा बनाता है। इसी प्रक्रिया में कभी-कभी ऐसी याद भी तैयार हो जाती है जो पूरी तरह सही नहीं होती।
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हमारा दिमाग यादों को रिकॉर्ड नहीं करता

हम अक्सर मान लेते हैं कि Memory यानी याददाश्त किसी वीडियो रिकॉर्डिंग जैसी होती है। लेकिन वैज्ञानिक शोध इससे बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाते हैं। किसी घटना को याद करते समय मस्तिष्क उस अनुभव के अलग-अलग हिस्सों को फिर से जोड़ता है। इसमें जगह, आवाज, दृश्य, भावनाएं और घटना का संदर्भ शामिल हो सकते हैं। हिप्पोकैम्पस इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यही वजह है कि याद करते समय छोटी-छोटी गलतियां होना असामान्य नहीं है। कभी घटना सही रहती है, लेकिन उसका समय या स्थान बदल जाता है। कभी किसी दूसरी घटना का विवरण पहली याद में शामिल हो जाता है।


दिमाग झूठी याद कैसे बना सकता है?

इसे समझने के लिए एक आसान उदाहरण लें। मान लीजिए आपने किसी दुकान में लाल बैग देखा। कुछ दिनों बाद कोई आपसे पूछता है कि क्या उस बैग पर एक खास लोगो था। अगर आपको वह जानकारी बार-बार बताई जाए, तो सम्भव है कि कुछ समय बाद आपको सचमुच लगे कि आपने वह लोगो देखा था।

इसे source misattribution यानी जानकारी के स्रोत को गलत पहचानने से जोड़ा जाता है। शोध में पाया गया है कि बाद में मिली जानकारी कभी-कभी मूल घटना की याद के साथ मिल सकती है।

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भावनाएं और कल्पना भी बदल सकती हैं याद

याददाश्त सिर्फ तथ्यों पर निर्भर नहीं करती। हमारी भावनाएं, अपेक्षाएं और पहले से मौजूद जानकारी भी इसमें भूमिका निभाती हैं। अगर किसी घटना के बारे में हम बाद में बहुत सोचते हैं, तो दिमाग उससे जुड़े अलग-अलग विवरणों को फिर से जोड़ सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि किसी गलत याद पर हमारा भरोसा बहुत मजबूत हो सकता है। शोध से पता चलता है कि सही और गलत यादों के दौरान मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में मिलती-जुलती गतिविधियां दिखाई दे सकती हैं। इसलिए केवल यह महसूस होना कि कोई याद बहुत स्पष्ट है, यह साबित नहीं करता कि वह पूरी तरह सही है।

क्या वैज्ञानिकों ने False Memory बनाई है?

यह सिर्फ मनोवैज्ञानिक प्रयोगों की कल्पना नहीं है। 2013 के एक प्रसिद्ध अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चूहों के हिप्पोकैम्पस में मौजूद memory-related neural cells को सक्रिय करके ऐसी डर की प्रतिक्रिया पैदा की जो उस वास्तविक जगह से जुड़ी थी जहां डर पैदा करने वाली घटना हुई ही नहीं थी। इस प्रयोग ने दिखाया कि मस्तिष्क में किसी अनुभव की आंतरिक representation को कृत्रिम रूप से सक्रिय करना व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।

इंसानों में ऐसी परिस्थितियां कहीं अधिक जटिल होती हैं, लेकिन यह शोध इस बात की झलक देता है कि Memory कितनी dynamic प्रक्रिया है।


इसका रोजमर्रा की जिंदगी में क्या मतलब है?

False Memory का असर सिर्फ पुराने किस्से याद करने तक सीमित नहीं है। गवाही, रिश्तों में पुराने विवाद, बच्चों की शुरुआती यादें और यहां तक कि किसी घटना के बारे में हमारी धारणा भी इससे प्रभावित हो सकती है। 2023 के मानव अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि हिप्पोकैम्पस की गतिविधि इस बात से जुड़ी हो सकती है कि व्यक्ति किसी जानकारी को सही संदर्भ में याद करता है या किसी दूसरी घटना से जोड़ देता है।

इसलिए जब दो लोग एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से याद करते हैं, तो जरूरी नहीं कि उनमें से कोई जानबूझकर झूठ बोल रहा हो।

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