डोनाल्ड ट्रंप का यू-टर्न: ईरान के साथ एकतरफा सीजफायर मजबूरी या मास्टरस्ट्रोक?

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी अनिश्चित और आक्रामक विदेश नीति के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उसके पावर प्लांट और बुनियादी ढांचे को तबाह करने की सीधी चेतावनी दी थी। ट्रंप ने यहां तक कहा था कि ईरान को ऐसा हमला झेलना होगा जो पहले कभी नहीं देखा गया। लेकिन मंगलवार की रात अचानक सब कुछ बदल गया जब उन्होंने एकतरफा युद्धविराम (सीजफायर) का ऐलान कर दिया। इस फैसले के पीछे पाकिस्तान के नेतृत्व का भी सहयोग लिया गया है। अब सवाल यह है कि आखिर दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति को ईरान के सामने झुकने पर किसने मजबूर किया?
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दबाव और पलटने की अनूठी नीति

ट्रंप की नीति हमेशा से "मैक्सिमम प्रेशर" यानी अधिकतम दबाव बनाने की रही है। शुरुआत में उन्होंने सैन्य कार्रवाई की धमकियां देकर ईरान को डराने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही तनाव युद्ध के करीब पहुंचा, अमेरिका ने अचानक अपने कदम पीछे खींच लिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल शांति के लिए नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों का परिणाम है।

क्या अमेरिका की मजबूरी बनी बाधा?

रिपोर्ट्स की मानें तो ईरान के साथ केवल 40 दिनों के संघर्ष में अमेरिका ने अपने मिसाइल और गोला-बारूद के भंडार का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा खर्च कर दिया है। एयर डिफेंस सिस्टम और आधुनिक मिसाइलों की भारी कमी ने वाशिंगटन को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में हुई भारी आर्थिक क्षति और वहां से मिल रहे मुआवजे के दबाव ने भी ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। घरेलू मोर्चे पर भी अमेरिकी जनता अब किसी नए और लंबे युद्ध के पक्ष में नहीं है। चुनावी साल में एक अलोकप्रिय युद्ध ट्रंप के राजनीतिक करियर के लिए आत्मघाती साबित हो सकता था।

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क्या यह एक सोची-समझी रणनीति है?

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। कुछ जानकारों का कहना है कि यह ट्रंप की एक रणनीतिक चाल हो सकती है। सीजफायर के जरिए अमेरिका को अपना सैन्य भंडार फिर से भरने और कूटनीतिक रूप से ईरान को घेरने का समय मिल गया है। एक तरफ सोशल मीडिया पर आक्रामक होना और दूसरी तरफ बातचीत का रास्ता खुला रखना ट्रंप की पुरानी शैली है।

अनिश्चितकाल के लिए थमी जंग

ट्रंप ने साफ किया है कि जब तक ईरान दूसरे दौर की वार्ता के लिए राजी नहीं होता, तब तक अमेरिका हमला नहीं करेगा। हालांकि, यह युद्धविराम बेहद नाजुक है और कभी भी टूट सकता है। ईरान की शर्त स्पष्ट है कि जब तक अमेरिकी नौसेना होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरानी बंदरगाहों से घेराबंदी नहीं हटाती, वह बातचीत नहीं करेगा। ट्रंप ने इसके संकेत भी दिए हैं कि वे ब्लॉकेड हटा सकते हैं।


फिलहाल, ईरान ने अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रदर्शन कर यह जता दिया है कि वह पीछे हटने वाला नहीं है। अब देखना यह होगा कि ट्रंप की यह "शांति की पहल" मध्य पूर्व में स्थिरता लाती है या यह केवल आने वाले बड़े तूफान से पहले की खामोशी है।



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