Petrol Diesel Price: क्या भारत में सस्ते होने वाले हैं पेट्रोल और डीजल? सिटीग्रुप ने दिए तेल के दाम घटने के संकेत
पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक और बड़ी भविष्यवाणी सामने आई है। मॉर्गन स्टेनली और गोल्डमैन सैक्स के बाद अब सिटीग्रुप ने भी कहा है कि दुनिया भर में कच्चे तेल की कमी का संकट अब खत्म होने की कगार पर है। सिटीग्रुप का अनुमान है कि इस साल के आखिर तक कच्चे तेल की कीमत गिरकर 60 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती है। अगर ऐसा होता है, तो भारतीय तेल कंपनियों का वित्तीय बोझ कम होगा और भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम घट सकते हैं।
सिटीग्रुप की रिपोर्ट में बताया गया है कि फरवरी के आखिर में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई थी क्योंकि होर्मुज जलडमरू (Strait of Hormuz) का रास्ता ब्लॉक हो गया था। लेकिन अब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एक अंतरिम समझौता होने से तनाव कम हो गया है और इस जरूरी समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य हो गई है। बाजार में कच्चे तेल की भरपूर सप्लाई होने की वजह से दूसरी तिमाही में बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 30% की गिरावट देखी गई है और फिलहाल यह 71.92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।
सिटीबैंक के विश्लेषकों का कहना है कि तेल का बाजार बहुत तेजी से सामान्य हो रहा है। होर्मुज का रास्ता खुलने के बाद रिफाइनरियों को भरपूर मात्रा में कच्चा तेल मिल रहा है। दूसरी तरफ, दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश चीन फिलहाल बाजार से थोड़ी दूरी बनाए हुए है जिससे कच्चे तेल की फिजिकल डिमांड कम हुई है। इसके अलावा ग्लोबल ऑयल इन्वेंट्री (स्टॉक) में भी उतनी कमी नहीं आई है जितनी उम्मीद थी, जो यह दिखाता है कि स्टोरेज में जरूरत से ज्यादा तेल मौजूद है।
रिपोर्ट के मुताबिक, गर्मियों के दौरान कीमतों में कुछ समय के लिए मामूली तेजी आ सकती है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसे बिकवाली के मौके के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि अंत में कीमतें नीचे ही आएंगी। बैंक का अनुमान है कि साल के अंत तक ब्रेंट क्रूड की कीमतें 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में आ जाएंगी।
सिटीग्रुप के अलावा दुनिया के कई दूसरे बड़े वित्तीय संस्थानों ने भी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का अनुमान जताया है। गोल्डमैन सैक्स का मानना है कि ईरान का विवाद पूरी तरह सुलझते ही बाजार में जरूरत से ज्यादा सप्लाई हो जाएगी। वहीं मॉर्गन स्टेनली ने भी पिछले कुछ हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों के अपने अनुमान को दो बार घटाया है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत अगर 60 डॉलर तक गिरती है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकारी तेल कंपनियों (जैसे IOC, HPCL और BPCL) के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा। कच्चे तेल के दाम कम होने से इन कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन बढ़ेगा, जिससे वे आम जनता के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती कर सकेंगी।
क्यों आ रही है कच्चे तेल के दामों में गिरावट?
सिटीग्रुप की रिपोर्ट में बताया गया है कि फरवरी के आखिर में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई थी क्योंकि होर्मुज जलडमरू (Strait of Hormuz) का रास्ता ब्लॉक हो गया था। लेकिन अब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एक अंतरिम समझौता होने से तनाव कम हो गया है और इस जरूरी समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य हो गई है। बाजार में कच्चे तेल की भरपूर सप्लाई होने की वजह से दूसरी तिमाही में बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 30% की गिरावट देखी गई है और फिलहाल यह 71.92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।
सिटीबैंक के विश्लेषकों का कहना है कि तेल का बाजार बहुत तेजी से सामान्य हो रहा है। होर्मुज का रास्ता खुलने के बाद रिफाइनरियों को भरपूर मात्रा में कच्चा तेल मिल रहा है। दूसरी तरफ, दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश चीन फिलहाल बाजार से थोड़ी दूरी बनाए हुए है जिससे कच्चे तेल की फिजिकल डिमांड कम हुई है। इसके अलावा ग्लोबल ऑयल इन्वेंट्री (स्टॉक) में भी उतनी कमी नहीं आई है जितनी उम्मीद थी, जो यह दिखाता है कि स्टोरेज में जरूरत से ज्यादा तेल मौजूद है।
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रिपोर्ट के मुताबिक, गर्मियों के दौरान कीमतों में कुछ समय के लिए मामूली तेजी आ सकती है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसे बिकवाली के मौके के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि अंत में कीमतें नीचे ही आएंगी। बैंक का अनुमान है कि साल के अंत तक ब्रेंट क्रूड की कीमतें 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में आ जाएंगी।
सिटीग्रुप के अलावा दुनिया के कई दूसरे बड़े वित्तीय संस्थानों ने भी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का अनुमान जताया है। गोल्डमैन सैक्स का मानना है कि ईरान का विवाद पूरी तरह सुलझते ही बाजार में जरूरत से ज्यादा सप्लाई हो जाएगी। वहीं मॉर्गन स्टेनली ने भी पिछले कुछ हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों के अपने अनुमान को दो बार घटाया है।
भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत अगर 60 डॉलर तक गिरती है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकारी तेल कंपनियों (जैसे IOC, HPCL और BPCL) के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा। कच्चे तेल के दाम कम होने से इन कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन बढ़ेगा, जिससे वे आम जनता के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती कर सकेंगी।





